स्वरोजगार : अविराम ने दिखायी बत्तख पालन की राह

Updated at : 06 Mar 2016 7:48 AM (IST)
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स्वरोजगार : अविराम ने दिखायी बत्तख पालन की राह

राज्य और देश में लोगों की कमाई बढ़ाने के कई उपाय किये जा रहे हैं. अनुदान दिये जाते हैं, लेकिन उसके अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आते. कई बार गड़बड़ियों की शिकायत आती है. लेकिन, लोहरदगा में एक संस्था ने लोगों को बत्तख पालन के प्रति जागरूक किया और आज बड़ी संख्या में लोग इससे अच्छी-खासी […]

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राज्य और देश में लोगों की कमाई बढ़ाने के कई उपाय किये जा रहे हैं. अनुदान दिये जाते हैं, लेकिन उसके अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आते. कई बार गड़बड़ियों की शिकायत आती है. लेकिन, लोहरदगा में एक संस्था ने लोगों को बत्तख पालन के प्रति जागरूक किया और आज बड़ी संख्या में लोग इससे अच्छी-खासी कमाई कर रहे हैं. उम्मीद है कि आनेवाले दिनों में इस व्यवसाय से बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित होंगे, जिससे लोगों की आय बढ़ेगी और क्षेत्र में खुशहाली आयेगी.
गोपी कृष्ण
लोहरदगा : झारखंड में बत्तख पालन के क्षेत्र में अविराम ने जो प्रयास किया, उसके सार्थक परिणाम सामने आये. 11 सितंबर, 2015 को कृषि सचिव डॉ नितिन मदन कुलकर्णी ने मराडीह में बत्तख हेचरी का शुभारंभ किया था़ तब बताया गया था कि झारखंड में बत्तख पालन की स्थिति बेहतर नहीं है.
यहां के किसान घरों में देसी बत्तख पालते हैं. लेकिन, बत्तख पालन से होनेवाले लाभ की संभावना को देखते हुए अविराम ग्रामीण विकास स्वयंसेवी संस्थान के सचिव इंद्रजीत कुमार ने पहल की और बत्तख पालन हेचरी का शुभारंभ किया़ यहां हर महीने तीन से पांच हजार बत्तख पाले जा रहे हैं. बेगोरा और इंडियन रनर बत्तख की प्रमुख नस्लें हैं. बेगोरा की खासियत यह है कि यह छह सप्ताह में तीन किलो की हो जाती है. इंडियन रनर एक साल में 300 अंडे देती है. झारखंड में अभी भी बत्तख पश्चिम बंगाल और आंध्रप्रदेश से आते हैं.
बत्तख संस्थान के सचिव इंद्रजीत कुमार ने बताया कि वर्ष 2016 में 200 किसानों को इसका लाभुक बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. नाबार्ड के सहयोग से संस्थान लोहरदगा के 50 किसानों को बत्तख सह मत्स्य पालन के जरिये लाभ पहुंचा रहा है. एक-दो माह के भीतर प्रतिमाह 30 से 40 हजार बत्तख के चूजे तैयार करने का लक्ष्य है, ताकि लोहरदगा को बत्तख पालन के क्षेत्र में स्वावलंबी बनाया जा सके.
उन्होंने बताया कि बत्तख का अंडा एवं मीट झारखंड के लोगों को मुर्गी के अंडे एवं मीट से ज्यादा पसंद है़ लेकिन, झारखंड में बत्तख की उपलब्धता कम होने के कारण यह महंगा है. वर्तमान समय में खपत का 10 प्रतिशत बत्तख भी यहां नहीं है. ऐसे में इंद्रजीत आनेवाले दिनों में बत्तख पालन के क्षेत्र में काफी संभावनाएं देखते हैं.
यही वजह है कि उन्होंने अगले दो वर्षों में स्थिति में तेजी से सुधार की उम्मीद जतायी है. उनका मानना है कि यदि प्रदेश में बत्तख पालन को बढ़ावा दिया जाये, तो किसानों की कमाई तो बढ़ेगी ही, बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर का भी सृजन होगा, जिससे पूरे क्षेत्र में खुशहाली आयेगी.
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