बिहार में ओवैसी की एआइएमआइएम के खाता खोलने का मतलब क्या है?
Updated at : 25 Oct 2019 8:06 AM (IST)
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अजय कुमार उपचुनाव के रिजल्ट से सीमांचल में नयी राजनीति की आहट पटना : बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के खाता खोलने का मतलब क्या है? पिछले चुनाव से वह अपनी जोरआजमाइश कर रहे थे. शुरू में उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था. लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता उनके जोशीले भाषणों ने युवाओं को अपनी […]
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अजय कुमार
उपचुनाव के रिजल्ट से सीमांचल में नयी राजनीति की आहट
पटना : बिहार में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के खाता खोलने का मतलब क्या है? पिछले चुनाव से वह अपनी जोरआजमाइश कर रहे थे. शुरू में उन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था. लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता उनके जोशीले भाषणों ने युवाओं को अपनी ओर खींचना शुरू किया. ओेवैसी की राजनीति कट्टरता की मानी जाती है. ठीक वैसे ही जैसी दूसरी जमात में है. इस उपचुनाव में उनके उम्मीदवार को 70 हजार वोट मिले.
दूसरे स्थान पर रहीं भाजपा की स्वीटी सिंह को 60 हजार और कांग्रेस की उम्मीदवार सइदा बानो को 25 हजार. हर चुनाव में ऐसी स्थितियां बनती हैं, जब किसी सीट पर मुकाबला तिकोना होने के आसार बन जाते हैं. इसमें अक्सरहां दो की लड़ाई में तीसरे को फतह मिल जाती है. इसीलिए किशनगंज में स्वीटी सिंह के लिए राह आसान मानी जा रही थी. अगर कांग्रेस और ओवैसी की पार्टी के बीच वोटों का बंटवारा आधा-आधा होता, तो नतीजे दो की लड़ाई में तीसरे ने मारी बाजी-की तरह ही होती. पर मामला पलट गया और विधानसभा में एआइएमआइएम (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमिन) का प्रतिनिध पहुंचने में कामयाब हो गया.
दरअसल, भाजपा की जीत लायक उसके विरोधी वोटों का विभाजन कांग्रेस और एआइएमआइएम के बीच नहीं हो पाया. संभव है कि कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति और टिकट बंटवारे में एक परिवार को तवज्जो देना उसके लिए भारी पड़ गया. दिवंगत कांग्रेस सांसद के बेटे टिकट की चाह में थे.
लेकिन पार्टी ने विधायक से सांसद बने मोहम्मद जावेद की माता सइदा बानो को उम्मीदवार बनाया. ऐसी हालत तब हुई जब इस साल हुए लोकसभा चुनाव में एनडीए को 40 में से 39 सीटें मिली थीं और किशनगंज की एकमात्र सीट कांग्रेस को. इस उपचुनाव में कांग्रेस तीसरे स्थान पर पहुंच गयी. दूसरा पक्ष इससे कहीं अधिक गंभीर है. बिहार में मुसलमानों का रूझान मध्यमार्गी पार्टियों के बीच रहा है. नब्बे के दशक में कांग्रेस के जनाधार में व्यापक क्षरण और मध्यमार्गी दलों के उभार के उस दौर ने नये सामाजिक-राजनीतिक समीकरण गढ़े. बाबरी ध्वंस की परिघटना याद करिए.
राजद की असली ताकत ‘माई’ (मुसलिम-यादव) समीकरण मानी जाती रही. लेकिन नीतीश कुमार के राजनीतिक दावेदारी की लंबी लड़ाई के बाद ‘माई’ समीकरण दरकना शुरू हुआ. 2005 से 2010 तक आते-आते मुसलमानों का बड़ा हिस्सा नीतीश कुमार के साथ जुड़ गया. राज्य में मुसलमानों की आबादी करीब 16 फीसदी है.
2010 में राजद को केवल 22 सीटें मिली थीं. और जदयू के साथ भाजपा को दो तिहाई से भी ज्यादा सीटें. जदयू के साथ भाजपा की उस ऐतिहासिक जीत में नये सामाजिक समीकरण की बड़ी भूमिका थी. नब्बे के पहले कांग्रेस के मूल सामाजिक आधार में मुसलमान वोट ठोस स्तंभ की तरह था.
अब जबकि ओवैसी की पार्टी को एक सीट पर फतह मिली है, उससे कोई बड़ा उलट-फेर भले न हो, पर सीमाचंल के अंदर इसे नयी किस्म की मुसलिम राजनीति की आहट मानी जा सकती है. यह उसी तरह की राजनीति है, जैसी दूसरी जमात में है. धर्म की राजनीति एकतरफा तो चलेगी नहीं. कोई एक जमात धर्म को लेकर आगे बढ़ेगा, तो दूसरी जमातों को उसी आधार पर राजनीति के मौके मयस्सर होने लगते हैं.
ओवैसी को मिली एक सीट पर कामयाबी दूसरी जमात में उसी राजनीति का विस्तार तो नहीं है? फिलहाल इस जीत व उसकी वैचारिकी का प्रभाव अब सीमांचल तक में होना माना जा रहा है.
ऐसे हालात में समाज के असली मसायल (मुद्दों) को राजनीति के केंद्र में लाना सबसे अहम सवाल बन जाता है. विकास और सौहार्द की राजनीति ही बिहार के समाज की असली जरूरत है. हालांकि, एआइएमआइएम के विजयी उम्मीदवार ने विकास के पहिये को आगे बढ़ाने का दावा किया है.
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