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मुक्त कराये गये 21 बाल मजदूर

पूर्णिया. यह गरीबी और बेबसी की कोख से उपजी मजबूरी है कि जिन हाथों में कलम और कॉपी होनी चाहिए उन हाथों में जूठे प्लेट होते हैं. जिन मासूम बचपन को मां की आंचल के साये में लोरी सुनते हुए रात बितानी चाहिए उनकी होटल के जूठे टेबुल पर सोना मजबूरी होती है. हर कोई […]

पूर्णिया. यह गरीबी और बेबसी की कोख से उपजी मजबूरी है कि जिन हाथों में कलम और कॉपी होनी चाहिए उन हाथों में जूठे प्लेट होते हैं. जिन मासूम बचपन को मां की आंचल के साये में लोरी सुनते हुए रात बितानी चाहिए उनकी होटल के जूठे टेबुल पर सोना मजबूरी होती है.

हर कोई जानता है कि कलेजे के टुकड़े और कोख के अंश को नजरों से दूर भेजना कितना मुश्किल होता है. लेकिन मजबूरियां संवेदना पर इस कदर भारी साबित होती है कि न चाहते हुए भी मासूम बचपन को झुलसने वाली भट्ठी में झोंक दिया जाता है. यह आर्थिक असमानता से उपजी विडंबना है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि बाल अधिकार और शिक्षा का अधिकार की दुहाई देने वाली व्यवस्था क्यों खामोश है और इस व्यवस्था परिवर्तन के लिए क्यों जिहाद नहीं होता है. प्रभात खबर ने कुछ ऐसे ही मासूम बचपन से मिल कर सच से रू-ब-रू होने की कोशिश की है. फैसला आप सुधि पाठकों को करना है कि इस हालात के लिए जिम्मेवार कौन है?

मुस्कान के तहत कार्रवाई
गुलाबबाग, खुश्कीबाग सहित अन्य कई जगहों में मुस्कान कार्यक्रम के तहत हुई कार्रवाई में 21 बाल मजदूर मुक्त कराये गये. मंगलवार को हुई कार्यवाही में सदर एसडीपीओ मनोज कुमार के साथ श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी मनोरंजन झा, श्रम अधीक्षक जावेद रहमत, चाइल्ड लाइन के मो शहजादा हसन, श्रम पदाधिकारी परितोष सिंह, मनोहर कुमार के साथ सदर थानाध्यक्ष उदय कुमार, सहायक खजांची के प्रशांत भारद्वाज, महिला थानाध्यक्ष मेनका रानी, विजेंद्र कुमार, अनि जय नारायण सिंह, सअनि मदन गोपाल शामिल थे. इस कार्यवाही में गुलाबबाग जीरो माइल, खुश्कीबाग, काठपुल, कटिहार मोड़ के होटल, किराना दुकान सहित अन्य जगहों से मुक्त कराये गये बच्चों की उम्र 10 वर्ष से 15 वर्ष तक बतायी जाती है. सभी मुक्त कराये गये बच्चों को फिलहाल सीडब्ल्यूसी को सौंप दिया गया है.
केस स्टडी-1
मुस्कान के तहत मुक्त फरीद(12 वर्ष) लाला होटल में 35 सौ रुपये की मजदूरी पर काम करता था. तीन भाइयों में छोटे फरीद को नन्ही सी उम्र में उसके मामा ने होटल में लगा दिया. फरीद कहता है कि दो बड़े भाई सूरत में मजदूरी करते हैं. पिता ठेला चला कर जो लाते हैं, वो घर में कम पड़ता है. अलबत्ता होटल में काम कर पिता की मदद करता है.
केस स्टडी-2
महज दस वर्ष के उम्र में स्कूल के बजाय होटल में काम करने पहुंच गया साजिद. साजिद की मुश्किलें जो हों, लेकिन वो फर्राटे के साथ सच बयां करता है. साजिद ने कहा कि पिता ने दो शादी की थी. दूसरी पत्नी जहर खाकर मर गयी. बाप जेल में है. मां खेतों में काम करती है. छोटे-छोटे दो भाई-बहन हैं. उनके गुजारा के लिए होटल में काम करना उसकी मजबूरी है.
केस स्टडी-3
समय ने भी सहारा नहीं दिया और स्कूल की पढ़ाई के जगह होटल में काम करने के विवशता आ पड़ी. यह उस मुन्ना की कहानी है जो पढ़ना-लिखना चाहता है, लेकिन हालात के हाथों मजबूर है. मझौआ का रहने वाला मुन्ना महतो मध्य विद्यालय मझौआ में छठी क्लास में पढ़ता था. पिता बर्फ बेचते हैं. आर्थिक तंगी ने उसे जीरो माइल के लेलहा होटल तक पहुंचा दिया.
केस स्टडी-4
काझा कोठी का विक्रम 13 वर्ष की उम्र में दो बार पंजाब में काम कर चुका है. पंजाब से वापस लौटने के बाद मंगलवार को ही खुश्कीबाग स्थित सुनील झा की किराना दुकान में नौकरी पकड़ा था. विक्रम ने स्कूल की किताबें नहीं देखी हैं. पिता पंजाब में मजदूरी करते हैं. घर में दो छोटी बहनों की पढ़ाई एवं परवरिश के लिए बचपन से ही मजदूरी करता रहा है.

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