भारतीय रेलवे बोर्ड का फैसला, अब 13 साल में कंडम होंगी ट्रेन की बोगियां, यात्रियों को मिलेंगे नए और आधुनिक कोच

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रेलवे यात्रियों के लिए बड़ी खुशखबरी है. रेलवे बोर्ड ने ट्रेन की बोगियों को कंडम घोषित करने के नियमों में अहम बदलाव किया है. अब 13 साल में पुरानी बोगियों को हटाया जाएगा, जिससे यात्रियों को अधिक सुरक्षित और आधुनिक कोच मिलेंगे.

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पटना से आनंद तिवारी की रिपोर्ट

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पटना सहित बिहार के विभिन्न रेलवे स्टेशनों से सफर करने वाले यात्रियों के लिए राहत भरी खबर है. रेलवे बोर्ड ने पारंपरिक और हाइब्रिड कोचों को कंडम घोषित करने के नियम में बड़ा बदलाव किया है. अब जोनल रेलवे के मुख्य यांत्रिक इंजीनियर आवश्यकता के अनुसार 13 वर्ष पूरे कर चुके पारंपरिक और हाइब्रिड कोचों को कंडम घोषित कर सकेंगे. पहले इन बोगियों की निर्धारित आयु 20 वर्ष थी. इस फैसले से पुराने और खराब कोचों की जगह आधुनिक और सुरक्षित कोचों का संचालन बढ़ेगा.

यात्रियों को मिलेंगे अधिक सुरक्षित और आधुनिक कोच

रेलवे बोर्ड के इस निर्णय का सबसे बड़ा लाभ यात्रियों को मिलेगा. दानापुर मंडल सहित पूर्व मध्य रेलवे के कई मार्गों पर पुराने कोच हटाकर नई और आधुनिक बोगियां लगाई जाएंगी. रेलवे अधिकारियों के अनुसार नई पीढ़ी की एलएचबी और पुश-पुल तकनीक वाली बोगियां अधिक सुरक्षित, आरामदायक और बेहतर सुविधाओं से लैस हैं. इससे यात्रियों का सफर पहले की तुलना में अधिक सुविधाजनक होगा.

350 करोड़ रुपये के 170 हाइब्रिड कोच वर्षों से पड़े हैं बेकार

रेलवे सूत्रों के अनुसार पूर्व मध्य रेलवे के पांचों मंडलों में करीब 170 हाइब्रिड कोच वर्षों से उपयोग से बाहर पड़े हैं. इनकी अनुमानित कीमत लगभग 350 करोड़ रुपये है. इन्हें न तो ट्रेन संचालन में शामिल किया जा सकता था और न ही 20 वर्ष की समयसीमा पूरी न होने के कारण कंडम घोषित किया जा सकता था. इन कोचों के कारण कई स्टेशनों की लूप लाइनें भी लंबे समय से व्यस्त हैं, जिससे परिचालन प्रभावित होता है.

रेलवे बोर्ड ने जोनल अधिकारियों को दिए विशेष अधिकार

रेलवे के विभिन्न जोनों ने इस समस्या को लेकर रेलवे बोर्ड से मार्गदर्शन मांगा था. इसके बाद बोर्ड ने सभी जोनल रेलवे के मुख्य यांत्रिक इंजीनियरों को 13 वर्ष पूरे होने पर पारंपरिक और हाइब्रिड कोचों को आवश्यकता के अनुसार कंडम घोषित करने का अधिकार दे दिया. इससे पुराने कोचों को हटाकर नए कोचों के संचालन का रास्ता साफ होगा.

2008-09 में शुरू हुई थी हाइब्रिड कोचों की शुरुआत

रेलवे जानकारों के अनुसार वर्ष 2008-09 में जर्मन तकनीक आधारित हाइब्रिड कोच भारतीय रेलवे में शामिल किए गए थे. प्रत्येक कोच की कीमत लगभग दो करोड़ रुपये थी. शुरुआती वर्षों में इनका प्रदर्शन बेहतर रहा, लेकिन बाद में छोटे-छोटे तकनीकी पुर्जों की खराबी के कारण कई कोच संचालन से बाहर होते चले गए. वर्ष 2019 तक बड़ी संख्या में ये कोच बेकार हो गए और विभिन्न स्टेशनों की लूप लाइनों पर खड़े कर दिए गए.

जानिए भारतीय रेलवे में किस तरह के कोच चलते हैं

भारतीय रेलवे में समय-समय पर अलग-अलग तकनीक के कोच शामिल किए गए हैं.

  • आईसीएफ कोच: 2008 तक मुख्य रूप से लाल रंग के पारंपरिक आईसीएफ कोच संचालित होते थे.
  • हाइब्रिड कोच: वर्ष 2009 से 2014 के बीच इनका संचालन शुरू हुआ, लेकिन 2019 के बाद इनका उपयोग लगभग बंद हो गया.
  • एलएचबी कोच: वर्ष 2015 से इनका विस्तार हुआ और वर्तमान में पूर्व मध्य रेलवे की लगभग 98 प्रतिशत ट्रेनें एलएचबी कोच से संचालित हो रही हैं.
  • पुश-पुल कोच: वर्ष 2022 से वंदे भारत, अमृत भारत और स्लीपर वंदे भारत जैसी ट्रेनों में इन आधुनिक कोचों का उपयोग किया जा रहा है. ये सुरक्षा और आराम के लिहाज से सबसे उन्नत माने जाते हैं.


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