रामगढ़ में झाड़ियों के नीचे मिला 17वीं सदी का प्राचीन बौद्ध मंदिर, रामायण की टेराकोटा पट्टिकाएं बनीं आकर्षण
17 वीं सदी का प्राचीन बौद्ध मंदिर : प्रभात खबर
रामगढ़ के गोला में एक महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोज हुई है. झाड़ियों के नीचे दबा 17वीं सदी का खीरी मठ बौद्ध मंदिर मिला है, जो सांस्कृतिक समृद्धि का जीवंत दस्तावेज है. यह मंदिर अब पुरातत्व विभाग के संरक्षण में रहेगा.
गोला (रामगढ़). वर्ष 2002 में खीरी मठ बौद्ध मंदिर के आसपास के क्षेत्र में सर्वे किया गया था. सर्वे के दौरान गोला (रामगढ़) चौक से चित्तरपुर मार्ग पर बक्शी टोला गांव में कचरे के ढेर और कंटीली झाड़ियों के नीचे दबे एक प्राचीन मंदिर का पता चला. इसे राधा गोविंद मंदिर समूह का मंदिर बताया गया है. इसकी स्थापत्य और टेराकोटा कला शैली दुमका के प्रसिद्ध मलूटी मंदिर समूह से काफी मिलती है. स्थापत्य और निर्माण तकनीक के आधार पर मंदिर के 17वीं-18वीं शताब्दी में निर्मित होने का अनुमान है.
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ASI ने शुरू किया संरक्षण कार्य
अब यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में आ गया है. यहां मुख्य स्मारक के समीप ही झाड़ियों में एक प्राचीन कुआं और समकालीन निर्माण सामग्री के अन्य अवशेष भी मिले हैं. विशेषज्ञ खीरी मठ के आसपास कभी विस्तृत धार्मिक-सांस्कृतिक केंद्र होने की संभावना जता रहे हैं. इसे राज्य में मलूटी शैली का छठा मंदिर बताया जा रहा है, जहां रामायण के प्रसंगों की टेराकोटा पट्टिकाएं मिली हैं.
यह इस शैली का छठा अनरिपोर्टेड मंदिर है. इससे पहले बोकारो के चंदनकियारी में तीन, रांची के पंडरा में एक और गुमला में नवरत्नगढ़ के समीप धोबी मठ में एक ऐसे मंदिर की खोज की जा चुकी है.
बंगाल-झारखंड स्थापत्य परंपरा का संकेत
अब तक झारखंड में मध्यकालीन टेराकोटा मंदिर स्थापत्य का प्रमुख केंद्र दुमका का मलूटी माना जाता रहा है. लेकिन पिछले दो दशकों के मैदानी सर्वेक्षणों से संकेत मिला है कि छोटानागपुर के पठारी क्षेत्र में भी बंगाल-झारखंड सीमावर्ती स्थापत्य परंपरा के तहत इस तरह के राधा गोविंद मंदिरों का निर्माण हुआ था. रामगढ़ का मंदिर इस परंपरा की छठी महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आया है. अनुमान है कि चैतन्य महाप्रभु की उड़ीसा से वाराणसी यात्रा से जुड़े मार्गों पर ऐसे मंदिरों के निर्माण की परंपरा विकसित हुई होगी.
22 वर्षों की खोज के बाद सामने आया मंदिर
इस खोज का श्रेय डॉ हरेंद्र सिन्हा के 22 वर्षों के प्रयास के वाद मिली है. डॉ सिन्हा झारखंड के वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ता और संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के पूर्व उपनिदेशक हैं. अव एएसआइ के महानिदेशक डॉ यदुवीर सिंह रावत और रांची सर्कल की अधीक्षण पुरातत्वविद् डॉ करावी साहा की पहल से मंदिर के संरक्षण का काम शुरू किया गया है.
रामायण के प्रसंगों की जीवंत प्रस्तुति
बक्शी टोला के मंदिर की टेराकोटा पट्टिकाओं पर धार्मिक और पौराणिक प्रसंगों का सूक्ष्म अंकन है. इनमें धनुष-वाण धारण किये श्रीराम और लक्ष्मण, रावण के साथ युद्ध तथा हनुमान द्वारा द्रोणागिरी पर्वत उठाने के दृश्य शामिल है. इसके अलावा विभिन्न विष्णु स्वरूप, मत्स्य और वरुण अवतार, चक्र-पद्म अलंकरण और अश्वारोही योद्धाओं की आकृतियां भी पट्टिकाओं पर उकेरी गयी है. मंदिर के गर्भगृह का प्रवेश द्वार वहु-मेहरावदार चाप पर आधारित है, जिसमे वंगीय चाला और रत्न स्थापत्य का प्रभाव दिखाई देता है.
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