एक कमरा, एक अधिकारी और पूरे जिले में अनुसंधान
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :08 Aug 2017 5:48 AM (IST)
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अधिकारियों व जवानों की कमी से जूझ रहा है एससी-एसटी व महिला थाना हाजत नहीं रहने से हो रही परेशानी सहरसा : अनुसूचित जाति जनजाति व महिलाओं के मामले को त्वरित न्याय दिलाने के लिए 26 जनवरी 2012 को शहर के डीबी रोड व थाना चौक के बीच खुला दोनों थाना खुद अपने उद्धारक की […]
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अधिकारियों व जवानों की कमी से जूझ रहा है एससी-एसटी व महिला थाना
हाजत नहीं रहने से हो रही परेशानी
सहरसा : अनुसूचित जाति जनजाति व महिलाओं के मामले को त्वरित न्याय दिलाने के लिए 26 जनवरी 2012 को शहर के डीबी रोड व थाना चौक के बीच खुला दोनों थाना खुद अपने उद्धारक की बाट जोह रहा है, जिस उद्देश्य से इसकी स्थापना की गयी थी. कुछ वर्ष बाद ही भटकता नजर आ रहा है. न्याय पाना तो दूर की बात है.
मामला सामने आने के बाद उसकी तहकीकात करने के लिए भी सोचना पड़ता है. मालूम हो कि अनुसूचित जाति, जनजाति व महिलाओं से संबंधित पूरे जिले का मामला इसी थाना में दर्ज होता है, जिसका अनुसंधान करने के लिए अधिकारियों की काफी कमी है. इसके कारण ससमय न्याय पाना व देना संभव नजर नहीं आ रहा है, जबकि लगभग प्रतिदिन इस तरह के मामले को लेकर पीड़ित व पीड़िता थाना पहुंच रहे हैं.
होमगार्ड हड़ताल का असर
थाना में जवानों व चालकों की कमी की मुख्य वजह होमगार्ड की हड़ताल भी है. जानकारी के अनुसार सभी थाना, ओपी, शिविर, बैंक, डाकघर सहित अन्य जगहों की सुरक्षा में होमगार्ड जवान जिला बल के साथ कदम से कदम मिला कर विधि व्यवस्था को संधारित करते थे. होमगार्ड जवानों के हड़ताल पर चले जाने के कारण मौजूद जिला बल को ही विभिन्न जगहों पर सुरक्षा व्यवस्था व विधि व्यवस्था में लगाया गया है.
महिला थाना : अब तक नहीं उपलब्ध हो पाया सरकारी नंबर
जिले का महिला थाना एक कमरे में संचालित हो रहा है. उसी कमरे में थानाध्यक्ष भी बैठती हैं और सिरिस्ता का कार्य भी होता है. इतना ही नही पीड़िता अपना दर्द भी थानाध्यक्ष के सामने उसी कमरे में सुनाने को बाध्य हैं. इतना ही नहीं अधिकारी बिना जवान के ही आरोपियों को पकड़ने व छापेमारी करने जाती है. इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिस उद्देश्य से इस थाना की स्थापना की गयी थी, वह कहां तक सार्थक साबित हो रहा है. जबकि पूरे जिले से दर्ज होने वाले कांड का अनुसंधान, छापेमारी व अभियुक्तों की गिरफ्तारी करना यहां के थानाध्यक्ष की ही ड्यूटी है.
जानकारी के अनुसार महिला थाना में थानाध्यक्ष आरती सिंह के अलावे एक सब इंस्पेक्टर ललित कुमार मंडल व नवप्रोन्नत सहायक अवर निरीक्षक लालमुनि देवी है. थाना खुलने के पांच साल बाद भी इसे कोई सरकारी नंबर उपलब्ध नहीं हो पाया है. थानाध्यक्ष के बदलने व स्थानांतरण के बाद लोगों को मोबाइल से सूचना देने में भी काफी परेशानी होती है.
एससी-एसटी थाना : अधिकारियों को ही करना पड़ता है सिरिस्ता का काम
एससी-एसटी थाना के थानाध्यक्ष धर्मवीर साथी व एक सब इंस्पेक्टर संजीव कुमार सिंह को ही मामला सामने आने के बाद उसकी तहकीकात, मामला दर्ज करने से लेकर सिरिस्ता तक का काम करना होता है व थाने की जिप्सी भी खुद चलानी पड़ती है. यह सुनने में भले ही थोड़ा अटपटा लगा हो, लेकिन यह सच्चाई है. थाना जहां अधिकारियों की कमी से जूझ रहा है. वहीं एक सिपाही तक नहीं है. विभाग द्वारा जिप्सी तो दी गयी है, लेकिन उसे चलाने की कोई व्यवस्था नहीं है. इसके अलावे सिरिस्ता कार्य को निबटाने के लिये एक भी मुंशी नहीं है. महिला थाना की तरह ही यह थाना भी एक एस्बेस्टस के एक कमरे में संचालित होता है.
सदर थाना : तीन वाहन पर चालक एक
जिले का आदर्श थाना कहे जाने वाले सदर थाना में भी समस्याओं की कमी नही है. पूरे शहर का देखभाल करने वाले दो मंजिले सदर थाना में कार्यालय हो या हाजत झाड़ू तक लगाने के लिये कोई व्यवस्था नहीं है. स्थानीय स्तर पर साफ-सफाई की व्यवस्था होती है. वहीं थाना में थानाध्यक्ष के वाहन के अलावे दो थार जीप भी है.
लेकिन तीनों वाहन को चलाने वाला सिर्फ एक चालक जिला बल का है. जानकारी के अनुसार थानाध्यक्ष सह पुलिस निरीक्षक भाई भरत के अलावे थाना में पांच सब इंस्पेक्टर व 21 सहायक अवर निरीक्षक हैं. सदर थाना भी जवानों की कमी से जूझ रहा है. स्थिति यह है कि स्वयं थानाध्यक्ष को अपना वाहन भी चलाना पड़ रहा है. वर्तमान में कुछ जिला बल के व कुछ बीएमपी के जवानों के सहयोग से गश्ती व अन्य कार्य निबटाये जा रहे हैं.
इधर किचकिच, तो उधर छपाक से पड़ते हैं कदम
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