गीतों पर झूमे लोग, इस पेड़ की पूजा कर प्रकृति संरक्षण का लिया संकल्प, जानें क्या है मान्यता...

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करम डाल की पूजा करते.

जमशेदपुर के बालीगुमा सुखना बस्ती में करम पर्व का आयोजन लोक संस्कृति के रंग में सराबोर रहा. प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और संरक्षण का संदेश देते हुए जल, जंगल, जमीन और संस्कृति बचाने का सामूहिक संकल्प लिया गया.

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जमशेदपुर : ढोल-मांदर की थाप, करम गीतों की गूंज और झूमर की मस्ती…बालीगुमा सुखना बस्ती का करम अखाड़ा लोक संस्कृति के रंग में सराबोर रहा. बालीगुमा करम अखाड़ा कमेटी के तत्वावधान में कुड़माली कैलेंडर के अनुसार करमा पर्व पारंपरिक रीति-रिवाज और उल्लास के साथ मनाया गया.

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करम डाल की पूजा, फिर देर रात तक झूमे

पर्व की शुरुआत करम वृक्ष की डाल की विधि-विधान से पूजा-अर्चना के साथ हुई. इसके बाद करम गीत, झूमर नृत्य और पारंपरिक सांस्कृतिक अनुष्ठानों का दौर देर रात तक चलता रहा. बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु समारोह में शामिल हुए. लोक परंपराओं के रंग में रंगे नजर आए. समारोह में बृहद झारखंड क्षेत्र के चर्चित झूमर कलाकार भोलानाथ महतो और राजदूत महतो ने पारंपरिक करम गीतों और झूमर की शानदार प्रस्तुति दी. कलाकारों की प्रस्तुति पर ग्रामीण जमकर झूमे और पूरा करम अखाड़ा उत्सव के उल्लास से गूंज उठा.

करमा सिर्फ पर्व नहीं, प्रकृति से जुड़ने का संदेश

मुख्य आयोजक दिलीप कडुआर ने कहा - करम पर्व महज धार्मिक आयोजन नहीं है. यह प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, कृषि जीवन और पूर्वजों की प्रकृति-केंद्रित जीवनशैली का प्रतीक है. उन्होंने कहा - पूर्वज जल, जंगल, जमीन, पहाड़ और बीजों को जीवन का अभिन्न हिस्सा मानते थे और इनके संरक्षण की परंपरा विकसित की थी. आज की युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों और पर्यावरण संरक्षण की इस सोच से जोड़ना बेहद जरूरी है.

विकास चाहिए, लेकिन प्रकृति की कीमत पर नहीं

आयोजक सरियान काडुआर ने कहा - आधुनिक विकास के दौर में प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन और जंगलों की कटाई गंभीर पर्यावरणीय संकट को जन्म दे रही है. उन्होंने कहा - हाल की प्राकृतिक त्रासदियां भी हमें प्रकृति के संतुलन और उसकी सीमाओं को समझने का संदेश देती हैं. विकास प्रकृति को नष्ट करके नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य बनाकर होना चाहिए.

जल-जंगल-जमीन और संस्कृति बचाने का संकल्प

कार्यक्रम के अंत में मौजूद लोगों ने जल, जंगल, जमीन और अपनी लोक-संस्कृति को अक्षुण्ण रखने का सामूहिक संकल्प लिया. करमा का संदेश साफ है — प्रकृति बचेगी, तभी संस्कृति बचेगी और तभी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित रहेगा.

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