राज्‍य गठन के 13 सालों में झारखंड की जमीनी हालात और भ्रष्टाचार पर एक नजर

By Prabhat Khabar Digital Desk
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अलग झारखंड राज्य बने 13 साल पूरे हो गये. किसी राज्य का भविष्य गढ़ने के लिए यह अवधि बहुत ज्यादा नहीं, तो बहुत कम भी नहीं है. कम से कम जमीन पर बदलाव दिखना तो शुरू हो ही जाना चाहिए. अफसोस कि ऐसा हो नहीं पा रहा है. प्रभात खबर के संवाददाताओं ने झारखंड के विभिन्न इलाकों से जमीनी रिपोर्ट भेजी. भ्रष्टाचार का जायजा लिया. इन सबसे निराशाजक तसवीर ही उभरती है. किसी राज्य की तरक्की में सबसे बड़ी भूमिका होती है शिक्षा और स्वास्थ्य की. स्कूलों, अस्पतालों की संख्या बढ़ी है, नयी-नयी योजनाएं शुरू हुई हैं, लेकिन चिकित्सा व्यवस्था और पढ़ाई-लिखाई के स्तर में सुधार की जगह गिरावट आयी है.

पुलिस विभाग जो बरसों से भ्रष्टाचार का पर्याय है, उसकी हालत जस की तस है, यानी बिना जेब गर्म किये कोई काम नहीं होता. गरीबी से जूझ रहे ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा जैसी रोजगार योजना लोगों की जिंदगी बदल सकती थी, पर भ्रष्टाचार ने इसे अपने मकसद में फेल कर दिया है. राज्य के शहरों में बुनियादी सुविधाएं कायम करने और उन्हें संवारने के लिए केंद्र सरकार समर्थित महत्वाकांक्षी योजना है जेएनएनयूआरएम, लेकिन इसमें झारखंड का प्रदर्शन फिसड्डी रहा है. हां, ई-गवर्नेस जैसे कुछ गिने-चुने क्षेत्र हैं, जहां थोड़ी प्रगति दिखती है.

* सर्व शिक्षा अभियान : स्कूल बना नहीं, पैसा निकल गया

सब पढ़ें, सब बढ़ें- सर्व शिक्षा अभियान का यह नारा भ्रष्टाचार से दागदार हो रहा है. विद्यालय भवन के निर्माण के नाम पर कोडरमा जिले में लूट मची है. डोमचांच का नावाडीह गांव घने जंगलों से घिरा है. यहां उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय के लिए 4.88 लाख रुपये की योजना वर्ष 2007-08 में मंजूर हुई. तीन लाख रुपये आवंटित हुए, पर काम अधूरा रहा. ग्राशिस (ग्राम शिक्षा समिति) अध्यक्ष तालो हांसदा व सचिव मनोज यादव ने राशि की निकासी की, पर आगे निर्माण को लेकर हाथ खड़े कर दिये. विभाग ने इसके बाद योजना की राशि बढ़ाते हुए 2012-13 में 12 लाख कर दी. इसमें से करीब 11 लाख रुपये की निकासी कर ली गयी, लेकिन काम फिर भी नहीं हुआ. ग्राशिस अध्यक्ष की मानें तो उनसे अनजाने में हस्ताक्षर करवा कर राशि निकाली गयी है.

इसी तरह सतगावां के मरचोई नईयाचक्क में पांच वर्ष से विद्यालय भवन अधूरा है. अध्यक्ष महेंद्र यादव व सचिव विनोद यादव के अनुसार फंड नहीं मिला है, पर हकीकत यह है कि राशि की निकासी हो गयी है. सतगावां की ही राजाबार पंचायत के जेठाहडीह में उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय के निर्माण में भी अनियमितता सामने आयी, पर कार्रवाई नहीं हुई. तीन माह पहले घटिया निर्माण के कारण छज्जा गिरने से संयोजिका घायल हो गयी थी. उत्क्रमित मध्य विद्यालय बेगना के निर्माण में भी अनियमितता पकड़े जाने पर विभाग ने पहले तो सचिव सह सरकारी शिक्षक को सस्पेंड कर दिया. कुछ दिन वे फरार भी रहे. बाद में ड्यूटी मिल गयी. कन्या मध्य विद्यालय मरचोई में गड़बड़ी पकड़ी गयी, तो अब विभाग सेवानिवृत्त शिक्षक के पीएफ व अन्य मद से कटौती कर पैसा वसूलने में लगा है.

- पेड़ के नीचे पढ़ाई : नावाडीह में विद्यालय भवन नहीं होने से यहां के 70 विद्यार्थी पेड़ के नीचे पढ़ते हैं. पिछले 25 अगस्त को जब यहां अधिकारी पहुंचे तो पता चला कि एक वर्ष से अधिक समय से मध्याह्न् भोजन नहीं बना है. बारिश होने पर पढ़ाई नहीं हो पाती है. सचिव मनोज यादव का कहना है कि बालू, सीमेंट, छड़ आदि मंगवा लिया गया है. जल्द काम शुरू कर देंगे. वह यह भी कहते हैं सरकार ने उन्हें छह वर्ष से वेतन नहीं दिया है.

- अधिकारी देते हैं गलत रिपोर्ट : इंजीनियर समेत कुछ अधिकारी गलत रिपोर्ट सौंपने में भी माहिर हैं. चंदवारा के विधायक प्रतिनिधि राजकुमार यादव ने प्रखंड में सर्व शिक्षा अभियान से हो रहे भवन निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए डीसी से जांच की मांग की थी. तत्कालीन डीसी उमाशंकर सिंह ने जांच का आदेश दिया. प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी ने कनीय अभियंता से जांच करवायी. आठ मई 2013 को जो रिपोर्ट सौंपी गयी उसमें आठ में से सभी योजनाओं के काम पर संतुष्टि जताते हुए सिर्फ रेलिंग निर्माण न होने की बात कही गयी. जबकि हकीकत यह थी कि अधिकतर स्कूलों की दीवारों में दरारें आ गयी थीं और छत टूट रही थी. दोबारा जांच की मांग हुई. इस बार डीसी ने प्रखंड के बीडीओ को जांच करने का आदेश दिया. बीडीओ ने 26 अगस्त 2013 के अपने पत्र में अनियमितता का पूरा उल्लेख किया है. बीडीओ ने जांच के लिए विभाग से दो बार सभी स्कूलों की मापी पुस्तिका व प्राक्कलन मांगा, पर नहीं मिला.

- जेई एक, कैसे हो निरीक्षण : सर्व शिक्षा अभियान को जिले में सिर्फ एक जूनियर इंजीनियर दिया गया है. पूरे जिले में अभियान के तहत चल रहे निर्माण कार्यो का निरीक्षण एक जेई कैसे कर सकता है. डीएसई की मानें तो उपायुक्त की ओर से कुछ जेई की ड्यूटी इस कार्य में लगायी गयी है, लेकिन वे कभी जांच करने जाते ही नहीं.

- क्या कहते हैं डीएसई : डीएसई जितेंद्र कुमार सिन्हा ने बताया कि राशि निकासी के बाद भी भवन निर्माण नहीं होना भ्रष्टाचार है. नावाडीह में विद्यालय भवन निर्माण में राशि निकासी के मामले में बीईईओ को एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दिया गया है. सतगावां के मामले में समायोजन का भी निर्देश दिया गया है. वेतन से कटौती की जा रही है. चंदवारा के मामले में एई व जेई को मौके पर भेज कर सुधार कराने को कहा गया है.

- क्या कहते हैं जानकार

सर्व शिक्षा अभियान की सही मॉनिटरिंग नहीं हो रही है. केवल नये स्कूल खोलने व बच्चों का उपस्थिति पंजी में नाम लिखने से अभियान सार्थक नहीं होगा. शिक्षा में गुणवत्ता जरूरी है. राज्य गठन के बाद से स्कूलों में शिक्षकों की कमी है. स्कूल में सबसे पहले योग्य शिक्षकों का होना अनिवार्य है. बिना योग्य शिक्षकों के शिक्षा की बेहतरी के लिये चलाया जानेवाला कोई अभियान सफल नहीं हो सकता. सर्व शिक्षा अभियान के तहत बच्चों को दी जानेवाली किताब, पोशाक व अन्य सामग्री भी समय पर नहीं मिलती.

लक्ष्मी सिंह, पूर्व चेयरमैन, जैक

- किताबों की खरीद में भी बड़ा घपला

सर्व शिक्षा अभियान के तहत राज्य के सरकारी स्कूलों में कक्षा एक से आठ तक के बच्चों को नि:शुल्क पाठय़ पुस्तकें देना है. इसमें में भी खूब बेईमानी होती है. मनचाहे प्रकाशकों को किताबों की आपूर्ति का टेंडर देने के लिए इसकी शर्तो में अधिकारी अपने हिसाब से फेरबदल करते रहते हैं. बच्चों की संख्या में भी गड़बड़ी की जाती है. झारखंड में वर्ष 2005-06 से किताबों का टेंडर हो रहा है. टेंडर झारखंड शिक्षा परियोजना करती है. वर्ष 2005-06 में किताबों पर 32 करोड़ खर्च हुए, जो 2013-14 में बढ़ कर 99 करोड़ हो गया. यानी आठ सालों में खर्च 67 करोड़ रुपये बढ़ गया. इस अवधि में बच्चों की संख्या कभी अचानक 13 लाख तक बढ़ गयी, जबकि उसके अगले वर्ष 20 लाख तक कम हो गयी.

स्कूलों में किताबों की आपूर्ति मध्याह्न् भोजन करनेवाले बच्चों को आधार बना कर करने का नियम है. लेकिन ऐसा होता नहीं. वर्ष 2009-10 में 64,26,504 सेट किताब छपाई गयी थी, जबकि उस वर्ष मध्याह्न् भोजन में बच्चों की संख्या सिर्फ 33,48,645 थी. वर्ष 2011-12 में 45 लाख बच्चों के लिए किताब छपायी गयी थी, जिस पर 45 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. इसके अगले साल भी 45 लाख बच्चों के लिए ही किताब छपायी गयी, लेकिन उस पर 75 करोड़ का खर्च आ गया.

- आपूर्ति अधूरी, भुगतान पूरा

बच्चों को भले ही आधी-अधूरी किताबें मिली हों, लेकिन शिक्षा परियोजना के पदाधिकारियों ने प्रकाशकों को पूरे पैसे का भुगतान कर दिया. साथ इन पर लगी जुर्माने की राशि भी लौटा दी गयी. वर्ष 2006-07 से 2010-11 तक प्रकाशकों का लगभग सात करोड़ रुपये रोक लिया गया था. यह जुर्माना समय पर किताब नहीं देने और कम आपूर्ति के लिए लगाया गया था. प्रकाशकों ने सफाई दी कि परिस्थितिवश समय पर पुस्तकें नहीं पहुंचायी जा सकीं. हालांकि इस बारे में स्पष्ट तौर पर कुछ भी नहीं बताया कि किन परिस्थितियों में यह विलंब हुआ था.

जनवरी 2013 में इनका भुगतान किया गया, जबकि वर्ष 2012-13 में सभी बच्चों को किताबें नहीं मिली. गत शिक्षा सत्र में किताबें अप्रैल के बजाय अगस्त में स्कूल पहुंचीं. इसके बावजूद प्रकाशकों को भुगतान कर दिये जाने से सवाल खड़े हो रहे हैं. समय पर किताब नहीं देने के कारण प्रकाशकों पर लगे जुर्माने की राशि को विशेष परिस्थिति बता कर भुगतान कर दिया गया. जबकि टेंडर की शर्त के अनुसार प्रकाशक को राशि का भुगतान नहीं किया जाना चाहिए था. भूकंप, बाढ़ या अन्य प्राकृतिक आपदा जैसी स्थिति में ही प्रकाशकों के लिए दंड में छूट का प्रावधान है.

* जननी सुरक्षा योजना : प्रसव के लिए सरकारी अस्पतालों पर भरोसा नहीं

हजारीबाग जिले में वर्ष 2012-13 में 37 हजार महिलाएं मां बनीं. इनमें से लगभग 10 हजार ने घर में ही बच्चे को जन्म दिया. इनमें से सिर्फ 2266 को एएनएम की देखभाल मिल पायी. नर्सिंग होम में 8316 महिलाओं और सरकारी अस्पताल में 18,856 महिलाओं ने बच्चे को जन्म दिया. यानी, लगभग आधी महिलाओं को सरकारी सेवाओं पर भरोसा नहीं है. इससे राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के तहत चल रही जननी-शिशु सुरक्षा योजना की हकीकत खुद-ब-खुद सामने आ जाती है.

हजारीबाग जिले में सदर अस्पताल समेत 40 प्रसव केंद्र हैं. बरही प्रखंड में पांच केंद्र हैं. इनमें पंचमाधव, कुंदवा में प्रसव होते हैं, जबकि गुडियो, तिलिरकरमा और करियातपुर केंद्रों में संसाधन न होने के कारण प्रसव नहीं होते. बड़कागांव प्रखंड में तीन प्रसव केंद्र में से सिर्फ पलांडू में प्रसव हो रहे हैं. केवलदिन में. सिंदवार, सिकरी में प्रसव नहीं होते हैं. बरकट्ठा प्रखंड के चार केंद्रों में बेड़ोकला में प्रसव नहीं होता है. मानगो, गोरहर और खैरो में दिन में यह सुविधा है.

विष्णुगढ़ के पांच प्रसव केंद्र नरकी, गोविंदपुर, होलंग, चलकरी, गाल्होबार और रामपुर संसाधनों के कमी के बाजवूद काम कर रहे हैं. चौपारण प्रखंड के तीन केंद्रों और चुरचू प्रखंड के चार केंद्रों में दिन में प्रसव कार्य होते हैं. जबकि कजरी में प्रसव नहीं हो रहा है. इचाक के चार केंद्रों देवकुली, बोंगा, दरिया और जरगा में दिन में प्रसव हो रहा है. कटकमसांडी के चार केंद्रों डांटोखुर्द, पुंदरी, कंडसार व लेम में नाममात्र प्रसव सुविधाएं हैं. इस प्रखंड की गर्भवती महिलाएं हजारीबाग शहर में प्रसव कराती हैं. केरेडारी में चार केंद्रों में से हेवई, पचड़ा और पगार में प्रसव कार्य नहीं हो रहा है. वहीं गोपदा केंद्र में इस वित्तीय वर्ष में मात्र चार प्रसव हुए हैं. सदर प्रखंड के चार प्रसव केंद्रों की हालत भी खस्ता है.

जिले की 37 हजार गर्भवती महिलाओं में सात हजार में एनीमिया (खून की कमी) पाया गया. 237 महिलाओं में हेमोग्लोबिन सात एचबी से कम पाया गया. 6954 महिलाओं में हेमोग्लोबिन 11 एचबी से कम मिला.

- 1400 रुपये का भुगतान नहीं : प्रसव के बाद महिला को 1400 रुपया का भुगतान जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के तहत होना है. साल-साल भर से इस राशि का भुगतान नहीं हो रहा है. पूरे राज्य में कमोबेश यही स्थिति है.

- एक जच्चा की आपबीती

कटकमदाग गांव की गीता देवी प्रसव के लिए सहिया सालेहा खातून और परिवार के साथ गत 2 अक्तूबर को रात 11 बजे ममता वाहन से सदर अस्पताल पहुंची. उसे जो बेड मिला, उस पर पहले से एक महिला थी. सुबह चार बजे गीता का प्रसव हुआ. दादी शारदा देवी ने बताया कि एक दाई आयी और कहा कि बेटा हुआ है, 500 रुपया दो. शारदा देवी ने कहा कि सरकार अस्पताल काहे खोलले है. चाय, पानी ल ही पैसा देबौ. इस पर दाई गुस्सा कर भागने लगी. हमलोग फिर पीछे-पीछे दाई के पास गये. बोले सौ रुपया ले लो. लेकिन दाई नहीं मानी. बोली अकेले पैसा थोड़ी लेवे लगल हियौ. सबके देवेके है. इस पर बहुत देर तक बात होती रही. गीता की मां तेतरी देवी ने सुबह चार बजे 350 रुपया दाई को दिया. तब जाकर प्रसव कक्ष से जच्चा-बच्चा को लाकर उसी बेड पर सुलाया गया, जिस पर पहले से एक महिला नवजात बच्चे को लेकर सोयी हुई थी. दवा के लिए कोई पैसा नहीं मिला.

- 11 जिलों में स्थिति बदतर

झारखंड के 11 जिलों में मातृ-शिशु स्वास्थ्य की स्थिति सबसे खराब है. दुमका, गोड्डा, सिमडेगा, सरायकेल-खरसावां, गुमला, लातेहार, लोहरदगा, पाकुड़, पलामू, साहेबगंज व पश्चिमी सिंहभूम- ये 11 जिले देश के उन 184 जिलों में शामिल हैं, जहां विशेष अभियान चलेगा. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है. यह स्थिति तब है, जब राज्य में मातृ-शिशु सुरक्षा से जुड़े कार्यक्रमों पर एनआरएचएम के तहत लगभग 85 करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके हैं. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, दो वर्षों के दौरान माह भर के बच्चों की मृत्यु दर में सुधार नहीं हुआ है. झारखंड में आज भी 30 फीसदी प्रसव घर में हो रहे हैं. 15 फीसदी बच्चों का टीकाकरण नहीं हो रहा. राज्य के 32-35 फीसदी इलाके बगैर सहिया के हैं.

- संस्थागत प्रसव सिर्फ 37.6 फीसदी

संस्थागत प्रसव से जच्च-बच्च की सुरक्षा सुनिश्चित होती है. संस्थागत प्रसव यानी अस्पताल, नर्सिग होम आदि में प्रसव. कुशल व प्रशिक्षित हाथों से प्रसव होना मातृ-शिशु मृत्यु रोकने के लिए जरूरी है. सरकार संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देती है. झारखंड में संस्थागत प्रसव सिर्फ 37.6 फीसदी है. यानी लगभग 62 फीसदी प्रसव या तो घरों में होते हैं या फिर अकुशल दाई के हाथों. ममता वाहन योजना से संस्थागत प्रसव में वृद्धि हुई है, लेकिन दूरदराज के इलाकों में तथा रात के वक्त वाहन मिलने में परेशानी हो रही है. चालक सेवा देने से इनकार करते हैं. वाहन मालिकों का कहीं-कहीं पैसा भी बकाया है.

- पाकुड़ में सिजेरियन नहीं

पाकुड़ जिले में आपरेशन से प्रसव की सुविधा नहीं है. यहां वर्ष 2012-13 के दौरान एक भी सिजेरियन नहीं हुआ. वहीं पूर्वी सिंहभूम के एफआरयू में सिर्फ एक सिजेरियन हुआ. सबसे अधिक सिजेरियन हजारीबाग में (401) हुए. इसके बाद रांची (256), पलामू (186), साहेबगंज (157), गोड्डा (138), गिरिडीह (135) व दुमका (109) जिले हैं.

- ईमानदार प्रयास की जरूरत

सेवानिवृत्त चिकित्सक डॉ एसएस सिंह कहते हैं कि राज्य में 192 पुराने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. इनमें से करीब सौ में कोई प्रभारी चिकित्सक नहीं है. सरकार ने वर्ष 2004 में अनुबंध पर एएनएम की नियुक्ति की थी. आठ वर्षो में इन्हें कोई इंक्रीमेंट नहीं मिला. इनका मनोबल गिरा हुआ है. स्वास्थ्य केंद्रों के आधे स्टाफ इसके पांच किमी के दायरे में नहीं रहते. ऐसे में स्वास्थ्य कार्यक्रम कैसे बेहतर चलेंगे?

* मोबाइल स्वास्थ्य सेवा : बेकार खड़ी हैं बसें

ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए मोबाइल मेडिकल यूनिट (एमएमयू) सेवा है. वर्ष 2008 में 24 बसों से इसकी शुरुआत हुई. बाद में इनकी संख्या 103 पहुंच गयी. अभी इनमें से 99 बसों का संचालन हो रहा है. विभिन्न जिलों को तीन से छह बसें मिली हैं जो एनजीओ के जरिये संचालित हो रही हैं. सभी बसों में स्वास्थ्य उपकरण लगे हैं. विशेषज्ञ न होने के कारण एक वर्ष पहले बसों से अल्ट्रासाउंड मशीनें हटा ली गयीं. मोबाइल स्वास्थ्य सेवा निगरानी के अभाव में खस्ता हाल है. यह काम संबंधित सिविल सजर्नों का है, लेकिन उन्हें परवाह नहीं. बसों के किसी गांव में जाने का दिन भी तय नहीं था. छह माह पहले रोस्टर तो बना, लेकिन उसका पालन नहीं हो रहा. इन बसों पर अब तक लगभग 102 करोड़ रुपये खर्च किये गये हैं.

एमएमयू संचालक एनजीओ को गत छह माह से भुगतान नहीं हुआ है. बसें बेकार खड़ी हैं या फिर कागजों पर इन्हें चलाया जा रहा है. 99 बसों में से 70 से अधिक में दवाएं भी नहीं है. संविदा पर कार्यरत डॉक्टर भी कन्नी काट रहे हैं. केंद्र ने वर्ष 2012-13 की समाप्ति पर घोषणा की कि एनआरएचएम के तहत संचालित मोबाइल स्वास्थ्य सेवा की सभी बसों को एक खास रंग व डिजाइन होना चाहिए. यह काम पूरा कर इसकी रिपोर्ट उसे सौंपी जाये. तभी संचालन मद का बजट पास होगा. झारखंड में छह महीने में यह काम पूरा नहीं हुआ है. इसलिए पैसा नहीं मिल रहा और एनजीओ को भुगतान (औसतन 1.75 लाख/माह) बंद है. एमएमयू की प्रभारी डॉ मंजू कुमारी बताती हैं कि अब मॉनिटरिंग के लिए सभी एमएमयू में जीपीएस सिस्टम लग रहा है. डॉक्टरों की कमी है, जिससे इस सेवा पर असर पड़ रहा है.

* केस स्टडी : सिटिजन फाउंडेशन विभिन्न जिलों में 15 एमएमयू का संचालन करता था. गिरिडीह में एक बस (जेएच01 एल-3022) लोगों ने जला दी. डेढ़ वर्ष हो गये, दूसरी बस नहीं मिली.

* एडिशनल पीएचसी : न डॉक्टर हैं और न ही दवा का इंतजाम

राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं की हकीकत जाननी हो, तो मैकलुस्कीगंज का अस्पताल एक केस स्टडी हो सकता है. यहां स्थित अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (एडिशनल पीएचसी) 1950 के दशक में बना था. स्थानीय बुजुर्गो के अनुसार, तब इसकी हालत अच्छी थी. डॉक्टर यहीं रहते थे, इलाज करते थे. अब स्थिति बदल चुकी है. अभी यहां चार डॉक्टर नियुक्त हैं, पर उन्हें खोजना आसान नहीं है. स्वास्थ्य केंद्र एक नर्स लक्ष्मी देवी के भरोसे चल रहा है. सिविल सजर्न डॉ डीके सिंह से इस संबंध में पूछने पर उन्होंने कहा कि प्रभारी डॉ नरेश प्रसाद सिन्हा से पूछ लें. डॉ सिन्हा से पूछने पर पता चला कि यहां तीन डॉक्टर पदस्थापित हैं. डॉ आनंद शेखर झा, डॉ प्रफुल चंद्र झा व डॉ हिमांशु शेखर. इस सवाल पर कि ये डॉक्टर अस्पताल क्यों नहीं आते, डॉ नरेश ने कहा कि मुङो पता नहीं है. प्रभारी चिकित्सक सहित चार चिकित्सकों व अन्य कर्मचारियों के वेतन व स्थापना मद का कुल खर्च लगभग चार लाख रुपया प्रति माह है.

दूरदराज के इलाके में स्थित इस अस्पताल में दवाइयां भी नहीं मिलतीं. हाल ही में करकटा बस्ती में एक बच्चे की डायरिया से मौत हो गयी. बच्चे की मौत के बाद स्वास्थ विभाग की टीम हरकत में आयी. इसके बाद बस्ती के लोगों का इलाज हुआ. इस पुराने स्वास्थ्य केंद्र के पीछे एक नया भवन कुछ वर्ष पहले बनाया गया था, लेकिन वह बेकार पड़ा है. इसका उद्घाटन तक नहीं किया जा सका है. अब नया भवन जजर्र हो रहा है.

मैकलुस्कीगंज पर्यटन स्थल है. हाल के वर्षो में यहां कई निजी विद्यालय खुले हैं, जहां छात्रवास भी हैं. यहां बाहर के विद्यार्थी रह कर पढ़ते हैं. मैकलुस्कीगंज थाने में करीब तीन सौ जवानों को रखा गया है. इन सबको प्राथमिक उपचार के लिए सीसीएल के अस्पताल पर निर्भर रहना पड़ता है. दरअसल मैकलुस्कीगंज व आसपास के लगभग 25 गांवों के लगभग 50 हजार लोग इसी अस्पताल के भरोसे हैं. मामला थोड़ा भी गंभीर होने पर ग्रामीणों को रांची जाना पड़ता है.

* सदर अस्पताल : 24 डॉक्टर, फिर भी मरीज हो रहे रेफर

मेदिनीनगर सदर अस्पताल में पहुंचनेवाले 90 प्रतिशत से अधिक गंभीर मामले रांची के लिए रेफर कर दिया जाते हैं. क्योंकि, अस्पताल में आइसीयू नहीं है. डायग्नोसिस सेंटर बन गया है, पर रेडियोलॉजिस्ट नहीं रहने के कारण सीटी स्कैन की व्यवस्था नहीं है. इन दोनों सुविधाओं के अभाव में अधिकतर मामलों को रेफर किया जाता है. विभागीय सूत्रों के मुताबिक यहां सृजित पद से अधिक डाक्टर हैं. 15 पदों के विरुद्ध 24 डाक्टर कार्यरत हैं. इसके बावजूद अस्पताल अपने मकसद में सफल नहीं है.

- भवन नया, पर सुविधाएं नहीं : सदर अस्पताल का नया भवन बना है. पर अपेक्षित सुविधाएं नहीं होने के कारण उसका लाभ लोगों को नहीं मिल रहा है. 19 लाख की आबादीवाले पलामू जिले की बड़ी आबादी इसी अस्पताल पर निर्भर है. ब्रिटिश शासनकाल में ही इस अस्पताल की नींव पड़ी थी. इस अस्पताल में पिछले दो माह से सिजेरियन प्रसव नहीं हो रहे हैं, क्योंकि ऑपरेशन किट नहीं है. मजबूरन प्रसव के लिए निजी अस्पताल जाना पड़ रहा है.

- नवजात शिशु केंद्र नहीं : सरकार ने नवजात देखभाल इकाई बनाने के लिए 25 लाख रुपये उपलब्ध कराया था, पर अभी तक इस इसकी स्थापना नहीं हुई. अगर ऐसा होता तो शिशु मृत्युदर में जरूर कमी आती. सदर अस्पताल के बारे में आम राय यही है कि यहां सर्दी, खासी, बुखार से ऊपर इलाज की कोई व्यवस्था नहीं है.

- दुर्घटना होने पर सीधे रेफर : सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने या गोली लगने की स्थिति में मरीज को सीधे रांची रेफर किया जाता है. चिकित्सक बताते हैं कि यदि सिर में गंभीर चोट लगी है तो यहां सीटी स्कैन की व्यवस्था नहीं है. तीन करोड़ की लागत से वर्ष 2008 में डायग्नोसिस सेंटर बना था. बताया जाता है कि मशीन भी खराब हो गयी है. एक साल पहले यह बात उजागर हुई थी कि जो मशीन मेदिनीनगर में को दी गयी है, वह चाईबासा से रिजेक्ट कर दी गयी थी. इसकी जांच के लिए कमेटी भी बनी, लेकिन बात आयी-गयी हो गयी.

- संसाधनों की बर्बादी : अस्पताल का नया भवन 300 बेड वाला है. 24 डाक्टर तैनात हैं. इसके बावजूद अगर काम नहीं हो रहा है, तो इसे संसाधनों की बर्बादी ही कहा जायेगा. दो माह पहले तत्कालीन स्वास्थ्य सचिव के विद्यासागर अस्पताल का निरीक्षण करने आये थे. उन्होंने अस्पताल की स्थिति पर नाराजगी जतायी थी.

- सुधार की पहल : सदर अस्पताल की व्यवस्था में सुधार के लिए जिले के उपायुक्त ने पहल की है. पहले ओपीडी का समय सुबह 9 बजे से दोपहर एक बजे तक था, अब तीन बजे तक किया गया है. इसीजी, खून जांच आदि की व्यवस्था ओपीडी के समय तक ही थी, जिसे अब 24 घंटे किया गया है. अस्पताल में दलालों पर रोकथाम के लिए कर्मचारियों को परिचय पत्र दिया गया है. अस्पताल परिसर में सीसीटीवी लगाने की भी योजना है, ताकि कामकाज की निगरानी हो सके. ओपीडी में रोज 400-500 मरीज पहुंचते हैं. मरीजों से पांच रुपये शुल्क लिया जा रहा है. ताकि अस्पताल बेहतर तरीके से चले. साफ-सफाई की व्यवस्था हो, इस दिशा में भी प्रयास हो रहा है.

- बस नाम का जन औषधि केंद्र

हजारीबाग सदर अस्पताल परिसर में 27 सितंबर 2012 को जेनरिक दवा बिक्री केंद्र खुला. इसके संचालन की जिम्मेदारी अस्पताल प्रबंधन समिति को सौंपी गयी. समिति में अध्यक्ष डीसी, सचिव सिविल सजर्न और सदस्य के रूप में स्वयंसेवी संगठनों के प्रतिनिधि व अस्पताल के अधिकारी रखे गये. दवा बिक्री की जवाबदेही दो फर्मासिस्टों को सौंपी गयी. दुकान में 45 जेनरिक दवाएं उपलब्ध करायी गयीं. उपलब्ध दवाओं की सूची अस्पताल के सभी चिकित्सकों को उपलब्ध करायी जाती है. ओपीडी में भी सूची लगायी जाती है. इस कवायद के बाद भी कुछ खास नतीजा नहीं निकला. ओपीडी में रोज लगभग एक हजार मरीज आते हैं. लेकिन सौ मरीजों को भी जेनरिक दवा नहीं मिल पाती है.

* डॉक्टर जेनरिक दवाएं नहीं लिखते

सैकड़ों की तादाद में मरीज डॉक्टर का परचा लेकर जेनरिक दवा दुकान पहुंचते हैं. लेकिन परचे पर जेनरिक दवा नहीं लिखी रहती है. मजबूरन उन्हें वहां से निजी दुकानों की ओर जाना पड़ता है. जेनरिक दवा की सूची डॉक्टर के पास होने के बावजूद वे ऐसी-ऐसी कंपनियों की दवाएं लिखते हैं जो बाजार में जेनरिक दवा की तुलना में चार गुना महंगी हैं. डॉक्टर प्रतिदिन 40 से 50 मरीजों को ही जेनरिक दवाएं लिखते हैं. इसके चलते जेनरिक दवा दुकानों में बिक्री कम होती है. इसका असर जेनरिक दवाओं के भंडार पर पड़ा है. जब जन औषधि केंद्र की शुरुआत हुई थी, तब 200 जेनरिक दवाओं में 45 उपलब्ध थीं, पर अब ये घट कर महज 25-30 रह गयी हैं.

* महंगी दवाओं से परेशान गरीब

डॉक्टरों के परचे में जिस कंपोजिशन की दवा लिखी रहती है, उस कंपोजिशन की दवा जेनरिक दुकान में उपलब्ध रहती है. पर डॉक्टर जेनरिक दवाएं न लिख कर ब्रांडेड दवाएं ही लिखते हैं. डॉक्टरों के परचे में काफी महंगी-महंगी दवाएं ऐसी कंपनियों की लिखी जाती हैं, जो जन औषधि केंद्र में उपलब्ध नहीं होतीं. गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति ऐसी महंगी दवाओं को मुश्किल से ही ले पाते हैं.

- डॉक्टरों-दुकानदारों की सांठगांठ

जेनरिक दवा दुकान में बैठनेवाले फार्मासिस्ट से बात की गयी कि क्या ओपीडी में बैठनेवाले डॉक्टरों को प्रतिदिन जेनरिक दवा का स्टॉक बताया जाता है. इस पर उन्होंने बताया कि ओपीडी में बैठनेवाले डॉक्टरों को यह जानकारी रहती है. लेकिन फिर भी डॉक्टर जेनरिक दवाएं नहीं लिखते हैं. दवा कारोबार से जुड़े कुछ लोगों के अनुसार, अगर डॉक्टर जेनरिक दवा लिखते हैं, तो रोगियों को इसके कंपोजिशन और कम कीमत के बारे में जानकारी होने लगेगी. इसके बाद गांव से लेकर शहर तक के लोग सस्ती दर पर जेनरिक दवा की मांग शुरू कर देंगे. और, डॉक्टरों और दवा दुकानदारों की सांठगांठ से जो चांदी अभी कट रही है, वह बंद हो जायेगी.

* सेवा का अधिकार : महीनों चक्कर काटा नहीं बना राशन कार्ड

सर! मैं दूसरे के घरों में काम करती हूं. पति गैरेज में गाड़ी बनाते हैं. माह का 700-800 रुपये ही जुटा पाती हूं. बच्चे को देखूं कि घर का राशन जुटाऊं. पता चला कि गरीबों के लिए राशन कार्ड बन रहा है. तो हमने भी अपने पूरे परिवार के साथ फोटो खिंचवायी. लेकिन, सात माह हो गये अब तक राशन कार्ड नहीं बन पाया है. यह कहना है लोहरा कोचा निवासी रूबी देवी का. रूबी कहती है कि राशन कार्ड के लिए कार्यालय में जाकर खुद से कई बार आवेदन जमा किये. लेकिन, कुछ नहीं हुआ.

कार्यालय में जाने पर बताया जाता है कि परेशान न हो कार्ड बन जायेगा. लेकिन, कब बनेगा यह बता पाने में अधिकारी असमर्थ हैं. यही हाल कांछी देवी की भी है. इनके पास भी राशन कार्ड नहीं है. वह कह रही थी कि आवेदन पत्र जमा किये आठ माह हो गये लेकिन, अब तक राशन कार्ड नहीं मिला. 50 वर्षीय बिशुन निषाद 15 साल से बगैर राशन कार्ड के हैं. छोटी-सी दुकान है चलाते हैं. वह कहते हैं कि राशन कार्ड के लिए कई बार आवेदन दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ. सेवा के अधिकार कानून के तहत विभिन्न कार्यो के लिए कार्य दिवस तय कर दिये गये हैं. नया राशन कार्ड दो माह में उपलब्ध कराना है. लेकिन महीनों चक्कर काटने के बावजूद काम नहीं हो रहा है.

* क्या कहते हैं अधिकारी : विशिष्ट पदाधिकारी अनुभाजन प्रमोद कुमार सिंह कहते हैं कि सारे राशन कार्ड को आधार से जोड़ना है. इस वजह से देर हो रही है. पायलट प्रोजेक्ट के तहत ओरमांझी में राशन कार्ड का वितरण शुरू किया जायेगा. शेष कार्ड का सीडिंग कार्य प्रगति पर है. सारे लोगों को जल्द ही राशन कार्ड उपलब्ध करा दिया जायेगा.

* मनरेगा : ग्रामीण रोजगार का बंटाधार

वर्ष 2006-07 में मनरेगा की शुरुआत हुई थी. तब से लेकर अब तक मनरेगा में 10,262,677 परिवारों को रोजगार मिला है. इस दौरान कुल 2,848,674 योजनाएं ली गयीं, जिनमें से सिर्फ 4,39,527 योजनाएं पूरी हुईं. मनरेगा पर कुल 8768 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, जबकि उपलब्ध राशि 11,709 करोड़ रुपये थी. ये सभी सरकारी आंकड़े हैं. मनरेगा की बदहाली जानने के लिए हम पलामू जिले को बतौर उदाहरण ले रहे हैं.

पलामू में मनरेगा के तहत निबंधित परिवारों की संख्या 2 लाख 26 हजार है. चालू वित्त वर्ष के आंकड़ों के मुताबिक अभी तक 7.5 लाख मानव दिवस का सृजन हुआ है. इस वर्ष का श्रम बजट 36 करोड़ रुपये का है. मनरेगा में निबंधित परिवारों में से आधे से भी कम मजदूर रोजगार मांगते हैं. इसका कारण यह है कि जब मनरेगा शुरू हुई तो उस दौरान जो जॉबकार्ड बना, कई संपन्न लोगों ने भी अपना नाम निबंधित करा लिया. अब अभियान चलाकर बोगस कार्ड निरस्त करने का निर्देश दिया गया है. लोगों की मानें तो मनरेगा में मजदूरों के भुगतान की प्रक्रिया में गड़बड़ी होती है. फरजी नाम पर पैसे निकाल लिये जाते हैं.

मनरेगा के मजदूरों का भुगतान डाक घर के माध्यम से होता है. गलत तरीके से मजदूरी की राशि निकाल लेने के जो मामले आते हैं, उनमें मेठ से लेकर पोस्ट मास्टर तक की मिलीभगत होती है. सवाल भी उठते हैं, शिकायत भी सामने आती हैं, पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती, इसलिए घपलेबाज बेफिक्र रहते हैं. उम्मीद थी कि जब पंचायत चुनाव होगा तो भ्रष्टाचार पर कुछ लगाम लगेगी, पर ऐसा नहीं हो पाया.

किसी योजना में सिर्फ एक ही जाति के मजदूर काम करें, वह भी मुखिया के स्वजातीय, तो क्या संदेश जाता है. मस्टर रोल में जो नाम दर्ज हैं, उसके मुताबिक पड़वा के झरना ढोढा में जिन लोगों ने मजदूरी की है, उनमें सुदामा साव, सुकन साव, बनारी साव, मौनी साव, सन्नी साव, पचिया देवी, सुरेश साव, मीना देवी, विमला देवी, विरोधी साव, शमी साव, वीरेंद्र साव, पचिया देवी, विफनी देवी, शर्मा साव, संगीता देवी, कौशिल्या देवी हैं. जबकि इस गांव में अनुसूचित जाति व अन्य जाति के लोग भी रहते हैं. पंचायत प्रतिनिधि ही इस पर सवाल उठाते हैं.

पलामू भूख और बेकारी के लिए चर्चित रहा है. मनरेगा जैसी रोजगार की गारंटी देने वाली योजना भी यहां सफल नहीं हो सकी है. आंकड़ों के मुताबिक, अब भी यहां के मजदूर बाहर जाना ही पसंद करते हैं. पिछले तीन वर्षों में बाहर रहनेवाले 50 से अधिक मजदूरों की काम के दौरान मौत हो गयी.

मनरेगा में भी कमीशन का खेल चलता है. चर्चा के मुताबिक, मनरेगा के तहत जो योजना ली जाती है, उस पर 43 प्रतिशत कमीशन में चला जाता है. पांच प्रतिशत बीडीओ, तीन प्रतिशत ऑफिस खर्चा (प्रधान सहायक, नाजिर और डीलिंग सहायक को एक -एक प्रतिशत), पांच प्रतिशत जेई को मिलता है. इसके अलावा स्वीकृति के नाम पर भी तीन-चार प्रतिशत राशि ले लिये जाने की बात सुनने में आती है. जहां फरजी तरीके से भुगतान का मामला होता है, वहां पोस्ट मास्टर का भी कमीशन बंधा होता है.

(साथ में रांची से मनोज लाल)

- इन दो मिसालों से जानें हाल

* पहला मामला

पलामू जिले में एक प्रखंड है पड़वा. मनरेगा के तहत इस प्रखंड की मुरमा पंचायत में झरनाढोढा के गहरीकरण का कार्य स्वीकृत हुआ था. सूचना के अधिकार के तहत इस योजना को लेकर जो जानकारी मिली, वह काफी चौंकाने वाली है. 29 मई 2012 को दी गयी सूचना के मुताबिक, इस योजना पर 44 हजार 132 रुपये खर्च हुए. जब विस्तृत जानकारी मांगी गयी, तो विभाग द्वारा इसी योजना को लेकर अलग तरह की जानकारी दी गयी. 10 सितंबर 2012 को दी गयी सूचना के मुताबिक, इस योजना पर 22 हजार 66 रुपये ही खर्च हुए हैं. यानी एक ही योजना को लेकर अलग-अलग समय में दो जानकारियां उपलब्ध करायी गयीं.

यदि मई में 44 हजार 132 रुपये खर्च हुए, तो सितंबर में इसे और बढ़ना चाहिए था. पर मनरेगा का काम कैसे चल रहा है, इसका उदाहरण इस बात से समझा जा सता है कि मई में 44 हजार और सितंबर में घट कर हो गया 22 हजार रुपये. बाद में यह योजना भी बंद कर दी गयी. बीडीओ को जो रिपोर्ट दी गयी, उसमें कहा गया कि योजना पूरी होने की संभावना नहीं है.

सूचना के अधिकार के तहत योजना का जो मस्टर रोल उपलब्ध कराया गया है, उसे देखने के बाद यह साफ होता है कि सिर्फ एक ही जाति के मजदूरों ने काम किया, वह भी जो मुखिया के स्वजातीय थे. प्रखंड के उपप्रमुख वीरेद्र कुमार सिंह की मानें, तो इस योजना में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी है. जांच हो तो इसकी हकीकत सामने आ जायेगी. पर इस पर अपेक्षित ध्यान नहीं

दिया गया.

* दूसरा मामला

पलामू का एक अन्य प्रखंड है लेस्लीगंज. यहां के खैराट गांव में मनरेगा के तहत निंबंधित मजदूर सत्येंद्र मोची की फरवरी 2010 में मौत हो गयी. कहा जाता है कि मजदूर के निधन के बाद उसके नाम पर डाकघर से पैसे निकाले गये. जब उसकी पत्नी को यह जानकारी मिली, तो उसने शिकायत दर्ज करायी और बताया कि उसके पति की मौत हो गयी है. बाद में जांच के नाम पर यह सफाई दी गयी कि चूंकि उसकी पत्नी ने मनरेगा की एक योजना में काम किया था, इसलिए गलती से सत्येंद्र मोची के खाते में पैसा चला गया. बात आयी-गयी हो गयी.

- क्या कहते हैं मनरेगा आयुक्त : मनरेगा आयुक्त अरुण कुमार कहते हैं कि राज्य में इसकी प्रगति ठीक करने का प्रयास किया जा रहा है. हाल के दिनों में थोड़ा काम प्रभावित हुआ था. अब इसे ठीक कर लिया गया है. यह प्रयास किया जा रहा है इस वित्तीय वर्ष का सारा पैसा खर्च कर लिया जाये. इसके साथ दूसरे विभागों से तालमेल किया जा रहा है. उनकी योजनाओं के साथ मनरेगा का संयोजन होगा.

- राज्य में मनरेगा की स्थिति

काम मांगनेवाले परिवार 11,691,089

जिन परिवारों को काम मिला 10,262,677

कुल उपलब्ध राशि 1170948 लाख

कुल व्यय राशि 876886 लाख

कुल ली गयी योजनाएं 2,848,674

पूर्ण हुई योजनाएं 4,39,527

* ई-गवर्नेस : जमीन पर दिखने लगा ई-गवर्नेस

झारखंड में ई-गवर्नेस नजर आने लगा है. इसके जरिये राज्य की 4562 पंचायतों में न सिर्फ आम लोगों को कई प्रमाण पत्र दिये जा रहे हैं, बल्कि वाणिज्य कर विभाग और परिवहन में आनलाइन कर भुगतान भी लिया जा रहा है. राष्ट्रीय ई-गवर्नेस योजना के तहत राज्य में कई कार्य लिये गये थे. इसमें झारनेट, प्रज्ञा केंद्रों की स्थापना, इलेक्ट्रॉनिक सेवा नियामवली की स्थापना, पेमेंट गेटवे, फाइल ट्रैकर, लेटर ट्रैकर, एसएमएस सर्विस गेटवे, आधार कार्ड आधारित कल्याण विभाग की छात्रवृत्ति योजना, सामाजिक सुरक्षा योजना और मनरेगा योजना के लाभुकों को भुगतान, ई-डिस्ट्रिक्ट परियोजना शुरू की गयी. अब सरकार इसे और व्यापक बना रही है. राज्य के दो लाख से अधिक कर्मचारियों के लिए अब ई-प्रबंधन साफ्टवेयर भी लागू किया जा रहा है, ताकि सभी कर्मियों का रिकार्ड एक ही जगह मिल पाये.

राज्य में सन 2004 में आइटी नीति बनी. सरकार ने ई-गवर्नेस के लिए आप्टिकल फाइबर केबुल नीति भी बनायी है. इसके तहत झारखंड में आप्टिकल फाइबर बिछानेवाली कंपनियों को एक तय बैंडविड्थ सरकार को उपलब्ध कराना जरूरी है. सरकार की ओर से कोषागार का कंप्यूटरीकरण सबसे पहले किया गया. इसके बाद वाणिज्य कर विभाग ऑनलाइन किया गया. इंप्लायमेंट आरगनाइजेशन, कंज्यूमर फोरम, नगर निगम को भी इसके तहत ऑनलाइन किया जा रहा है.

- 4562 पंचायतों में प्रज्ञा केंद्र

सरकार की ओर से इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से नागरिकों को कई सुविधाएं देने का फैसला अजरुन मुंडा की सरकार ने लिया था. इसमें जन्म, मृत्यु, जाति, आय, स्थानीयता आदि के प्रमाण पत्र ऑनलाइन उपलब्ध कराये जाने हैं. इसको लेकर सरकार सेवाओं का चयन कर रही है. जल्द ही इसे लागू भी कर दिया जायेगा. इससे पहले राज्य सरकार ने 4562 पंचायतों में जैप आइटी की मदद से कामन सर्विस सेंटर (प्रज्ञा केंद्र) भी खोले हैं. इनमें से चार हजार से अधिक अभी कार्य कर रहे हैं. पूर्व के 212 प्रखंडों में सरकार विभिन्न टेलीकाम कंपनियों के माध्यम से आप्टिकल फाइबर के जरिये प्रज्ञा केंद्रों को कनेक्टिविटी उपलब्ध करा रही है.

- ऑनलाइन राजस्व उगाही

सरकार ने राजस्व उगाही करनेवाले विभागों को भी ऑनलाइन करना शुरू कर दिया है. इसे पेमेंट गेटवे का नाम दिया गया है. पेमेंट गेटवे के माध्यम से वाणिज्य कर विभाग में निबंधन से लेकर राजस्व तक का भुगतान आनलाइन सुनि श्चत किया जा रहा है. इतना ही नहीं परिवहन विभाग में नये वाहनों को परमिट देने से लेकर गाड़ियों का निबंधन तक का काम ऑनलाइन किया जा रहा है. सरकार की ओर से उत्पाद विभाग और खान एवं भूतत्व विभाग को भी ऑनलाइन किया जा रहा है. ये सभी विभाग राजस्व से संबंधित हैं. सरकार की ओर से जन वितरण प्रणाली की व्यवस्था को भी ऑनलाइन किया जा रहा है.

- रांची बना ई-जिला

सरकार ने ई-गवर्नेस योजना के तहत रांची को पायलट प्रोजेक्ट के आधार पर ई-जिला बनाया है. रांची जिले की 300 पंचायतों में से 70 प्रतिशत पंचायतों के प्रज्ञा केंद्रों को जीपीआरएस नेटवर्क से जोड़ा गया है. इन प्रज्ञा केंद्रों से एक लाख प्रमाण पत्र भी वितरित किये जा चुके हैं. अब केंद्रों से पेंशन, जमीन का दाखिल खारिज और अन्य सुविधाओं का लाभ भी आम जनता को मिल पायेगा. रांची में मिली सफलता को देखते हुए अब राज्य के अन्य 23 जिलों को भी ई-जिला बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी है. उपायुक्तों की अध्यक्षता में ई-जिला समिति बनायी जा रही है.

- फाइलों पर ऑनलाइन नजर

फाइल ट्रैकर सॉफ्टवेयर से कंप्यूटर के माध्यम से फाइलों पर ऑनलाइन नजर रखी जा रही है. जहां इस सॉफ्टवेयर का अधिक उपयोग हो रहा है, उनमें मुख्य सचिव सचिवालय, पेयजल और स्वच्छता विभाग, आइटी विभाग, साइंस टेक्नोलॉजी, कल्याण विभाग, समाज कल्याण, जल संसाधन, पथ निर्माण, ग्रामीण विकास, आरइओ शामिल हैं. इन विभागों में इश्यू क्लर्क, सहायक, प्रशाखा पदाधिकारी, अपर सचिव, उप सचिव, संयुक्त सचिव, विशेष सचिव और विभागीय प्रमुख तक फाइलों और अन्य महत्वपूर्ण कागजात पर नजर रख रहे हैं. किसी भी तरह की अधिसूचना, आदेश, कार्यालय आदेश, फाइल, चिट्ठियां और अन्य की जानकारी कंप्यूटर में दर्ज कर उस पर कार्रवाई की जा रही है. विभागों में इसके लिए सभी को मेल-आइडी और बार कोड दिया गया है.

- क्या कहते हैं अधिकारी : आइटी विभाग के उप निदेशक शिव विलास साहू ने बताया कि राष्ट्रीय ई-गवर्नेस कार्यक्रम के अंतर्गत कई महत्वपूर्ण कार्य लिये गये. इसमें से एक इलेक्ट्रॉनिक जिला भी है. अभी रांची को ही ई-जिला बनाया जा सका है. अन्य जिलों को भी ई-जिला बनाने की सरकार की तैयारी है.

* जेएनएनयूआरएम : एक भी प्रोजेक्ट नहीं हुआ पूरा

झारखंड में केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) का हाल बुरा है. वर्ष 2007 से झारखंड में शुरू हुई इस योजना का एक भी प्रोजेक्ट आज तक पूरा नहीं हो सका है. राज्य के तीन बड़े शहरों और दर्जनभर मध्यम व छोटे शहरों में प्रस्तावित योजनाओं में काम की रफ्तार काफी धीमी है. आलम यह है कि योजना के तहत केंद्र से मंजूर कुल प्रोजेक्ट राशि 1693.18 करोड़ रुपये की आधी रकम भी हासिल करने में राज्य को सफलता नहीं मिली है. अब तक केंद्रीय सहायता और राज्य सरकार का हिस्सा मिला कर जेएनएनयूआरएम की योजनाओं के लिए 707.5 करोड़ रुपये ही जारी किये गये हैं. इस राशि में से भी केवल 293.60 करोड़ रुपये खर्च किये जा सके हैं. शेष 413.89 करोड़ रुपये ट्रेजरी में पड़े हुए हैं.

- आइएचएसडीपी

इंटिग्रेटेड हाउसिंग एंड स्लम डेवलपमेंट प्रोग्राम (आइएचएसडीपी) के तहत राज्य के 10 शहरों की मलिन बस्तियों (स्लम) में रहनेवाले 11,544 लोगों के आवास का उद्धार किया जाना था. इसके लिए कुल 217.93 करोड़ रुपये की योजना थी. इसमें से 65.66 करोड़ रुपये केंद्र ने दिये. राज्य का हिस्सा 45.52 करोड़ रुपये मिला कर अब तक कुल 111.17 करोड़ रुपये जारी किये गये हैं. इसमें से केवल 41.62 करोड़ रुपये ही खर्च किये जा सके. चतरा, सरायकेला और मिहिजाम ने एक रुपया भी खर्च नहीं किया.

- बीएसयूपी

बेसिक सर्विसेज फॉर अरबन पुअर (बीएसयूपी) के तहत रांची, धनबाद और जमशेदपुर की मलिन बस्तियों में रहनेवाले शहरी गरीबों का जीवन स्तर ऊंचा उठाना था. झुग्गी-झोपड़ियों में रहनेवाले 16,722 आवासों का उद्धार कर वहां नागरिक सुविधाएं बहाल की जानी थीं. केंद्र सरकार ने 530.38 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट मंजूर किया. 52.52 करोड़ रुपये केंद्र ने जारी किये थे. राज्य का हिस्सा 98.01 करोड़ मिला कर कुल 144.39 करोड़ जारी हो चुके हैं. लेकिन धनबाद, जमशेदपुर में कोई काम नहीं किया जा सका है. रांची ने भी आंशिक काम ही किया है. अब तक केवल 18 करोड़ रुपये ही खर्च किये जा सके हैं.

- यूआइडीएसएमएमटी

अरबन इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट स्कीम फॉर स्मॉल एंड मीडियम टाउन (यूआइडीएसएसएमटी) के तहत राज्य के छह शहरों में विकास योजनाएं चलायी जा रही हैं. इसके लिए केंद्र सरकार ने 97.47 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दी थी. केंद्र द्वारा 53.39 करोड़ और राज्य सरकार द्वारा जारी किये गये 70.59 करोड़ रुपये (कुल 123.98 करोड़) में से अब तक 68.48 करोड़ रुपये खर्च किये गये हैं. चास, देवघर, हजारीबाग और लोहरदगा में काम चल रहा है. जबकि चाईबासा ने प्राप्त राशि (16.70 करोड़ रुपये) में से कुछ भी खर्च नहीं किया है.

- अरबन ट्रांसपोर्ट सिस्टम

अरबन ट्रांसपोर्ट सिस्टम दुरुस्त करने के लिए राज्य के तीन शहरों का चयन किया गया था. रांची, धनबाद और जमशेदपुर में इस काम के लिए कुल 37.3 करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट मंजूर किये गये थे. इस राशि में से केंद्र 11.95 करोड़ और राज्य 11.97 करोड़ रुपये (कुल 23.92 करोड़) जारी कर चुका है. 14.53 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं. रांची और धनबाद में 70-70 बसें खरीदी गयी हैं, जबकि जमशेदपुर ने 50 बसें ली हैं. बसों की खरीद तो हो गयी, लेकिन ट्रांसपोर्ट सिस्टम दुरुस्त करने के लिए कुछ खास नहीं हुआ.

- यूआइजी

अरबन इंफ्रास्ट्रक्चर एंड गवर्नेस (यूआइजी) के तहत तीनों प्रमुख शहरों में जलापूर्ति प्रणाली ठीक करने के लिए उल्लेखनीय काम किया गया है. हालांकि ठोस कचरा प्रबंधन के तहत अभी तक कोई काम नहीं हो सका है. जमशेदपुर में इस काम के लिए 33.36 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी प्रदान की गयी है. इसमें से 8.3 करोड़ रुपये जारी किये गये हैं. जमशेदपुर ने अब तक एक रुपया भी खर्च नहीं किया गया है. धनबाद ने जलापूर्ति के लिए मिले 136.07 करोड़ रुपये में से 136.06 करोड़ खर्च कर दिये हैं. इ-गवर्नेस के मद में मिली राशि में से कुछ भी खर्च नहीं किया गया. ठोस कचरा प्रबंधन के लिए मिले 30.3 करोड़ में से केवल 57 लाख रुपये ही खर्च किये गये हैं. रांची में जलापूर्ति के लिए मिले 288.39 करोड़ में से 132.47 करोड़ खर्च कर दिये गये हैं. ठोस कचरा प्रबंधन के लिए मिले 20.56 करोड़ में से 16.69 करोड़ खर्च हुए हैं.

- जल-मल निकासी प्रोजेक्ट मंजूर नहीं

राज्य के तीन शहरों (रांची, जमशेदपुर और धनबाद) में सिवरेज-ड्रेनेज (जल-मल निकासी) योजना को जेएनएनयूआरएम के तहत मंजूरी नहीं दी गयी है. राज्य सरकार ने केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने में विलंब किया.

* पुलिस थाने : बिना पैसे के नहीं होता कोई काम

पुलिस विभाग, सरकारी तंत्र का वह विभाग है, जो समाज में सबसे प्रत्यक्ष रूप से दिखता है. यह विभाग संचालित होता है विभिन्न इलाकों में स्थित अपने थानों के बूते. थानों में तैनात पुलिसवालों का आम लोगों से किया गया व्यवहार समाज में पुलिस की छवि निर्धारित करता है. या यूं कहें कि बनाता-बिगाड़ता है. प्रभात खबर ने थाना स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार के बारे में जानकारी जुटायी है. पता चला कि हर काम के लिए पैसा लिया जाता है :

- सनहा के लिए : थाने में दर्ज सनहा का कानून में बहुत महत्व है. इसका फायदा थानों की पुलिस उठाती है. किसी को कोई अंदेशा है, सामान गुम हो गया है, सर्टिफिकेट, मोबाइल आदि खो गया है, तो संबंधित थाने में सनहा दर्ज कराना पड़ता है. जब भी कोई व्यक्ति थाने पर पहुंचता है, तो उससे रुपये की मांग की जाती है. खतरे का सनहा दर्ज कराने का रेट 500 रुपया तय है, जबकि कुछ गुम होने पर सनहा दर्ज कराने का रेट 50 से 100 रुपया है. रिश्वत की यह राशि थानों के मुंशी की होती है. हां, इसमें थाना प्रभारी का समर्थन भी जरूर होता है. रिश्वत न देने पर सनहा दर्ज करने के लिए बार-बार थाना बुलाया जाता है. लोग अपना काम जल्दी करवाने के चक्कर में पैसा देना ही उचित समझते हैं.

- प्राथमिकी दर्ज करने के लिए : हत्या, लूट, बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों की प्राथमिकी तो थानों में आसानी से दर्ज कर ली जाती है. लेकिन जब भी किसी दूसरे के साथ विवाद (मारपीट, धमकी, जमीन विवाद आदि) का मामला थाना पहुंचता है, तो थाने की पुलिस पैसे की मांग करने लगती है. इतना ही नहीं, जिन लोगों को मामले में अभियुक्त बनाया जाता है, उनसे भी रुपये लेकर उन्हें बचाने का काम थानों की पुलिस करती है. इस तरह एक ही मामले में थाना पुलिस दोनों पक्षों से रुपये वसूलती है.

- बयान दर्ज करने के लिए : मारपीट, जमीन विवाद, पति-पत्नी के बीच विवाद, जानलेवा हमला जैसे मामलों में पीड़ित पक्ष आरोपियों को सजा दिलाना चाहते हैं. पीड़ित पक्ष के लोग चाहते हैं कि उनकी बातों को पुलिस दर्ज करे. केस डायरी में उनकी बातों को दर्ज किया जाये. पीड़ित की इस कोशिश का फायदा पुलिस के अधिकारी उठाते हैं. पुलिस अधिकारी संबंधित पक्ष का बयान दर्ज करने में आनाकानी करते हैं. इलाके में सक्रिय थानों के दलाल ऐसे लोगों को बताते चलते हैं कि कुछ खर्च करने पर वह बयान दर्ज करवा देगा. जब लोग पैसे दे देते हैं, तो उनका बयान केस डायरी में दर्ज कर लिया जाता है. नियमानुसार आरोपी पक्ष का बयान भी केस डायरी में दर्ज करना होता है. लेकिन पुलिस अधिकारी इसके लिए बहानेबाजी करते हैं. फिर आरोपी से भी पैसा लेकर बयान दर्ज कर लेते हैं.

- केस डायरी भेजने के लिए : प्राथमिकी दर्ज होने के बाद अभियुक्त जमानत के लिए अदालत में आवेदन करते हैं. अक्सर अदालत द्वारा पुलिस से केस डायरी की मांग की जाती है. लेकिन मामले के जांच अधिकारी कई-कई रिमाइंडर मिलने के बाद भी अदालत में केस डायरी नहीं पेश करते. इस कारण अदालत जमानत की अरजी पर कोई फैसला नहीं ले पाती. इधर, पुलिस अधिकारी आरोपी व्यक्ति से यह कहते हैं कि गिरफ्तार कर जेल भेज देंगे. इस फजीहत से बचने के लिए आरोपी संबंधित पुलिस अधिकारी को रिश्वत देने के लिए बाध्य हो जाते हैं, जिसके बाद पुलिस अधिकारी अदालत में केस डायरी भेजते हैं.

- गिरफ्तार न करने के लिए : प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पुलिस आरोपियों को खोजने के लिए छापामारी करती है. प्राथमिकी में जमानती धारा होने पर थाने से ही जमानत दे देने का प्रावधान है, लेकिन पुलिस ऐसा करने के लिए आरोपी से पैसे लेती है. इसके अलावा पुलिस जमानती धारा होने पर भी न गिरफ्तार करने के लिए पैसे लेती है. इसके लिए पुलिस अनुसंधान जारी है का बहाना बनाती है. प्राथमिकी में गैर जमानती धारा होने पर पुलिस आरोपी को पकड़ कर जेल न भेजने के लिए रिश्वत लेती है. साथ ही अदालत से जमानत करा लेने या सरेंडर करने के लिए कुछ दिनों का मोहलत भी देती है.

- जमीन विवाद का मामला : जमीन की कीमतें बढ़ने के साथ-साथ जमीन विवाद का मामला पुलिस के लिए सबसे बड़ा कमाई का जरिया बन गया है. जमीन पर हो रहे कब्जे को रोकना हो, कब्जा करना हो, एसडीओ कोर्ट में रिपोर्ट भेजनी हो, जमीन पर धारा 144 लगवानी हो, सबके लिए थानों के पुलिस अधिकारी मोटी रकम वसूल करते हैं. अगर किसी की जमीन पर कोई दबंग व्यक्ति कब्जा कर रहा है और वह व्यक्ति थाना पहुंचता है, तो उससे खर्च मांगा जाता है. खर्चा-पानी देने के बाद ही पुलिस थाने से निकल कर जमीन तक जाती है. अगर बिना पैसे लिये पुलिस जाती भी है, तो दोनों पक्षों से कागजात की मांग करती है और कई दिनों तक जांच ही करती रहती है. जमीन पर हो रहे काम को रोकती नहीं. जब तक जांच होती है, तब तक जमीन पर कब्जा हो गया होता है. यह स्थिति तब पैदा होती है जब पुलिस जमीन कब्जा करनेवाले से मोटी रकम ले चुकी होती है. इसी तरह कई बार किसी एक पक्ष में काम करते हुए पुलिस जमीन पर धारा 144 भी लगा देती है, फिर पैसे लेकर एसडीओ कोर्ट को रिपोर्ट भेजती है.

- दुर्घटना होने पर : दुर्घटना चाहे छोटी हो या बड़ी, इसका होना किसी को अच्छा नहीं लगता, लेकिन हाइवे पर के थानों के अधिकांश पुलिस- वालों के लिए यह कमाई का बेहतर मौका होता है. अगर किसी को हल्की चोट आयी हो, तो वाहन मालिक से घायल को तो पैसा दिलवाती है, मामले में केस न करने के लिए रिश्वत भी लेती है. अगर कोई माल लदा ट्रक दुर्घटनाग्रस्त हो गया, तब तो पुलिस की बल्ले-बल्ले हो जाती है. नियम है दुर्घटना का केस होगा, तब दुर्घटनाग्रस्त वाहन की जांच एमवीआइ करेंगे. फिर अदालत से गाड़ी छूटेगी. इन कामों में महीनों लग जाते हैं. अगर ट्रक पर महंगा समान लदा है, तो वह पड़ा रह जायेगा. लाखों की पूंजी फंसी रहेगी. फिर ट्रक भी खड़ा रहेगा. एक ट्रक का मासिक किस्त 40-50 हजार रुपये होती है. अगर ट्रक एक माह भी खड़ा रह गया, तो लाख रुपये का नुकसान तो हो ही जायेगा. इसलिए ट्रक मालिक भी 25-30 हजार रुपये पुलिस को देने में देर नहीं करते.

- अवैध धंधे से कमाई : थानों की पुलिस को अवैध धंधों से बड़ी कमाई होती है. हालांकि इस तरह की कमाई का हिस्सा ऊपर के अधिकारियों तक भी पहुंचता है. झारखंड में स्क्रैप कारोबार, कोयला और लौह अयस्क तस्करी हमेशा होती रहती है. इसमें पुलिस थानों को लाखों रुपये मिलते हैं. ट्रक के हिसाब से थानों को 15-25 हजार रुपये दिये जाते हैं.

- सत्यापन के लिए : पासपोर्ट बनवाने का सत्यापन हो या नौकरी मिलने पर चरित्र सत्यापन का मामला, थाने के पदाधिकारी को रुपये देने ही पड़ते हैं. रुपये न देने पर कई बार तो रिपोर्ट लिखने में ही महीनों लग जाते हैं. कई बार रिपोर्ट लिखी ही नहीं जाती. जानकारी के मुताबिक सत्यापन रिपोर्ट के लिए लोगों से तीन से पांच सौ रुपये की वसूली की जाती है.

* सुविधा केंद्र : सरकारी किराना दुकान योजना फेल

सरकारी किराना दुकान की योजना फेल हो गयी है. सरकार की पहल पर रांची जिला प्रशासन ने शहर में ऐसी 20 दुकानें खोली थीं. नाम दिया गया था सुविधा केंद्र. ये अब बंद हो चुके हैं. रांची शहर में अब केवल दो सुविधा केंद्र, एक विकास भवन के बगल में व एक रजिस्ट्री कार्यालय के पास, चल रहे हैं. इनका हाल भी बुरा है.

- क्या था मकसद : वर्ष 2010 में यह योजना शुरू हुई थी. तब बढ़ती महंगाई को देखते हुए यह तय किया गया था कि आम आदमी को बाजार से कम मूल्य पर चावल, दाल, आटा, आलू, प्याज व तेल उपलब्ध कराया जाये. पहले दुकान चलाने के लिए इच्छुक लोगों का चयन किया गया. अलग-अलग क्षेत्रों के लिए दुकानदार तय किये गये. जिला प्रशासन की जिम्मेवारी थी कि वह दुकानदारों को दुकान उपलब्ध कराये. माल के लिए पंडरा बाजार समिति से बात की गयी. माल थोक दर पर दुकानदारों को उपलब्ध कराना था, ताकि वे सस्ती दर पर लोगों को दे सकें.

- क्यों फेल हो गयी योजना : योजना शुरू होने के दो माह बाद से ही संकट शुरू हो गया. दुकानदारों के सामने पूंजी की समस्या हुई. तब उन्हें बाजार समिति से उधार माल दिलाया गया, ताकि वे बेच कर पैसा दे दें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कुछ दुकानदारों ने माल तो लिया, पर पैसा नहीं चुकाया. ऐसे में बाजार समिति के सामने भी समस्या होने लगी. दुकानदारों से पैसे वसूलने या उनके लिए पूंजी उपलब्ध कराने का सवाल खड़ा हुआ. इसके बाद से ही यह योजना चरमरा गयी. कुछ माह बाद दुकानें बंद होने लगीं.

- चालू दुकानों भी बेमकसद : फिलहाल जो चालू दुकानें हैं, वे खिचड़ीफरोश दुकानें बन कर रह गयी हैं. खुले बाजार की दर पर ही वहां लोगों को सामान मिल रहे हैं. यहां तय सामानों के अलावा भी अनेक सामान बिक रहे हैं. यहां तक कि स्टेशनरी भी मिलने लगी है. यह तय किया गया था कि हर प्रखंड में एक-एक सुविधा केंद्र खोला जाये. कुछ प्रखंडों रातू, कांके, इटकी, बेड़ो, नामकुम में प्रयास किया गया. इसके लिए दुकानदारों का चयन हुआ. पर पूंजी के अभाव व माल का उठाव तय नहीं होने के कारण यह योजना फेल हो गयी.

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