1985 से उपेक्षित है ‘उत्कलमणि ओड़िया प्राथमिक विद्यालय’, जमीन के पट्टे से लेकर वेतन तक के लिए तरसे शिक्षक
जर्जर भवन के समक्ष खड़े बच्चे व शिक्षक-शिक्षिकाएं
पश्चिमी सिंहभूम जिले के ओड़िया बहुल क्षेत्र जैंतगढ़ में स्थापित ‘उत्कलमणि ओड़िया प्राथमिक विद्यालय’ आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है.
जैतगढ़. पश्चिमी सिंहभूम जिले के ओड़िया बहुल क्षेत्र जैंतगढ़ में स्थापित ‘उत्कलमणि ओड़िया प्राथमिक विद्यालय’ आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. वर्ष 1985-86 के शैक्षणिक सत्र में शुरू हुए इस विद्यालय को मान्यता, भवन निर्माण, जमीन का पट्टा, मिड-डे मील और शिक्षकों के वेतन जैसी बुनियादी सुविधाएं दिलाने के लिए प्रबंधन समिति के सदस्यों ने पिछले 40 वर्षों (1986 से 2026 तक) में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों से लेकर जिला स्तर के अधिकारियों तक सैकड़ों पत्र भेजे. बसंत महापात्र द्वारा 10 डिसमिल जमीन देने के बावजूद 2001 से पट्टा नहीं मिला है. वर्तमान में 97 छात्र-छात्राओं और 5 शिक्षकों के भरोसे चल रहे इस स्कूल की सुध लेने में झारखंड सरकार पूरी तरह नाकाम साबित हुई है.
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NALSA के निर्देश पर चाईबासा कोर्ट में हुई सुनवाई
सरकार की उदासीनता से तंग आकर स्थानीय लोगों और ‘सर्व भारतीय ओड़िया समाज’ ने न्याय की गुहार लगाते हुए NALSA, नयी दिल्ली के समक्ष करीब 225 पृष्ठों की रिट याचिका (संख्या-4500, दिनांक 17-06-2026) दायर की. नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के निर्देश पर 20 अगस्त 2026 को जिला विधिक सेवा समिति, चाईबासा में सुनवाई हुई. समिति के समक्ष आवेदक सुभाष चंद्र बेहेरा और डॉ. सत्यजीत प्रधान ने मजबूती से अपनी बातें रखीं. दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद माननीय न्यायाधीश ने इस महत्वपूर्ण मामले को आगे की न्यायिक कार्रवाई के लिए झारखंड हाईकोर्ट, रांची में स्थानांतरित कर दिया है.
5 हजार ओड़िया शिक्षकों की नियुक्ति की मांग
इस लंबी कानूनी लड़ाई में केवल विद्यालय का मुद्दा ही नहीं, बल्कि ओड़िया भाषियों के अधिकार से जुड़ी कई बड़ी मांगें शामिल हैं. ‘सीमांत ओड़िया पाठागार’ जैंतगढ़ द्वारा चाईबासा, जमशेदपुर और रांची आकाशवाणी केंद्रों से ओड़िया कार्यक्रमों के प्रसारण की मांग की गयी है. वहीं, ‘सर्व भारतीय ओड़िया समाज’ (चंपुआ, केंदुझर) और ‘झारखंड प्रदेश ओड़िया समाज’ द्वारा झारखंड राज्य में 5,000 ओड़िया शिक्षकों की नियुक्ति तथा अल्पसंख्यक आयोग के पुराने निर्देशों को लागू करने की जोरदार मांग उठाई गयी है. इस संघर्ष में सुभाष चंद्र बेहेरा, डॉ. सत्यजीत प्रधान, बसंत कुमार महापात्र सहित सैकड़ों ओड़िया भाषियों के हस्ताक्षर शामिल हैं, जिससे अब क्षेत्र के लोगों में एक नयी उम्मीद जगी है.
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