डीजे व फायरिंग से बढ़ रहा ध्वनि प्रदूषण

Published at :30 Apr 2016 7:14 AM (IST)
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डीजे व फायरिंग से बढ़ रहा ध्वनि प्रदूषण

समस्या. कई बीमारियों के शिकार हो रहे लोग, सरकारी आदेशों का हो रहा घोर उल्लंघन सरकारी नियमों तथा आदेशों को ताक पर रख कर रात दस बजे के बाद सुबह छह बजे तक डीजे व आॅर्केस्ट्रा के दौरान साउंड सिस्टम का प्रयोग हो रहा है और फायरिंग तथा आतिशबाजी की जा रही है, जिससे ध्वनि […]

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समस्या. कई बीमारियों के शिकार हो रहे लोग, सरकारी आदेशों का हो रहा घोर उल्लंघन
सरकारी नियमों तथा आदेशों को ताक पर रख कर रात दस बजे के बाद सुबह छह बजे तक डीजे व आॅर्केस्ट्रा के दौरान साउंड सिस्टम का प्रयोग हो रहा है और फायरिंग तथा आतिशबाजी की जा रही है, जिससे ध्वनि प्रदूषण ने गंभीर समस्या का रूप धारण कर लिया है. इससे कई गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं लोग.
छपरा(सारण) : शादी-विवाह के दौरान फुल साउंड ध्वनि विस्तारक यंत्रों के बढ़ते प्रयोग तथा हर्ष फायरिंग, खुशी में आतिशबाजी ध्वनि प्रदूषण को न केवल बढ़ावा दे रही है बल्कि कई तरह की समस्याएं भी उत्पन्न कर रही है. प्रशासन द्वारा रोक लगाये जाने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हो रही है.
सरकारी नियमों तथा आदेशों को ताक पर रखकर रात दस बजे के बाद सुबह छह बजे तक डीजे व आॅर्केस्ट्रा के दौरान साउंड सिस्टम का प्रयोग हो रहा है और फायरिंग तथा आतिशबाजी की जा रही है, जिससे ध्वनि प्रदूषण ने गंभीर समस्या का रूप धारण कर लिया है. यह एक ऐसी समस्या है जो छोटे-बड़े, गरीब-अमीर, शिक्षित-अनपढ़, महिला-पुरुष सभी समान रूप से प्रभावित हो रहे हैं. किशोर तथा शिशुओं पर इसका प्रभाव अधिक पड़ रहा है, जिसके गंभीर तथा दूरगामी परिणाम से लोग चिंतित हैं. मुख्य रूप से ध्वनि प्रदूषण का कुप्रभाव श्रवण शक्ति(सुनने की क्षमता) को प्रभावित कर रहा है.
लोगों में श्रवण शक्ति कम हो रही है. साथ ही शारीरिक व्याधियों को भी ध्वनि प्रदूषण उत्पन्न कर रहा है. एक सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले बच्चों में 33 प्रतिशत तथा शहरी क्षेत्र के छह प्रतिशत बच्चे श्रवण बाधित हैं. एक अन्य स्वयंसेवी संगठन ‘ग्रामीण शहर विकास परिषद’ के अनुसार 10 वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों में कान की बीमारी ‘ओटाइटिस मीडीया’ 10 प्रतिशत बच्चों में पायी जाती है और प्रति 1000 जीवित जन्मे शिशुओं में से चार में श्रवण शक्ति अत्यधिक कम पायी जा रही है.
रोकथाम ही है सार्थक उपाय : श्रवण क्षमता मनुष्य को प्रकृति की देन है. यह भी एक स्थापित तथ्य है कि श्रवण विकलांगता दिखती नहीं है, जो व्यक्ति विशेष को अधिक विकलांग बनाती है. मनुष्य की श्रवण क्षमता 20 हर्स्ट से 2000 हर्स्ट तक की आवाज सुनने में सहायता करती है. स्वास्थ्य के लिए हानिरहित होने के लिए ध्वनि को कितनी ऊंचा/कोलाहलपूर्ण होना चाहिए! इसका मानदंड निर्धारित है. शोर के कारण श्रवण शक्ति कम हो रही है. यहां तक कि सुनने की क्षमता भी समाप्त होती जा रही है. यह विषमता एक दिन में उत्पन्न नहीं हो रही है. बल्कि लंबे समय तक शोरगुल से प्रभावित व्यक्ति श्रवण बाधित विकलांग हो रहा है.
नहीं हो रहा है ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण : श्रवण संधारण के लिए शोरगुल सर्वेक्षण के माध्यम से शोरगुल के स्थानों को चिह्नित कर उस पर रोक लगाने का कार्य प्रशासन द्वारा नहीं किया जा रहा है. शोरगुल में कमी लाने, श्रवण रक्षा तथा श्रवण रक्षक उपायों एवं साधनों का उपयोग तथा ध्वनि नियंत्रण संबंधी कानून का अनुपालन करने के प्रति प्रशासन उदासीन बना हुआ है.
उत्पन्न हो रही समस्याएं : ध्वनि-प्रदूषण से शारीरिक, मानसिक व जंतु-वनस्पति संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं, जिसके कारण बहुत कष्ट उठाना पड़ रहा है. ध्वनि प्रदूषण के कारण कान का परदा फटने की शिकायतें बढ़ रही हैं. शोर के कारण हृदय, पाचन तंत्र तथा तंत्रिका-तंत्र पर तो प्रभाव पड़ ही रहा है.
अधिक शोर में रहनेवाले व्यक्ति में रक्तचाप का बढ़ना, हृदयगति तेज होना और दिल का दौरा पड़ने की आशंका बनी रहती है. पाचन-तंत्र की गड़बड़ी से अल्सर होने जैसी शिकायत भी बढ़ रही है. ध्वनि प्रदूषण से कानों के साथ-साथ आंखों पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा है. आंखों की पुतली का आकार छोटा हो रहा है. रंग पहचानने की क्षमता में कमी आ रही है. शरीर की बाहरी त्वचा में रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होने तथा बारीक चर्म परत उतरने जैसी बीमारी भी लोगों में बढ़ रही है.
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