तिल्हेश्वर नाथ का विशेष शृंगार, दर्शन को उमड़े भक्त
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :26 Jul 2017 6:06 AM (IST)
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आस्था. विशेष साज-सज्जा के बाद बना आकर्षण का केंद्र सुपौल : ब्रह्मांड के त्रिदेव का प्रिय माह सावन की तीसरी सोमवारी की संध्या शिव भक्तों ने विभिन्न सुगंधित फूलों से स्वयं भू बाबा तिल्हेश्वरनाथ महादेव का विशेष शृंगार किया. साथ ही श्रद्धापूर्वक आरती की गयी. इस दौरान मंदिर के पुजारियों द्वारा भगवान शिव के कई […]
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आस्था. विशेष साज-सज्जा के बाद बना आकर्षण का केंद्र
सुपौल : ब्रह्मांड के त्रिदेव का प्रिय माह सावन की तीसरी सोमवारी की संध्या शिव भक्तों ने विभिन्न सुगंधित फूलों से स्वयं भू बाबा तिल्हेश्वरनाथ महादेव का विशेष शृंगार किया. साथ ही श्रद्धापूर्वक आरती की गयी. इस दौरान मंदिर के पुजारियों द्वारा भगवान शिव के कई नामों का उच्चारण वैदिक पद्धति से किया गया. लयवद्ध व संगीतमय तरीके से हुए आयोजन पर मंदिर परिसर सहित आस-पास का वातावरण भक्तिमय बना रहा. बाबा के शृंगार को देखने हेतु मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी.
बाबा तिल्हेश्वरनाथ न्याय परिषद के सचिव सह तंत्राचार्य अरुण कुमार मुन्ना ने बताया कि पुराण में भी उल्लेखित है कि परमात्मा के विभिन्न कल्याणकारी स्वरूपों में भगवान शिव ही महाकल्याणकारी हैं. जगत कल्याण तथा अपने भक्तों के दुख हरने के लिए वह असंख्य बार विभिन्न नामों और स्वरूपों में प्रकट होते रहते हैं जो मनुष्य के लिए तो क्या देवताओं के लिए भी मुक्ति का मार्ग बनता है. इसी भावना के कारण भोले भंडारी को त्रिदेवों में सर्वाधिक स्थान प्राप्त है. 33 करोड़ देवी-देवताओं में शिव ही ऐसे हैं जिनकी लिंग के रूप में पूजा होती है और जिन्हें उनके भक्त फक्कड़ बाबा के रूप में जानते हैं. उनकी पूजा ब्रह्मा, विष्णु, राम ने भी की है.
कहा कि सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने की, विष्णु जी पालक और रक्षक का दायित्व निभाते हैं. इसके चलते सृष्टि में जो असंतुलन पैदा होता है उसकी जिम्मेदारी भोले बाबा संभालते हैं. इसलिए उनकी भूमिका को ‘संहारक’ रूप में जाना जाता है. लेकिन उनकी भूमिका उस सुनार व लोहार की तरह है जो अच्छे आभूषण एवं औजार बनाने के लिए सोने व लोहे को नये रूप देते हैं. उसे नष्ट नहीं करते. इस प्रक्रिया के उपरांत ही सुंदर रूप में आभूषण व उपयोगी औजार का निर्माण होता है.
तंत्राचार्य श्री मुन्ना ने कहा कि शिव रूप अनेकों प्रतीकों का योग हैं. उनके आस-पास जो वस्तुएं हैं, आभूषण हैं उनसे वह शक्ति ग्रहण करते हैं. शिव मंगल के प्रतीक हैं. शिव संस्कृति हैं. शाश्वत हैं, सनातन हैं. साकार व निराकार हैं. शिव जीवन व मोक्ष हैं. कहा कि अगर शिव नहीं होते तो सृष्टि कैसी? शिव ना होते तो किसी की मृत्यु ना होती. कहा कि भांग, धतूरा जो सामान्य लोगों के लिए हानिकारक है वे उससे ऊर्जा ग्रहण करते हैं.
यदि वह अपने कंठ में विष को धारण नहीं करते तो देवताओं को कभी अमृत नहीं मिलता. इस प्रकार देवताओं को अमरत्व प्रदान करने वाले शिव जी जब अपने रौद्र रूप में अवतरित होते हैं तब उनकी शक्ति पर नियंत्रण पाना सभी देवताओं के लिए कठिन हो जाता है. जीव को कर्म करने की स्वतंत्रता है अगर वह अपने अंदर की बुराइयों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) पर अपने तीसरे नेत्र का अंकुश रखे तो वह सदैव सुखी रहेगा. यदि वह इन पर अंकुश नहीं रखता तो यही उसका विनाश कर देती है.
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