पिता और इकलौते भाई को खोया, बेटी को छोड़कर पढ़ाई की, लोगों के ताने सहे, पढ़िए बिहार की शिक्षिका चंचला तिवारी की कहानी
शिक्षिका चंचला तिवारी की फाइल फोटो
Teachers Day 2026: शिक्षक दिवस पर पढ़िए सारण की प्रधानाध्यापिका चंचला तिवारी की संघर्ष से सम्मान तक की कहानी. पिता और इकलौते भाई को खोने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. बेटी की जिम्मेदारी और नौकरी के साथ पढ़ाई जारी रखी और आज राजकीय शिक्षक पुरस्कार पाकर अपनी मेहनत की मिसाल पेश की है.
Teachers Day 2026: कभी पिता को खोया, फिर कोरोना में इकलौते भाई का भी साथ छूट गया. बेटी को बिहार में मां के पास छोड़कर खुद पढ़ाई के लिए असम जाना पड़ा. अनजान शहर में दो साल की बेटी के साथ नौकरी शुरू की. लोगों के ताने भी सुने. लेकिन चंचला तिवारी ने हर मुश्किल के बीच खुद को मजबूत किया. आज उनकी मेहनत और समर्पण को पहचान मिली है.
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सारण के उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय बसाढ़ी की प्रधानाध्यापिका चंचला तिवारी का चयन राजकीय शिक्षक पुरस्कार 2026 के लिए हुआ है. शिक्षक दिवस के मौके पर उन्हें इस सम्मान से सम्मानित किया जा रहा है. उनकी कहानी सिर्फ एक पुरस्कार की कहानी नहीं है. यह हिम्मत, मेहनत और अपने कर्म पर भरोसा रखने की कहानी है.
मुजफ्फरपुर में जन्म, असम में हुई पढ़ाई
चंचला तिवारी का जन्म मुजफ्फरपुर में हुआ. उनके पिता असम में नौकरी करते थे. इसलिए एक साल की उम्र से ही वह असम में पली-बढ़ीं. उनकी पढ़ाई भी वहीं हुई.
उन्होंने डिब्रूगढ़ यूनिवर्सिटी और बाद में असम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की. अंग्रेजी में एमए, शिक्षा में एमए और एमएड किया. वह यूजीसी नेट क्वालिफाइड हैं. फिलहाल असम यूनिवर्सिटी से पीएचडी भी कर रही हैं.
शिक्षा के साथ लेखन में भी उनकी रुचि रही है. उनकी किताब ‘Accessing the Use of ICT in Teaching Learning Process’ है. उनकी कविता पुस्तक ‘अस्तित्वहीन अस्तित्व’ भी प्रकाशित हो चुकी है. कई शोधपत्र अलग-अलग जर्नल में प्रकाशित हुए हैं.
पिता के बाद मां ने संभाला पूरा परिवार
साल 2003 में हार्ट अटैक के कारण उनके पिता का निधन हो गया. परिवार के लिए यह बड़ा झटका था. लेकिन उनकी मां ने हिम्मत नहीं हारी. तीन बेटियों और एक बेटे को उनकी मां ने संभाला. चंचला मानती हैं कि उनकी मां का हौसला आज भी उनकी सबसे बड़ी ताकत है. उनके पिता की कर्तव्यनिष्ठा और मां की कभी हार न मानने वाली हिम्मत ने चंचला के व्यक्तित्व को गढ़ा.
2021 में कोरोना ने फिर दिया बड़ा सदमा
मुश्किलें यहीं खत्म नहीं हुईं. साल 2021 में कोरोना संक्रमण के दौरान चंचला ने अपने इकलौते भाई को भी खो दिया. उनका भाई उनसे करीब डेढ़ साल छोटा था. एक के बाद एक अपनों को खोने का दर्द परिवार के लिए बेहद मुश्किल था. लेकिन उनकी मां ने फिर भी हिम्मत नहीं हारी.
आज मां की जिम्मेदारी चंचला के कंधों पर है. लेकिन वह कहती हैं कि उनकी मां ही उनकी सबसे बड़ी सपोर्ट सिस्टम हैं. यही रिश्ता उनकी ताकत भी है और उनके संघर्ष की सबसे बड़ी प्रेरणा भी.
शादी के बाद भी नहीं छोड़ी पढ़ाई
चंचला की शादी 2004 में मुजफ्फरपुर में हुई. शादी के बाद भी उन्होंने पढ़ाई जारी रखी. उनके ससुर ने उन्हें आगे पढ़ने के लिए काफी प्रोत्साहित किया. उन्होंने शादी के बाद ही बीएड और एमए जैसी पढ़ाई पूरी की. उनका मानना था कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती. इसी सोच के साथ वह लगातार आगे बढ़ती रहीं.

दो साल की बेटी के साथ पहुंचीं सारण
साल 2010 में उन्हें सरकारी नौकरी मिली. पोस्टिंग सारण में हुई. उस समय उनकी बेटी सिर्फ दो साल की थी. अनजान शहर में छोटी बच्ची के साथ अकेले रहना आसान नहीं था. लेकिन चंचला ने इस चुनौती को भी स्वीकार किया.
इससे पहले वह मुजफ्फरपुर के दो प्राइवेट स्कूल में पढ़ा चुकी थीं. 2006 से 2008 तक उन्होंने वहां अध्यापन किया था.
अंग्रेजी से डरने वाले बच्चों में पैदा की रुचि
2010 में सारण पहुंचने के बाद वह तापसी सिंह उच्च विद्यालय, चिरांद में अंग्रेजी शिक्षिका बनीं. उस समय वह स्कूल की एकमात्र महिला शिक्षक थीं. जिस इलाके में वह पढ़ाने पहुंची थीं, वहां शिक्षा को लेकर उतनी जागरूकता नहीं थी. अंग्रेजी को लेकर बच्चों में भी रुचि कम थी.
चंचला ने बच्चों को सिर्फ किताबों से नहीं जोड़ा. उन्होंने उनके साथ दोस्ताना रिश्ता बनाया. धीरे-धीरे बच्चों में अंग्रेजी के प्रति रुचि बढ़ने लगी. उनका मानना था कि बच्चे को डराकर नहीं, बल्कि उसका भरोसा जीतकर पढ़ाया जा सकता है.

बेटी को छोड़कर खुद पढ़ने गईं, लोगों ने दिए ताने
साल 2015 में चंचला ने लीव विदाउट पे लिया और दो साल के लिए असम यूनिवर्सिटी से एमएड करने चली गईं. उस समय उनकी बेटी आठ साल की थी. उन्होंने उसे बिहार में अपनी मां के पास रखा.
इस फैसले पर लोगों ने उन्हें खूब ताने दिए. लोगों ने कहा कि जिस उम्र में बेटी को पढ़ाई की जरूरत है, उस समय मां खुद पढ़ने चली गई. लेकिन चंचला ने किसी की बात की परवाह नहीं की.
वह प्रशिक्षण लेने और प्रशिक्षण देने के लिए भी लगातार पटना आती-जाती रहीं. उस समय भी लोग पूछते थे कि इन सबका क्या फायदा होगा. चंचला का जवाब था- ‘मेरा कुछ नुकसान तो नहीं हो रहा. मैं कुछ सीख ही रही हूं.’ आज पीछे मुड़कर देखती हैं तो उन्हें लगता है कि वह मेहनत पूरी तरह सार्थक थी.
2023 में बनीं प्रधानाध्यापक
साल 2022 में बीपीएससी की ओर से आयोजित प्रधानाध्यापक पद की परीक्षा में उनका चयन हुआ. उस समय सारण जिले से सिर्फ नौ शिक्षकों का चयन इस पद के लिए हुआ था. 7 जनवरी 2023 से वह उत्क्रमित उच्च माध्यमिक विद्यालय बसाढ़ी, सदर छपरा में प्रधानाध्यापक के पद पर कार्यरत हैं.
प्रधानाध्यापक बनने के बाद भी सीखने और नई चीजें अपनाने का उनका सिलसिला जारी रहा.

शिक्षक के साथ ट्रेनर की भी निभाई जिम्मेदारी
चंचला ने खुद को सिर्फ कक्षा तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने जिला और राज्य स्तर पर प्रशिक्षण देने और लेने का काम किया.
वह अलग-अलग प्रशिक्षण कार्यक्रमों में मास्टर ट्रेनर के रूप में भी काम कर चुकी हैं. SCERT की ओर से विकसित हस्तपुस्तिकाओं और ट्रेनिंग मॉड्यूल के निर्माण में भी उनकी भूमिका रही है.
उनके काम में नवाचारी शिक्षण, कमजोर बच्चों पर विशेष ध्यान, सकारात्मक माहौल और समुदाय की भागीदारी प्रमुख रही है.
‘मैं किसी बच्चे को कमजोर नहीं मानती’
चंचला कहती हैं कि वह किसी बच्चे को कमजोर नहीं मानतीं. उनके मुताबिक हर बच्चे में कोई न कोई खास क्षमता होती है. कमजोर बच्चों के साथ वह पहले दोस्ताना रिश्ता बनाती हैं. उनकी परेशानी समझती हैं. इसके बाद उनकी सीखने की शैली के हिसाब से पढ़ाने की कोशिश करती हैं.
छोटी उपलब्धियों पर भी बच्चों की तारीफ करती हैं. इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है. उनका अनुभव है कि भरोसा और प्रोत्साहन मिलने पर बच्चा अपनी क्षमता से भी बेहतर प्रदर्शन कर सकता है.
‘मेरे विद्यार्थियों की सफलता ही सबसे बड़ा सम्मान’
राजकीय शिक्षक पुरस्कार के लिए चयन को चंचला अपनी अकेली उपलब्धि नहीं मानतीं. वह इसे अपने विद्यार्थियों, अभिभावकों, सहकर्मियों और पूरे विद्यालय परिवार का सम्मान मानती हैं. उनके कई छात्र बड़े पदों पर कार्यरत हैं.
कई पुराने विद्यार्थी आज भी उनसे मिलने आते हैं. जब कोई छात्र कहता है कि ‘मैडम, आपने हम पर विश्वास किया था, इसलिए हम यहां तक पहुंचे हैं’, तो चंचला के लिए वह किसी भी पुरस्कार से बड़ा पल होता है.

‘मेरी छात्राएं कहती हैं- आपके जैसा बनना है’
चंचला से जब पूछा जाता है कि पुरस्कार और प्रमाणपत्र को हटा दें तो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है, तो उनका जवाब बेहद भावुक है. वह कहती हैं कि उनके विद्यार्थियों के चेहरे की मुस्कान उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है.
जब उनकी छात्राएं उनसे कहती हैं कि ‘मैम, हमें आपके जैसा बनना है’, तो वह भावुक हो जाती हैं. उनके लिए शिक्षक का असली पुरस्कार बच्चों की सफलता, उनका भरोसा और उनके अच्छे संस्कार हैं.
स्कूल से समाज तक शिक्षा को पहुंचाने की कोशिश
चंचला का मानना है कि शिक्षा सिर्फ विद्यालय की जिम्मेदारी नहीं है. पूरा समाज इसमें भागीदार है. उन्होंने अभिभावकों से संवाद, जागरूकता कार्यक्रम, विद्यालय की गतिविधियों में समुदाय की भागीदारी और बालिका शिक्षा जैसे अभियानों के जरिए समाज को शिक्षा से जोड़ने की कोशिश की.
उनका मानना है कि जब स्कूल और समाज साथ खड़े होते हैं, तो शिक्षा का असर कई गुना बढ़ जाता है.
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चंचला तिवारी की प्रभात खबर से खास बातचीत
सवाल: शिक्षक के रूप में आपके सफर की सबसे बड़ी चुनौती क्या रही?
जवाब: एक महिला होकर नौकरी करना और बच्चे को संभालना अपने आप में चुनौती है. मैं 2010 में अपनी दो साल की बेटी के साथ अकेले सारण आई थी. यहां मेरी कोई पहचान नहीं थी. पेशेवर तौर पर भी चुनौती थी. जिस इलाके में मैं पढ़ाने गई थी, वहां शिक्षा के प्रति उतनी जागरूकता नहीं थी. खासकर अंग्रेजी को लेकर बच्चों में रुचि कम थी. लेकिन धीरे-धीरे मैंने बच्चों के साथ रिश्ता बनाया और बदलाव दिखने लगा.
सवाल: पहले और आज के स्कूल में सबसे बड़ा बदलाव क्या देखती हैं?
जवाब: आज शिक्षा का स्वरूप पूरी तरह बदल गया है. पहले संसाधन सीमित थे और पढ़ाई किताबों तक सीमित रहती थी. अब स्मार्ट क्लास, डिजिटल सामग्री और गतिविधि आधारित पढ़ाई ने बच्चों के सीखने का तरीका बदल दिया है. आज बच्चे ज्यादा जिज्ञासु और आत्मविश्वासी हैं. शिक्षा अब सिर्फ परीक्षा पास करने का माध्यम नहीं है. यह जीवन कौशल विकसित करने का भी माध्यम है.
सवाल: हजारों शिक्षकों के बीच आपके काम में ऐसा क्या खास रहा, जिसने आपको राजकीय पुरस्कार तक पहुंचाया?
जवाब: मैं यह नहीं मानती कि सिर्फ मैं ही इस पुरस्कार की हकदार थी. यह एक चयन प्रक्रिया है. इसमें 10 साल का शिक्षण अनुभव जरूरी है. आवेदन के साथ काम के वीडियो एविडेंस भी देने होते हैं. जिला और राज्य स्तर पर प्रस्तुति के बाद चयन होता है. मैंने हमेशा कोशिश की कि स्कूल बच्चों के लिए सीखने और आकर्षण का केंद्र बने. नवाचारी शिक्षण, कमजोर बच्चों पर ध्यान, सकारात्मक माहौल और समुदाय की भागीदारी पर काम किया. शिक्षक के साथ ट्रेनर के तौर पर भी जिम्मेदारी निभाई. शायद इसी निरंतरता और प्रतिबद्धता ने मुझे यहां तक पहुंचाया.
सवाल: पढ़ाई में कमजोर बच्चों के साथ आप क्या अलग करती हैं?
जवाब: मैं किसी बच्चे को कमजोर नहीं मानती. हर बच्चे में कोई खास क्षमता होती है. पहले मैं बच्चे के साथ दोस्ताना रिश्ता बनाती हूं. उसकी समस्या समझती हूं. फिर उसकी सीखने की शैली के अनुसार पढ़ाती हूं. छोटी सफलता पर भी उसकी तारीफ करती हूं. इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है.
सवाल: स्कूल और समाज को शिक्षा से जोड़ने के लिए आपने क्या किया?
जवाब: मेरा मानना है कि शिक्षा सिर्फ विद्यालय की जिम्मेदारी नहीं है. अभिभावकों के साथ संवाद, जागरूकता कार्यक्रम, विद्यालय की गतिविधियों में समुदाय की भागीदारी और बालिका शिक्षा जैसे अभियानों के जरिए मैंने समाज को जोड़ने की कोशिश की है. स्कूल और समाज साथ खड़े हों तो शिक्षा का असर कई गुना बढ़ जाता है.
कर्म पर भरोसा, फल की चिंता नहीं
चंचला तिवारी की पूरी यात्रा एक बात सिखाती है. जिंदगी ने उन्हें कई बार परखा. पिता का साया छिना. फिर इकलौते भाई को खोया. बेटी से दूर रहना पड़ा. लोगों के ताने सुनने पड़े. लेकिन उन्होंने अपना रास्ता नहीं छोड़ा.
आज राजकीय शिक्षक पुरस्कार के रूप में मिला सम्मान उनके लिए सिर्फ एक उपलब्धि नहीं है. यह उन वर्षों की मेहनत, संघर्ष, परिवार के साथ और अपने विद्यार्थियों पर किए गए भरोसे की पहचान है.
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