डॉक्टरों की कमी से गुड़ाबांदा बीमार, बंगाल-ओडिशा के भरोसे मरीज
डॉक्टर के अभाव में बंद पड़ा अस्पताल.
गुड़ाबांदा प्रखंड में स्वास्थ्य व्यवस्था बदहाल है. डॉक्टरों की कमी के कारण 60 हजार की आबादी इलाज के लिए बंगाल और ओडिशा के अस्पतालों पर निर्भर है.
गुड़ाबांदा : करीब 60 हजार की आबादी वाले गुड़ाबांदा प्रखंड में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था खुद बीमार है. प्रखंड बने वर्षों बीत गये, लेकिन आज तक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) की स्थापना नहीं हो सकी. प्रखंड में नौ से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिर और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र होने के बावजूद ग्रामीणों को नियमित चिकित्सकीय सुविधा नहीं मिल रही है. अधिकतर केंद्रों पर डॉक्टरों की स्थायी उपलब्धता नहीं होने से मरीज फार्मासिस्ट और एएनएम के भरोसे इलाज कराने को विवश हैं. सामान्य बुखार, सर्दी-जुकाम से लेकर गंभीर बीमारी तक के मरीजों को डॉक्टर की सलाह और जरूरी जांच के लिए दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ रहा है.
कहीं सप्ताह में दो दिन, तो कहीं डॉक्टर ही नहीं
ग्रामीणों के अनुसार, सिंहपुरा स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर सप्ताह में महज दो दिन आते हैं. अन्य केंद्रों पर भी चिकित्सकों की नियमित उपस्थिति नहीं है. कई जगह केंद्र फार्मासिस्ट के भरोसे संचालित हो रहे हैं. मरीजों को सामान्य दवाएं देकर वापस भेज दिया जाता है. डॉक्टर के अभाव में बीमारी की सही पहचान, जांच और समय पर उपचार प्रभावित हो रहा है.
अक्सर बंद रहते हैं जियान और माछ भंडार केंद्र
जियान और माछभंडार गांव में बने आयुष्मान आरोग्य मंदिर को लेकर ग्रामीणों ने अक्सर बंद रहने की शिकायत की है. वहीं, कुछ स्वास्थ्य केंद्रों में पदस्थ डॉक्टरों के मातृत्व अवकाश पर जाने के बाद उनकी जगह वैकल्पिक चिकित्सक की व्यवस्था नहीं की गयी है. इससे स्वास्थ्य सेवाएं और प्रभावित हो रही हैं.
प्रखंड में एंबुलेंस नहीं, निजी वाहनों के भरोसे मरीज
गुड़ाबांदा को एक एंबुलेंस आवंटित किये जाने की बात कही जा रही है, लेकिन वह भी चाकुलिया प्रखंड के श्यामसुंदर अस्पताल में रखी गयी है. ऐसे में गुड़ाबांदा के मरीजों को जरूरत पड़ने पर निजी वाहन या अन्य साधनों का सहारा लेना पड़ता है. गरीब परिवारों पर इलाज के साथ परिवहन का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है.
बंगाल और ओडिशा के अस्पताल बचा रहे जान
डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड और वायरल बुखार के दौर में डॉक्टरों की कमी ग्रामीणों के लिए और गंभीर समस्या बन गयी है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर इलाज नहीं मिलने के कारण मरीज पश्चिम बंगाल और ओडिशा के अस्पतालों में पहुंच रहे हैं. इससे वहां के अस्पतालों पर भी मरीजों का दबाव बढ़ रहा है.
झाड़-फूंक का सहारा लेने को विवश ग्रामीण
दूरदराज और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले सबर और आदिवासी परिवारों के बीच पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुंच पाने का असर भी दिखायी दे रहा है. कई परिवार आज भी बीमारी की स्थिति में झाड़-फूंक का सहारा लेते हैं. समय पर चिकित्सकीय उपचार नहीं मिलने पर यह स्थिति जानलेवा साबित हो सकती है.
मांग : तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना हो
ग्रामीणों की मांग है कि गुड़ाबांदा में तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की स्थापना की जाये. सभी स्वास्थ्य केंद्रों पर नियमित चिकित्सकों की नियुक्ति हो, डॉक्टरों के अवकाश या अनुपस्थिति की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था की जाये और एंबुलेंस को गुड़ाबांदा में ही उपलब्ध कराया जाये. साथ ही बंद रहने वाले स्वास्थ्य केंद्रों की नियमित निगरानी और जांच सुनिश्चित की जाये.
सलाह : स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ाने से समाधान नहीं होगा
ग्रामीणों का कहना है कि केवल स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा. जब तक केंद्रों पर डॉक्टर, जांच, दवा, एंबुलेंस और नियमित सेवा उपलब्ध नहीं होगी, तब तक सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल पायेगा. गुड़ाबांदा में स्वास्थ्य सुविधा की मौजूदा स्थिति पर अब विभाग को सिर्फ आश्वासन नहीं, बल्कि जमीन पर ठोस कार्रवाई करनी होगी.
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