37 साल बाद फिर खुली कधवन डैम की फाइल, 41 गांवों पर डूब का साया; मुआवजे को लेकर बढ़ी बेचैनी

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शिलान्यास स्थल ,जो वर्षो पुराना है | Prabhat Khabar Network

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सोन नदी के पानी के बंटवारे के समझौते ने 37 साल पुरानी कधवन डैम परियोजना को फिर चर्चा में ला दिया है. संभावित डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों के लोग मुआवजे और पुनर्वास को लेकर चिंतित हैं.

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संदीप कुमार की रिपोर्ट

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केतार (गढ़वा): सोन नदी के पानी के बंटवारे को लेकर बिहार और झारखंड के बीच हुए समझौते के बाद करीब 37 साल पुरानी इंद्रपुरी जलाशय परियोजना-2 यानी कधवन डैम एक बार फिर चर्चा में है. परियोजना को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने के साथ संभावित डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों के लोगों की चिंता भी बढ़ गयी है. ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि यदि परियोजना आगे बढ़ती है और उनकी जमीन-मकान डूब क्षेत्र में आते हैं, तो मुआवजा किस आधार पर तय होगा और उनके पुनर्वास की व्यवस्था कैसे होगी.

सोन तट के गांवों में फिलहाल चर्चा पानी के बंटवारे से ज्यादा जमीन, घर और पुश्तैनी बसावट को लेकर है. कई परिवारों का कहना है कि वे पीढ़ियों से यहां रहकर खेती-बारी कर रहे हैं, लेकिन उनके पास जमीन से जुड़े सभी कागजात उपलब्ध नहीं हैं. ऐसे में यदि मुआवजे के लिए सिर्फ कागजी स्वामित्व को आधार बनाया गया, तो बड़ी संख्या में परिवारों के सामने परेशानी खड़ी हो सकती है.

1989 में हुआ था कधवन परियोजना का शिलान्यास

कधवन परियोजना का शिलान्यास वर्ष 1989 में खैरवा-कधवन सीमा से सटे क्षेत्र में तत्कालीन बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा और तत्कालीन क्षेत्रीय विधायक राज राजेंद्र प्रताप देव ने किया था. वर्ष 1990 के चुनाव के बाद सरकार बदलने समेत कई राजनीतिक और प्रशासनिक कारणों से परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी. अब 31 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में बिहार और झारखंड के बीच सोन जल बंटवारे को लेकर हुए समझौते के बाद इस पुरानी परियोजना की चर्चा फिर तेज हो गई है.

7.75 एमएएफ पानी के बंटवारे पर हुआ समझौता

समझौते के अनुसार सोन नदी के कुल 7.75 मिलियन एकड़ फीट (एमएएफ) पानी में बिहार को 5.75 एमएएफ और झारखंड को 2 एमएएफ हिस्सेदारी मिलेगी. पुराने परियोजना प्रस्ताव के अनुसार कधवन जलाशय के लिए करीब 17,425 हेक्टेयर भूमि के अधिग्रहण की जरूरत बतायी गयी थी. इसमें करीब 2,061 हेक्टेयर वन भूमि शामिल थी. पूर्व परियोजना रिपोर्ट में बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुल 41 गांवों के संभावित डूब क्षेत्र में आने का उल्लेख किया गया है.

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गढ़वा के सोन तट पर सबसे ज्यादा बेचैनी

गढ़वा जिले के केतार प्रखंड के सोन तट से जुड़े कधवन, खैरवा, चांदडीह, बीजडीह, गम्हरिया, सोनबरसा, पाचाडुमर, बतोकला, जोगियाबीर, छाताकुंड, अमवाडीह, परती कुशवानी, पिपरा, चनना, रजखड़ और खोखा समेत कई गांव-टोले संभावित प्रभाव क्षेत्र में बताये जाते हैं. स्थानीय स्तर पर करीब 40 हजार आबादी के प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है.

परियोजना की चर्चा के साथ इन गांवों के लोगों की चिंता सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं है. ग्रामीणों का सवाल है कि वर्षों से बसे मकान, पेड़, कुएं, सिंचाई के साधन और अन्य परिसंपत्तियों का आकलन किस तरह किया जायेगा. जिन परिवारों के पास जमीन के पूरे कागजात नहीं हैं, उनके अधिकार कैसे तय होंगे, इसे लेकर भी ग्रामीण स्पष्ट नीति की मांग कर रहे हैं.

भानु के बाद राजाराम की सक्रियता से बढ़ी सियासी गर्मी

कधवन परियोजना को लेकर अब राजनीतिक सक्रियता भी बढ़ने लगी है. पूर्व विधायक सह भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष भानु प्रताप शाही ने कधवन से खोखा तक संभावित विस्थापन और मुआवजे का मुद्दा उठाया है. इसके बाद सोमवार को बिहार के काराकाट सांसद राजाराम सिंह कुशवाहा ने खैरवा, कधवन, बीजडीह, चांदडीह, पाचाडुमर और छाताकुंड समेत कई गांवों का दौरा किया.

सांसद ने ग्रामीणों से मुलाकात कर संभावित विस्थापन, जल बंटवारे, मुआवजे और ग्रामीणों के अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की. उन्होंने इस मामले को लेकर निर्णायक लड़ाई लड़ने की बात कही. दो राज्यों के बीच पानी के समझौते के बाद पड़ोसी क्षेत्र के सांसद का प्रभावित गांवों में पहुंचना कधवन मुद्दे के बढ़ते राजनीतिक दायरे का संकेत माना जा रहा है.

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पहले सर्वे और पुनर्वास तय हो, फिर हो भूमि अधिग्रहण

ग्रामीणों की मांग है कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू करने से पहले संभावित प्रभावित गांवों और परिवारों का पारदर्शी सर्वे कराया जाए. सर्वे में केवल जमीन ही नहीं, बल्कि मकान, पेड़-पौधे, कुएं, सिंचाई के साधन और अन्य परिसंपत्तियों को भी शामिल किया जाए. साथ ही लंबे समय से जमीन पर कब्जा और आवास रखने वाले परिवारों के अधिकार भी स्पष्ट किए जाए. ग्रामीणों का कहना है कि पहले डूब क्षेत्र का स्पष्ट सर्वे, प्रभावित परिवारों की पहचान, मुआवजे का आधार और पुनर्वास की ठोस योजना सामने आनी चाहिए. इसके बाद ही भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए.

37 साल बाद खुली फाइल, अब असली परीक्षा पुनर्वास की

कधवन डैम की फाइल यदि तीन दशक से अधिक समय बाद फिर खुलती है, तो चुनौती सिर्फ बांध निर्माण और सोन के पानी के बंटवारे की नहीं होगी. इससे बड़ी चुनौती उन परिवारों के भविष्य की होगी, जिनकी जमीन और घर संभावित जलाशय क्षेत्र में आ सकते हैं. यही वजह है कि कधवन में अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि डैम बनेगा या नहीं. सोन किनारे बसे लोगों का सवाल इससे आगे का है - अगर गांव उजड़ेंगे, तो कौन उजड़ेगा, उसे कितना मुआवजा मिलेगा और उसका पुनर्वास कहां होगा? आने वाले दिनों में यही सवाल कधवन की सियासत और परियोजना की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है.

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