नवादा कोर्ट का फैसला, 60 दिन में ट्रायल पूरा नहीं तो आरोपी को मिला डिफॉल्ट बेल का अधिकार

फोटो कैप्शन - व्यवहार न्यायालय नवादा का फाइल फोटो | Prabhat Khabar Network
नवादा व्यवहार न्यायालय से विचाराधीन बंदियों के अधिकारों के लिए एक अहम फैसला आया है. प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने BNSS की धारा 480(6) के तहत ट्रायल समय पर पूरा न होने पर डिफॉल्ट बेल देने का आदेश दिया है. यह निर्णय विचाराधीन कैदियों के अधिकारों और कानून के अनुपालन को सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण है.
नवादा व्यवहार न्यायालय से एक महत्वपूर्ण न्यायिक फैसला सामने आया है, जो विचाराधीन बंदियों के अधिकारों और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 480(6) की व्याख्या के लिहाज से अहम माना जा रहा है. प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश आशुतोष कुमार झा ने आर्म्स एक्ट के एक मामले में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) द्वारा जमानत अस्वीकार करने के आदेश को निरस्त करते हुए आरोपी को डिफॉल्ट बेल (वैधानिक जमानत) देने का आदेश दिया है.
क्या था पूरा मामला?
अकबरपुर थाना कांड संख्या 457/2024 के अनुसार तत्कालीन थानाध्यक्ष सह प्रशिक्षु डीएसपी संतोष पासवान के नेतृत्व में पुलिस ने बकसंडा गांव स्थित आरोपी ज्योतिष कुमार सिंह के घर पर छापेमारी की थी. पुलिस के अनुसार तलाशी के दौरान घर से एक देशी पिस्तौल बरामद हुई थी. इसके बाद आरोपी को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. मामले की जांच एसआई सानू कुमार को सौंपी गई थी.
जमानत विवाद कैसे पहुंचा सत्र न्यायालय?
गिरफ्तारी के बाद आरोपी नवंबर 2024 से लगातार न्यायिक हिरासत में था. आरोप तय होने के बाद 10 जुलाई 2025 को पहली गवाही की तिथि निर्धारित हुई, लेकिन इसके बाद भी निर्धारित 60 दिनों के भीतर ट्रायल पूरा नहीं हो सका. आरोपी ने BNSS की धारा 480(6) के तहत डिफॉल्ट बेल की मांग करते हुए सीजेएम कोर्ट में आवेदन दिया, जिसे 2 मार्च 2026 को खारिज कर दिया गया. इसके बाद आरोपी ने प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश की अदालत में पुनरीक्षण याचिका दायर की.
सत्र न्यायालय ने क्या कहा?
प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने निचली अदालत के रिकॉर्ड और दोनों पक्षों की दलीलों का परीक्षण करते हुए कहा कि BNSS की धारा 480(6) का उद्देश्य विचाराधीन बंदियों के मामलों का समयबद्ध निष्पादन सुनिश्चित करना है. यदि पहली गवाही की तिथि से 60 दिनों के भीतर ट्रायल पूरा नहीं होता है, तो आरोपी के वैधानिक जमानत के अधिकार पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. यदि जमानत से इनकार किया जाता है, तो उसके स्पष्ट और विधिसम्मत कारण आदेश में दर्ज होना आवश्यक है.
रिकॉर्ड में क्या मिला?
अदालत ने पाया कि पहली गवाही की तिथि 10 जुलाई 2025 के बाद भी निर्धारित अवधि में ट्रायल पूरा नहीं हुआ और आरोपी लगातार न्यायिक हिरासत में रहा. ऐसे में न्यायालय ने माना कि आरोपी BNSS की धारा 480(6) के तहत डिफॉल्ट बेल पाने का अधिकारी है.
अदालत ने क्या आदेश दिया?
सत्र न्यायालय ने सीजेएम, नवादा के 2 मार्च 2026 के आदेश को निरस्त करते हुए आरोपी को 10 हजार रुपये के निजी मुचलके और समान राशि के दो जमानतदारों पर जमानत देने का निर्देश दिया. साथ ही शर्त रखी कि आरोपी प्रत्येक सुनवाई में उपस्थित रहेगा, किसी गवाह को प्रभावित नहीं करेगा और साक्ष्यों से छेड़छाड़ नहीं करेगा. लगातार दो तिथियों पर बिना उचित कारण अनुपस्थित रहने पर ट्रायल कोर्ट जमानत रद्द करने के लिए स्वतंत्र होगा.
क्यों अहम माना जा रहा है यह फैसला?
यह निर्णय केवल एक आरोपी को जमानत मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि BNSS की धारा 480(6) के अनुपालन को लेकर महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टिकोण भी प्रस्तुत करता है. अदालत ने स्पष्ट किया कि ट्रायल में अनावश्यक देरी होने पर विचाराधीन बंदियों के वैधानिक अधिकारों की अनदेखी नहीं की जा सकती. साथ ही, जमानत अस्वीकार करने की स्थिति में न्यायालय को ठोस और स्पष्ट कारण दर्ज करना अनिवार्य होगा.
क्या होती है डिफॉल्ट बेल?
डिफॉल्ट बेल (वैधानिक जमानत) वह कानूनी अधिकार है, जो कानून में निर्धारित शर्तें पूरी होने पर किसी आरोपी को मिलता है. इस मामले में अदालत ने माना कि पहली गवाही की तिथि से 60 दिनों के भीतर ट्रायल पूरा नहीं होने के कारण आरोपी BNSS की धारा 480(6) के तहत इस राहत का पात्र है.
प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
Prabhat Khabar App :
देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए










