स्वप्न में माता के दर्शन के बाद हुई थी मां दुर्गा मंदिर की स्थापना

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स्वप्न में माता के दर्शन के बाद हुई थी मां दुर्गा मंदिर की स्थापना फोटो-24,25कैप्सन- बलभद्र पुर स्थित माता का मंदिर व मां दुर्गा की पूजा- अर्चन करते श्रद्धालु प्रतिनिधि, बसंतपुर प्रखंड के बलभद्र पुर पंचायत स्थित मां दुर्गा मंदिर के प्रति लोगों में जबरदस्त आस्था है. कहते हैं यहां सच्चे मन से पूजा करने […]

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स्वप्न में माता के दर्शन के बाद हुई थी मां दुर्गा मंदिर की स्थापना फोटो-24,25कैप्सन- बलभद्र पुर स्थित माता का मंदिर व मां दुर्गा की पूजा- अर्चन करते श्रद्धालु प्रतिनिधि, बसंतपुर प्रखंड के बलभद्र पुर पंचायत स्थित मां दुर्गा मंदिर के प्रति लोगों में जबरदस्त आस्था है. कहते हैं यहां सच्चे मन से पूजा करने वालों की माता सभी मुरादें पूरी करती हैं. दशहरा के मौके पर विशेष रूप से यहां पूजा -अर्चना की जाती है. दूर-दराज के लोग मंदिर पहुंच कर माता के दर्शन व पूजा कर अपने व परिजनों के लिए मंगल कामना करते हैं. 150 वर्ष पूर्व हुई थी मंदिर की स्थापना बलभद्र पुर स्थित मां दुर्गा मंदिर की स्थापना लगभग 150 वर्ष पूर्व की गयी थी. स्थानीय निवासी देव कुमार लाल दास बताते हैं कि कालांतर में यह इलाका राजा बनेली के अधीन था. इसकी कचहरी हृदय नगर पंचायत के सीतापुर में मौजूद थी. राजा के तहसीलदार साधु बाबा को भगवती ने केला के पेड़ के नीचे पिंड होने का स्वप्न दिया था. साथ ही उक्त पिंड को सीतापुर में स्थापित करने की बात कही थी. इसके बाद यहां माता के पिंड की स्थापना की गयी थी. बाद में कोसी के कटाव की वजह से पिंड को रानीगंज पूर्वी कोसी तटबंध के अंदर गांव में स्थापित किया गया. यहां देवी ने पुन: ग्रामीणों को स्वप्न दिया कि उन्हें ऐसे जगह स्थापित किया जाये, जिस गांव के नाम के अंत में पुर लगा हो. फलत: ग्रामीणों ने करनामा गांवों का नाम बदल कर कर्णपुर कर दिया. बाद में कोसी कटाव की वजह से पिंड का कई बार स्थान परिवर्तन किया गया. बुजुर्ग राम सेवक मेहता व हरि देव मेहता बताते हैं कि बनेली राजा कृत्यानंद सिंह के छह पुत्रों में सबसे बड़े श्यामानंद को देवी ने स्वप्न देकर उन्हें बलभद्र पुर में स्थापित करने का आदेश दिया था. इसके बाद उन्होंने बलभद्रपुर के तत्कालीन तहसीलदार जो मूलत: बंगाली थे, को 24 घंटे के अंदर देवी की पिंड की स्थापना करने को कहा. इस आदेश के बाद गंगा राम मरड़, जानकी प्रसाद चौधरी, मो मतालिम, फते हाजी, मो इदरिश, कुर्बान हाजी, अब्दुल गणी जैसे हिंदू व मुसलिम समाज के लोगों की पहल पर पिंड को महेशपट्टी से बलभद्र पुर लाने का प्रयास प्रारंभ किया गया. शुरुआत में महेशपुर वासियों ने विरोध किया. बाद में दोनों गांवों के प्रबुद्ध जनों की पहल पर पिंड को हाथी -घोड़े व लाव लश्कर के साथ बलभद्रपुर लाया गया. ग्रामीण बताते हैं कि पूर्व में इस मंदिर में बलि प्रथा का भी रिवाज था. देश की आजादी के बाद पंचायत के प्रथम मुखिया गंगा राम मंडल के प्रयास से बलि प्रथा को बंद कर दिया गया. वर्तमान में करीब एक एकड़ में निर्मित मंदिर परिसर में माता के वैष्णवी रूप की पूजा की जाती है. हिंदू -मुसलिम एकता के प्रतीक इस स्थान पर नेपाल क्षेत्र के लोग भी दर्शन व पूजा के लिए आते हैं. कहते हैं कि मुसलिम समाज द्वारा भी यहां मुरादें पूरी होने पर चढ़ावा चढ़ाया जाता है. इस वर्ष पूजा संचालन कमेटी के अध्यक्ष सूर्य नारायण मेहता व सचिव उमेश प्रसाद जायसवाल के अलावा समिति में अल्पसंख्यक समुदाय के लोग भी शामिल हैं.

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