दामोदरपुर की मां चामुंडा काली मंदिर: 36 कोणों में विराजमान देवी, यहां से कोई भक्त खाली हाथ नहीं लौटता
मां चामुंडा की मंदिर. | Prabhat Khabar Network
बिहार के असरगंज में स्थित मां चामुंडा काली मंदिर अपने 36 कोणों वाली अनूठी संरचना और तांत्रिक विधि से हुई स्थापना के लिए प्रसिद्ध है. कहा जाता है कि सच्चे मन से यहां आने वाले किसी भी भक्त को निराशा नहीं लौटानी पड़ती.
असरगंज प्रखंड के दामोदरपुर में स्थित अति प्राचीन काली मंदिर मां चामुंडा के नाम से प्रसिद्ध है. स्थानीय लोगों की मान्यता है कि यहां सच्चे मन से पहुंचने वाले किसी भी भक्त को निराश नहीं लौटना पड़ता. मंदिर की स्थापना पुराने समय में राजा कालीचरण पांडे ने तांत्रिक विधि से करायी थी. पशु मुंड पर स्थापित इस मंदिर की बनावट, पूजा पद्धति और वर्षों पुरानी मान्यताएं इसे क्षेत्र के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती हैं.
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36 कोणों से बनी मंदिर की अनोखी संरचना
मां चामुंडा मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसकी स्थापत्य शैली बतायी जाती है. स्थानीय लोगों के अनुसार पुराने कारीगरों ने 36 कोणों को मिलाकर मंदिर का निर्माण किया था. खास बात यह है कि समय बीतने के बावजूद मंदिर की 36 कोणों वाली संरचना आज भी मौजूद है. मंदिर के गर्भगृह में मिट्टी के पिंड के रूप में मां काली चामुंडा विराजमान हैं, जिन्हें पीतल की कड़ाही से ढककर रखा जाता है.
तांत्रिक विधि से हुई थी मंदिर की स्थापना
स्थानीय मान्यता के अनुसार राजा कालीचरण पांडे ने इस मंदिर की स्थापना तांत्रिक विधि से करायी थी. मंदिर पशु मुंड पर स्थापित होने की बात भी कही जाती है. इसी कारण मंदिर की पूजा पद्धति और धार्मिक परंपराओं को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष आस्था है. स्थानीय लोगों का कहना है कि यह स्थान विंध्याचल की शक्ति परंपरा से जुड़ा हुआ है और इसे विंध्याचल के दूसरे रूप के तौर पर भी देखा जाता है.
मंगलवार और शनिवार को उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
मंदिर में सुबह और शाम सेवक द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है. मंगलवार और शनिवार को यहां विशेष रूप से श्रद्धालुओं की भीड़ जुटती है. इन दिनों मंदिर में बलि चढ़ाने की भी परंपरा रही है. दूर-दराज से लोग अपनी मनोकामना लेकर मां के दरबार में पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं.
मंदिर परिसर की मिट्टी में छिपा है पुराना इतिहास
पुराने जमाने के मदन मोहन शुक्ला बताते हैं कि मंदिर परिसर में यदि आज भी खुदाई की जाए तो बड़ी संख्या में पुराने मुंड मिलने की संभावना है. उनका कहना है कि मंदिर की पुरानी परंपराओं और मान्यताओं का इतिहास काफी पुराना है, जो पीढ़ियों से लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है.
युवाओं से लेकर परिवार तक पहुंचते हैं मां के दरबार
सुबह होते ही नौकरी-पेशा और अपने भविष्य के लिए मेहनत करने वाले युवा भी मंदिर परिसर में पहुंचते हैं. श्रद्धालु मंदिर की साफ-सफाई में सहयोग करने के साथ मां चामुंडा के दर्शन और पूजा-अर्चना करते हैं. सुबह-शाम सेवक मंदिर परिसर की सफाई और पूजा की व्यवस्था संभालते हैं.
वंशज आज भी संभाल रहे मंदिर की व्यवस्था
मंदिर की देखरेख और व्यवस्था आज भी राजा कालीचरण पांडे के वंशजों द्वारा की जा रही है. दुर्गापूजा के दौरान यहां मां चामुंडा की विशेष पूजा-अर्चना होती है. उस समय मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या काफी बढ़ जाती है और पूरा परिसर भक्ति के माहौल में डूब जाता है. स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, परंपरा और इतिहास की जीवंत पहचान है.
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