कुव्यवस्था के कारण प्रसूता नहीं पहुंच रही सदर अस्पताल
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 30 Apr 2016 8:14 AM
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सुपौल : जिला के सबसे बड़े स्वास्थ्य केंद्र सदर अस्पताल में कई महीनों से व्याप्त कुव्यवस्था के कारण मरीजों की संख्या लगातार कम होती जा रही है़ स्वास्थ्य कर्मियों की कमी, उचित दवाओं के अभाव के कारण सरकार की कई महत्वपूर्ण स्वास्थ्य योजनाएं सदर अस्पताल में दम तोड़ती नजर आ रही है़ प्रसव के दौरान […]
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सुपौल : जिला के सबसे बड़े स्वास्थ्य केंद्र सदर अस्पताल में कई महीनों से व्याप्त कुव्यवस्था के कारण मरीजों की संख्या लगातार कम होती जा रही है़ स्वास्थ्य कर्मियों की कमी, उचित दवाओं के अभाव के कारण सरकार की कई महत्वपूर्ण स्वास्थ्य योजनाएं सदर अस्पताल में दम तोड़ती नजर आ रही है़ प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा की सुरक्षा को लेकर सरकार द्वारा संचालित जननी एवं बाल सुरक्षा योजना सदर अस्पताल के बदहाली के कारण अपने उद्देश्य की पूर्ति में विफल साबित हो रहा है.
सदर प्रखंड सहित अनुमंडल क्षेत्र की प्रसूता अस्पताल में व्याप्त कुव्यवस्था से जूझने के बजाय किसी निजी क्लिनीक में प्रसव करवाना उचित समझती हैं. अस्पताल की बदहाली के कारण इन दिनों सदर अस्पताल में प्रसव के लिये आने वाले प्रसुताओं की संख्या आधे से भी कम रह गयी है़ वहीं अस्पताल प्रशासन सुधार का उपाय करने के बजाय अपनी कमजोरी छिपाने में लगा है.
प्रसूता की संख्या आधी से भी हुई कम
अस्पताल की बदहाली के कारण इन दिनों मरीजों की संख्या लगातार घटती जा रही है़ आकड़ों पर गौर करे तो सितंबर 2015 से सदर अस्पताल में प्रसव के लिये पहुंचने वाली जननी की संख्या लगातार घटती जा रही है़ दिसंबर 2015 के बाद तो जननी की घटती संख्या चिंताजनक है़ लेकिन अस्पताल प्रशासन इससे कोई सबक लेने के लिये तैयार नहीं है़ प्रसव कक्ष में कार्य करने वाली कई एएनएम ने नाम नहीं छापने के शर्त पर बताया कि प्रसव के लिये समुचित दवा का अभाव, महिला चिकित्सक की कमी के कारण प्रसूता सदर अस्पताल नहीं आना चाहती है़ गत वर्ष 2015 में हुए प्रसव के आंकड़ो का अगर इस वर्ष से मिलान किया जाए तो कई चौकाने वाली बातें सामने आयेगी़
प्रसूता के परिजनों का होता है आर्थिक शोषण
सदर अस्पताल प्रसव के लिये पहुंचने वाले प्रसूता के परिजनों के आर्थिक शोषण को सदर अस्पताल में कानून का रूप दे दिया गया है. अधिकारियों की चुप्पी के कारण सदर अस्पताल के प्रसव कक्ष में ड्यूटी पर तैनात एएनएम का ही कानून चलता है. सूत्रों की मानें तो मरीज को देखने से पहले ही तय राशि परिजनों को सुना दी जाती है. तैयार होने के बाद एएनएम द्वारा उसका उपचार प्रारंभ किया जाता है, अन्यथा उसे बाहर जाने की सलाह दी जाती है.
सबसे विकट स्थिति प्रसव के बाद उत्पन्न होती है. जब प्रसव के बाद प्रसूता के परिजन एवं एएनएम में तय राशि के लेनदेन में किचकिच की वजह से परिजनों को कई प्रकार के समस्या का सामना करना पड़ता है. प्रसव के लिये पहुंचे जननी के परिजनों को सबसे पहले दवा और कई अन्य सामान लाने की पर्ची थमाई जाती है. प्रसव उपरांत परिजनों से नगद राशि का डिमांड खुले आम किया जाता है़ मुंह मांगी राशि से कम मिलने पर नाटक-नौटंकी का दौर चलता है. यह रोज की बातें है़ं
प्रमाण पत्र देने और टीकाकरण के नाम पर होती है वसूली
प्रसव कक्ष से छुट्टी मिलने के बावजूद प्रसूता के परिजनों की मुश्किलें खत्म नहीं होती. जन्म के तुरंत बाद होने वाले टीकाकरण के नाम पर भी संबंधित कर्मी परिजनों का आर्थिक शोषण करते हैं. साथ ही जन्म प्रमाण पत्र देने के नाम पर भी परिजनों से वसूली की जाती है़
सदर अस्पताल में प्रसव करा कर लौट रहे मल्हनी गांव निवासी श्याम सुंदर साह ने बताया कि टीकाकरण में 100 और जन्म प्रमाण पत्र निर्गत करने के लिये 300 रूपये की मांग की गयी़ टीका तो दिलवा दिया, जन्म प्रमाण पत्र बाद में आ कर ले जाएंगें. सदर अस्पताल कर्मियों की लूट खसोट नीति के कारण वर्तमान समय में हजारों नवजात का जन्म प्रमाण पत्र सदर अस्पताल के डीएस कार्यालय के फाइलों में बंद है़
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