खाली डब्बा, खाली बोतल, ले ले मेरे यार...

Updated at : 27 May 2019 7:49 AM (IST)
विज्ञापन
खाली डब्बा, खाली बोतल, ले ले मेरे यार...

बोकारो जिले में चलता है एक हजार परिवारों का पेट कबाड़ से जुगाड़ का व्यवसाय जिला में 65 से अधिक है कबाड़ की दुकान रिफ्रेश के लिए माल जाता है कोलकाता सीपी सिंह, बोकारो :खाली डब्बा खाली बोतल ले ले मेरे यार… 1968 में आयी फिल्म नीलकमल में महमूद ने कबाड़ व्यवसाय का मर्म समझाया […]

विज्ञापन
  • बोकारो जिले में चलता है एक हजार परिवारों का पेट
  • कबाड़ से जुगाड़ का व्यवसाय
  • जिला में 65 से अधिक है कबाड़ की दुकान
  • रिफ्रेश के लिए माल जाता है कोलकाता
सीपी सिंह, बोकारो :खाली डब्बा खाली बोतल ले ले मेरे यार… 1968 में आयी फिल्म नीलकमल में महमूद ने कबाड़ व्यवसाय का मर्म समझाया था. बोकारो में इस व्यवसाय का महत्व इससे समझा जा सकता है कि कबाड़ के जुगाड़ व्यवसाय से हजारों परिवार की रोजी-रोटी चल रही है. व्यवसाय का स्वरूप ऐसा कि आम से लेकर खास तक इसमें प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं.
वैसे तो कबाड़ व्यवसाय की कोई आधिकारिक गणना नहीं है, लेकिन माना जा सकता है कि जिला में 65 से अधिक कबाड़ की दुकान है. इन दुकानों में हर तरह का रिजेक्ट आइटम संग्रहित किया जाता है. इसे बाद में रिफ्रेश करने के लिए कोलाकाता भेज दिया जाता है. कोलकाता में रिफ्रेश होने के बाद कबाड़ नये लुक के साथ दोबारा बाजार में आता है.
ऐसे जुड़ा है हर कोई कबाड़ बाजार के फायदा से : कबाड़ के बाजार से प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हर कोई जुड़ा हुआ है. दरअसल, आमलोगों पर ही पूरा का पूरा बाजार निर्भर है.
घर के इस्तेमाल किये हुए संग्रहक वस्तु (कार्टून, बोड़ा, बोतल व अन्य) को सही ठिकाना लगाने व कुछ अर्जन की सोच से ही कबाड़ रोजगार पनपता है. कबाड़ का धंधा करने वाले दुकानदारों की माने तो पूरा व्यवसाय सीढ़ीनुमा है. कबाड़ के रिफ्रेश होने तक 04 स्टेज से व्यवसाय होता है.
सबसे छोटी कड़ी घर-घर जाकर या गली-मुहल्ले से कबाड़ संग्रह करता है. बदले में कबाड़ देने वालों को पैसा भी दिया जाता है. फिर स्टेज दो में संग्रह करने वाला अपने से बड़ा संग्रहक को मुनाफा कमा कर माल बेचता है. इसमें कबाड़ की छंटनी होती है. शीशा, प्लास्टिक, कागज कार्टून आदि को अलग-अलग किया जाता है. इसके बाद हर छांटे गये माल को अलग-अलग बेचा जाता है.
कोलकाता में क्या होता है…
बोकारो जिला का सभी संग्रह को कोलकाता भेजा जाता है. छंटनी से पहुंचे उत्पाद को फैक्ट्री में रिफ्रेश किया जाता है. यदि बोतल टूटी-फूटी होती है, तो उसे गला कर नया स्वरूप दिया जाता है. वहीं अन्य बोतल को साफ-सफाई व स्टीकर लगाकर नया रूप दिया जाता है. कार्टून को दोबार कागज की लुग्दी बना कर पेपर या विभिन्न साइज का कार्टून बनाया जाता है. प्लास्टिक उत्पाद को भी गला कर नया स्वरूप दिया जाता है.
हर माह 100 ट्रक माल जाता है रिफ्रेश होने : कबाड़ नाम से ही निम्न स्तर के व्यवसाय का ख्याल आता है. लेकिन, इसमें कमाई इस ख्याल से बिल्कुल अलग है. चास के कबाड़ के व्यवासयी रंजन डे व बारी को-ऑपरेटिव मोड़ के व्यवसायी गुड्डू यादव की माने तो जिला में 60-65 कबाड़ के बड़े व्यवसायी हैं.
कोई कार्टून तो कोई बोतल या अन्य सामग्री का संग्रह कर रिफ्रेश करने के लिए बेचते हैं. बताते हैं : सभी उत्पाद का आकलन करें, तो हर माह कम से कम 100 ट्रक माल पूरे जिला से रिफ्रेश होने कोलकाता जाता है.
राह चलते सबसे निचले स्तर का एक कबाड़ संग्रहक ने बताया : जहां (घर या गली-मुहल्ला) से कबाड़ लिया जात है, वहां प्रति बोतल (बीयर, शराब, कैचप, सॉस) एक रुपया दिया जाता है.
इसी बोतल को फिर दो रूपया प्रति पीस के हिसाब से बड़ा कबाड़ संग्रहक को दिया जाता है. वहीं प्लास्टिक वगैरह सामग्री 08 रुपया प्रतिकिलो में लेकर 12 रुपया प्रति किलो में बड़े कबाड़ संग्रहक को दिया जाता है. बताया : प्रति दिन की कमाई 250-400 रूपये होती है.
विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola