सीतामढ़ी: जब यशोधरा ने सिद्धार्थ से किया तर्क और सवाल, महाभिनिष्क्रमण से पहले कहानी पर हुई खास चर्चा

Updated:
विज्ञापन

साहित्यिक परिचर्चा में एडीएम व अन्य शिक्षाविद्.

कला-संगम और पं. चंद्रशेखर धर शुक्ल साहित्यिक संस्थान द्वारा आयोजित परिचर्चा में एडीएम बृज किशोर पांडेय की कहानी 'महाभिनिष्क्रमण से पहले' का गहन विश्लेषण किया गया. साहित्यकारों ने यशोधरा के चरित्र, उनके मानसिक द्वंद्व और सिद्धार्थ के त्याग के पीछे की प्रेरणाओं पर प्रकाश डाला.

विज्ञापन

Sitamarhi News: सीतामढ़ी. कला-संगम एवं पं. चंद्रशेखर धर शुक्ल साहित्यिक व सांस्कृतिक संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में रविवार को नगर स्थित एक शिक्षण संस्थान के सभागार में साहित्यिक परिचर्चा का आयोजन किया गया. इसमें एडीएम बृज किशोर पांडेय की कहानी ‘महाभिनिष्क्रमण से पहले’ की समीक्षा की गयी. परिचर्चा में कहानी के दार्शनिक पक्ष के साथ सिद्धार्थ और यशोधरा के बीच के मानसिक एवं भावनात्मक द्वंद्व पर साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने विचार रखे.

आपके शहर में

विज्ञापन

यशोधरा के चरित्र को लेकर हुई खास चर्चा

कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि कहानी में यशोधरा को केवल त्यागी हुई पत्नी या करुणा के पात्र के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है. वह सिद्धार्थ से तर्क करती हैं, सवाल पूछती हैं और उनके निर्णय को समझने का प्रयास करती हैं.

एडीएम बृज किशोर पांडेय ने कहा कि ‘महाभिनिष्क्रमण से पहले’ मूलतः एक दार्शनिक और आध्यात्मिक कहानी है, जिसमें ऐतिहासिक एवं पौराणिक प्रसंगों को कल्पनाशील स्वतंत्रता के साथ पुनर्सृजित किया गया है.

सिद्धार्थ के निर्णय से पहले का मानसिक संघर्ष

डॉ. राजकुमार गुप्ता ने कहा कि कहानी महाभिनिष्क्रमण से ठीक पहले घटित उस मानसिक और भावनात्मक संघर्ष की कल्पना करती है, जिसे इतिहास में अक्सर विस्तार से नहीं बताया गया है.

उन्होंने कहा कि कहानी के माध्यम से सिद्धार्थ के निर्णय और यशोधरा की मनःस्थिति को एक अलग दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया गया है.

यशोधरा का विदा करना कहानी का भावनात्मक उत्कर्ष

इतिहासविद राम शरण अग्रवाल ने कहा कि कहानी के अंत में जब यशोधरा स्वयं आरती उतारकर सिद्धार्थ को विदा करती हैं और कहती हैं, ‘विजयी हो प्राणनाथ’, तो वह पत्नी से सहयात्री और अंततः त्याग की सहभागी बन जाती हैं.

उन्होंने इसे कहानी का भावनात्मक उत्कर्ष बताया.

त्याग बनाम दायित्व पर भी हुई चर्चा

गीतकार गीतेश ने कहा कि यह कहानी सामान्य ऐतिहासिक पुनर्कथन से ऊपर उठकर त्याग बनाम दायित्व तथा व्यक्तिगत प्रेम बनाम व्यापक सत्य के द्वंद्व पर विचार करने वाली गंभीर दार्शनिक कथा है.

उन्होंने कहा कि कहानी पाठकों को सिद्धार्थ और यशोधरा के निर्णयों को भावनात्मक एवं दार्शनिक दोनों दृष्टियों से समझने का अवसर देती है.

डॉ. राजकुमार गुप्ता के संयोजकत्व में हुआ आयोजन

डॉ. राजकुमार गुप्ता के संयोजकत्व में आयोजित कार्यक्रम की अध्यक्षता इतिहासविद राम शरण अग्रवाल ने की, जबकि संचालन गीतकार गीतेश ने किया. परिचर्चा में साहित्य और शिक्षा जगत से जुड़े कई लोगों ने हिस्सा लिया.

मौके पर गोयनका कॉलेज के उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. मो. सनाउल्लाह, उर्दू शायर कमरुद्दीन नदाफ, वरिष्ठ कवि सुरेश लाल कर्ण, कृष्णनंदन लक्ष्य, रामबाबू सिंह वनगांव, नितेश कुमार, समाजसेवी प्रमोद नील, शैलेंद्र कुमार खिरहर, निदेशक बिट्टू विश्वास झा, सेवानिवृत्त बीएओ सूर्य मोहन झा, एहतेशाम हुसैन, भूतपूर्व सैनिक अनिल कुमार, प्राध्यापक अमजद रजा समेत अन्य लोग मौजूद रहे.

यह भी पढ़ें: रक्षाबंधन पर छुट्टी में भी खुले रहेंगे डाकघर, भाइयों तक राखी पहुंचाने में जुटे रहेंगे डाकिया


विज्ञापन

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन