80-90 के दशक में पटना थिएटर की पहचान थे सतीश आनंद, उनके नाटकों का रहता था इंतजार; शहर के रंगमंच को दिलायी राष्ट्रीय पहचान
सतीश आनंद की तस्वीर
पटना रंगमंच के पर्याय रहे वरिष्ठ रंगकर्मी, अभिनेता और निर्देशक सतीश आनंद का 79 वर्ष की आयु में दिल्ली में निधन हो गया. उनके निधन से कला जगत में शोक की लहर दौड़ गई है.
Satish Anand Passed Away : 80 और 90 के दशक में पटना के रंगमंच को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले वरिष्ठ रंगकर्मी, अभिनेता व निर्देशक सतीश आनंद (Satish Anand) का शनिवार को दिल्ली में निधन हो गया. वे 79 साल के थे. शनिवार शाम 4.25 बजे अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उनका निधन हुआ. करीब छह दशक तक रंगमंच से जुड़े रहे सतीश आनंद ने 1962 में पटना में कला संगम संस्था की शुरुआत की थी. उनके निर्देशन में कला संगम के नाटकों का पटना के दर्शकों को हर साल इंतजार रहता था.
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सतीश आनंद ने पटना में देश के अलग-अलग हिस्सों के नाटक और रंगकर्मियों को मंच दिया. राष्ट्रीय स्तर के नाट्य समारोह भी आयोजित किए. बाद में 1997-98 के आसपास वे दिल्ली चले गए, लेकिन थिएटर से उनका जुड़ाव बना रहा. वहां उन्होंने नाटकों का निर्देशन करने के साथ कलाकारों को प्रशिक्षण भी दिया. उनके काम के लिए उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.
1962 में कला संगम बनाया और नए नाटकों को दी जगह
रंगकर्मी प्रवीण गुंजन ने बताते हैं कि सतीश आनंद ने 1962 में पटना में ‘कला संगम’ की शुरुआत की थी. उस समय पटना का रंगमंच पुराने पारसी थिएटर के असर से निकल रहा था. सतीश आनंद ने आधुनिक हिंदी नाटकों को मंच पर लाने का काम किया. कला संगम के नाटक अच्छे स्तर के लिए जाने जाते थे. हर साल उनके नये नाटक का दर्शकों को इंतजार रहता था.
उन्होंने पटना में राष्ट्रीय नाट्य समारोह भी कराये, जिसमें देश के अलग-अलग हिस्सों के नाटक आये. कला संगम ने बिहार के बाहर भी कई जगहों पर नाटक किये. इस तरह पटना के रंगमंच को देश के दूसरे हिस्सों से जोड़ने में सतीश आनंद की बड़ी भूमिका रही.
समय की पाबंदी व नियम को लेकर सख्त थे सतीश आनंद प्रवीण
गुंजन ने बताया कि सतीश आनंद अपने काम और कार्यशालाओं में समय और नियम को लेकर काफी सख्त रहते थे. 2003 में संगीत नाटक अकादमी की ओर से पटना में हुई आवासीय नाट्य कार्यशाला में सतीश आनंद कैंप डायरेक्टर थे और प्रवीण गुंजन प्रतिभागी. एक दिन बिना बताए घर चले जाने पर सतीश आनंद ने उन्हें कार्यशाला से बाहर कर दिया था.
बाद में उनकी वापसी हुई. इसके बाद कोलकाता में हुई 75 दिन की कार्यशाला में भी सतीश आनंद कैंप डायरेक्टर रहे. वहां फाइनल शो के लिए उन्होंने प्रवीण गुंजन को ‘अंधेर नगरी’ के निर्देशन की जिम्मेदारी दी. हालांकि, उनकी सख्ती का मकसद कलाकारों को बेहतर बनाना था.
पटना के बाद दिल्ली में भी थिएटर और कलाकारों की ट्रेनिंग से जुड़े रहे
रंग निर्देशक व डिजाइनर परवेज अख्तर ने बताया कि सतीश आनंद छह दशक से ज्यादा समय तक रंगमंच में सक्रिय रहे. वे अभिनेता और निर्देशक होने के साथ अच्छे आयोजक भी थे. कला संगम के जरिये उन्होंने आधुनिक हिंदी नाटकों के अलावा दूसरी भाषाओं और देशों के चर्चित नाटकों के हिंदी रूपांतरण भी पटना में मंचित किये. कला संगम ने राष्ट्रीय नाट्य समारोह आयोजित किए और बिहार के बाहर भी प्रस्तुतियां दीं.
1996 के बाद निजी और पारिवारिक कारणों से सतीश आनंद दिल्ली चले गये. वहां भी उन्होंने नाटकों का निर्देशन किया और कलाकारों की ट्रेनिंग से जुड़े रहे. परवेज अख्तर ने उन्हें बिहार में आधुनिक रंगमंच की मजबूत नींव रखने वाला रंगकर्मी बताया.
कलाकारों से आखिरी समय तक बना रहा जुड़ाव
कवि, लेखक, रंगकर्मी और निर्देशक मृत्युंज प्रभाकर ने कहते हैं कि सतीश आनंद ने बिहार के रंगमंच को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभायी. पटना में उनसे दो बार मुलाकात हुई और हाल के दिनों तक फोन पर बातचीत होती रही. अभिनेता और निर्देशक रविकांत सिंह ने बताया कि सतीश आनंद से हाल के दिनों तक बातचीत होती थी और उनका स्नेह व मार्गदर्शन मिलता रहा.
उनके अनुसार, सतीश आनंद का काम लंबे समय तक कलाकारों और रंगमंच से जुड़े लोगों के लिए प्रेरणा बना रहेगा. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD), दिल्ली के दिनों में भी उनका कई कलाकारों से संपर्क बना रहा. उनके साथ काम करने और उनसे सीखने वाले कलाकारों की बड़ी संख्या है.
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