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झारखंड के ग्रामीण इलाकों में विद्युतीकरण बढ़ा, लेकिन आदिवासियों की एक बड़ी आबादी किरोसिन तेल पर निर्भर

स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज (SAIS) द्वारा किये गये एक अध्ययन में झारखंड के लोगों की बिजली तक पहुंच, क्लीन कुकिंग और कोयले पर निर्भरता को शामिल किया गया था.

By Rajneesh Anand
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Energy transition in Jharkhand
Energy transition in Jharkhand
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प्रधानमंत्री सौभाग्य योजना को लाॅन्च हुए देश में पांच वर्ष होने को आये है बावजूद इसके झारखंड में आदिवासी समाज की बिजली तक पहुंच और उसके प्रयोग को लेकर जो आंकड़े सामने आ रहे हैं वे ना सिर्फ चौंकाने वाले हैं, बल्कि राज्य सरकार के लिए मंथन का विषय भी हैं.

स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनेशनल स्टडीज (SAIS) द्वारा किये गये एक अध्ययन में झारखंड के लोगों की बिजली तक पहुंच, क्लीन कुकिंग और कोयले पर निर्भरता को शामिल किया गया था. इस अध्ययन का शीर्षक एनर्जी इन रूरल झारखंड है और इसकी शुरुआत 2019 में हुई थी और 2021 में इसका फाॅलोअप किया गया. इस रिपोर्ट को बुधवार को एक वेबिनार के जरिये प्रकाशित किया गया.

रिपोर्ट में जो सबसे निराश करने वाली बात उभरकर सामने आ रही है वह है ग्रामीण इलाकों में आदिवासी जनसंख्या की रौशनी के लिए किरोसिन तेल के लालटेन पर निर्भरता. अध्ययन के अनुसार प्रदेश में विद्युतीकरण की दर में थोड़ा सुधार हुआ जो 87 प्रतिशत से बढ़कर 89 प्रतिशत हो गयी है, लेकिन सबके लिए बिजली तक पहुंच दूर की कौड़ी ही है. प्रदेश में किसी भी तरह की बिजली चाहे वो ग्रिड की हो, सोलर की हो या डीजल जनरेटर की हो उसकी पहुंच 89 प्रतिशत है. हालांकि बिजली के लिए ग्रिड का उपयोग करने वाले परिवारों का अनुपात 84 प्रतिशत रहा. लेकिन बिजली से इनकी दूसरी की एक वजह बिजली का बिल हो सकता है, ऐसा अध्ययन में माना गया है.

अध्ययन में इस बात का खुला हुआ है कि आदिवासी परिवारों में ग्रिड के बिजली का उपयोग गिरा है और रौशनी के लिए उनकी किरोसिन तेल पर निर्भरता बढ़ी है. ग्रिड के बिजली का उपयोग करने वाले परिवारों की संख्या 87 प्रतिशत से घटकर 74 प्रतिशत हो गयी है. वहीं किरोसिन तेल पर निर्भरता 11 प्रतिशत से बढ़कर 21 प्रतिशत हो गयी है . वहीं रौशनी के प्राथमिक स्रोत के रूप में मिट्टी के तेल का प्रयोग करने वाले आदिवासी समुदाय का अनुपात 32 से बढ़कर 47 प्रतिशत हो गया है.

अध्ययन में यह बात भी सामने आयी है कि झारखंड के ग्रामीण इलाकों में बिजली की आपूर्ति के घंटों में अच्छा सुधार नजर आता है, वहीं बिलिंग की समस्या वर्तमान है. अब प्रतिदिन नौ घंटे की बजाय 12 घंटे बिजली मिल रही है. मीटर वाले बिजली कनेक्शन का अनुपात 51 से बढ़कर 75 प्रतिशत हो गया है, जबकि सौभाग्य योजना के तहत बिजली कनेक्शन पाने वालों का अनुपात 33 से घटकर 23 प्रतिशत हो गया है.

सोलर एनर्जी के लिए अवसर

झारखंड के ग्रामीण इलाकों में ग्रिड बिजली की पहुंच भले ही बढ़ी हो, लेकिन अभी भी यहां सोलर इलेक्ट्रिसिटी के लिए पर्याप्त अवसर है. ग्रिड की बिजली तक पहुंच अभी भी लागत और विश्वसनीयता के लिहाज के कठिन है, इसलिए इन इलाकों में सोलर लैंप के लिए पर्याप्त अवसर हैं. जिन लोगों के पास ग्रिड की बिजली नहीं है, वे मिट्टी के तेल पर निर्भर हैं, इन लोगों के लिए सोलर लालटेन वरदान साबित हो सकता है. अध्ययन में यह बात भी सामने आयी है कि सोलर होम सिस्टम, माइक्रोग्रिड एवं सोलर लालटेन को रोशनी के प्राथमिक स्रोत के रूप में प्रयोग करने वालों का प्रतिशत तीन से बढ़ कर पांच प्रतिशत हो गया है. साथ ही इनके जरिये बिजली की आपूर्ति भी चार से बढ़कर पांच घंटे हो गयी है. यह एक शुभ सूचना है, जो अध्ययन में सामने आयी है.

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