दिल्ली के श्रीराम सेंटर में गूंजा 'जय श्रीराम': पूर्णिया के कलाकारों ने 'सीता स्वयंवर' नाटक से राष्ट्रीय मंच पर रचा इतिहास
पूर्णिया के कलाकारों ने दिल्ली के राष्ट्रीय मंच पर रामायण पर आधारित नाटक 'सीता स्वयंवर' का सफल मंचन किया है. इस प्रस्तुति ने कला और संस्कृति के क्षेत्र में जिले को एक महत्वपूर्ण पहचान दिलाई है. नाटक में मैथिली लोकगीतों और युवा कलाकारों की ऊर्जा ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया.
पूर्णिया. पूर्णिया के कलाकारों ने पहली बार राष्ट्रीय मंच पर अपनी कला और संस्कृति का प्रभावशाली प्रदर्शन किया. कोशी आलोक के बैनर तले रामायण के महत्वपूर्ण प्रसंग पर आधारित नाटक ‘सीता स्वयंवर’ का मंचन दिल्ली के मंडी हाउस स्थित श्रीराम सेंटर ऑडिटोरियम में किया गया. पूर्णिया के कलाकारों की इस प्रस्तुति को कला और संस्कृति के क्षेत्र में जिले की महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है.
महर्षि विश्वामित्र के अयोध्या आगमन से शुरू हुआ मंचन
नाटक की शुरुआत महर्षि विश्वामित्र के अयोध्या आगमन और भगवान राम-लक्ष्मण के मिथिला प्रस्थान से हुई. इसके बाद जनकपुरी का दरबार, माता सीता की मन:स्थिति, स्वयंवर की तैयारियां और विभिन्न राज्यों से पहुंचे राजाओं के आगमन का मंचन किया गया.
भगवान शिव के धनुष को उठाने के राजाओं के असफल प्रयासों को भी कलाकारों ने प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया. नाटक का सबसे रोमांचक दृश्य तब आया, जब भगवान राम ने शिव धनुष उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाने का प्रयास किया और धनुष भंग हो गया. इस दृश्य के बाद सभागार तालियों की गड़गड़ाहट और ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष से गूंज उठा.
परशुराम-लक्ष्मण संवाद ने दर्शकों को बांधे रखा
नाटक में परशुराम और लक्ष्मण के बीच संवाद दर्शकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा. दोनों कलाकारों की दमदार संवाद अदायगी और प्रभावशाली अभिनय ने दर्शकों को प्रभावित किया. संवादों के दौरान कलाकारों के अभिनय और मंच प्रस्तुति को दर्शकों की सराहना मिली.
मैथिली और लोकगीतों से दिखी बिहार की सांस्कृतिक झलक
‘सीता स्वयंवर’ को भव्य और प्रभावशाली बनाने के लिए इसमें मैथिली एवं लोकगीतों का विशेष समावेश किया गया. कलाकारों की वेशभूषा, मेकअप, मंच सज्जा और प्रॉप्स पर भी विशेष ध्यान दिया गया. प्रस्तुति में रामायण के प्रसंगों के साथ बिहार की लोक संस्कृति की झलक भी दिखाई गयी. मैथिली और लोकगीतों के इस्तेमाल से नाटक को स्थानीय सांस्कृतिक रंग देने का प्रयास किया गया.

पूर्णिया के कलाकारों को मिला राष्ट्रीय मंच
नाटक के निर्देशक सुनील सुमन ने बताया कि इस प्रस्तुति के माध्यम से पूर्णिया के कलाकारों को राष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला है. उन्होंने कहा कि प्रयास है कि ‘सीता स्वयंवर’ को पूर्णिया और बिहार तक सीमित न रखकर देश के अन्य राज्यों तक भी पहुंचाया जाए.
इन कलाकारों ने निभायी प्रमुख भूमिकाएं
नाटक में राम की भूमिका विक्की, सीता की भूमिका कुमारी चांदनी शुक्ला, लक्ष्मण की भूमिका राज श्रीवास्तव, विश्वामित्र की भूमिका ऋषभ कुमार, जनक की भूमिका अमित कुंवर, रानी सुनयना की भूमिका सोनाली चक्रवर्ती, रावण की भूमिका चंदन कुमार और परशुराम की भूमिका बादल झा ने निभायी.
राजाओं की भूमिकाओं में सृजन मिश्रा, संजय कुमार, साहिल झा और आदित्य शामिल रहे. मंत्री की भूमिका अखिलेश कुमार भारती ने निभायी, जबकि दरबारी और कहार की भूमिका रौनक ने निभायी.
सीता की सखियों में उर्मिला की भूमिका निधि सिंह तथा सखी की भूमिका तन्वी सिंह और काजल कुमारी ने निभायी. नृत्य प्रस्तुति में अनमोल ग्रुप की अंकिता सिंह, खुशी कुमारी, भूमि नंदी, मेघा स्वर्णकार, प्रीति कुमारी, मेघा कुमारी, स्मिति और रुचि शर्मा ने प्रस्तुति दी.
नई पीढ़ी तक भारतीय संस्कृति पहुंचाने का प्रयास
निर्देशक सुनील सुमन ने बताया कि नाटक का उद्देश्य केवल धार्मिक कथा का मंचन करना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के उन मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना है, जो आज भी समाज के लिए प्रासंगिक हैं. उन्होंने कहा कि ‘सीता स्वयंवर’ की खास बात यह है कि इसमें बड़ी संख्या में युवा कलाकारों को मंच दिया गया है. युवाओं की भागीदारी के माध्यम से संस्कृति, परंपरा और धार्मिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास किया जा रहा है.
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