लक्ष्मी नारायण यज्ञ के दूसरे दिन गूंजा नारायण मंत्र, स्वामी निरंजनानंद ने बताया गुरु भक्ति से जीवन बदलने का मार्ग
श्रद्धालुओं को संबोधित करते स्वामी निरंजनानंद. | Prabhat Khabar Network
लक्ष्मी नारायण यज्ञ के दूसरे दिन स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने कहा कि भक्ति भीतर ईश्वर को अनुभव करने की साधना है. उन्होंने गुरु के आदेश को जीवन की साधना बनाने और पंचाग्नि साधना से आंतरिक विकारों पर विजय पाने का संदेश दिया.
लक्ष्मी नारायण यज्ञ के दूसरे दिन बुधवार को पादुका दर्शन परिसर में वैदिक मंत्रोच्चार, हवन और सामूहिक संकीर्तन से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा. ‘ॐ नमो नारायणाय’ और ‘ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः’ के 108-108 बार जाप से यज्ञ परिसर गूंजता रहा. भजन और जयघोष के बीच श्रद्धालुओं ने आध्यात्मिक ऊर्जा और भक्ति का अनुभव किया.
‘भक्ति केवल पूजा नहीं, भीतर ईश्वर को अनुभव करने की साधना’
कार्यक्रम की शुरुआत ‘हे ईश्वर, हे परमात्मा, अंतर्यामी तुझको प्रणाम’ संकीर्तन से हुई. इसके बाद श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से मंत्र जाप किया. बिहार योग विद्यालय के परमाचार्य परमहंस स्वामी निरंजनानंद सरस्वती ने अपने संबोधन में कहा कि भक्ति केवल पूजा-पाठ और कर्मकांड तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने भीतर गुरु और ईश्वर तत्व को अनुभव करने की साधना है.
उन्होंने कहा कि भक्ति तभी सार्थक होती है, जब उससे जीवन में प्रेम, सेवा, समर्पण और आत्मशुद्धि का भाव पैदा हो. गुरु के प्रति समर्पण और साधना की निरंतरता को उन्होंने आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण आधार बताया.
गुरु का आदेश बना जीवन की साधना
स्वामी निरंजनानंद ने अपने आश्रम जीवन का अनुभव साझा करते हुए कहा कि लंबे समय तक उनका ध्यान योग, प्राणायाम और साधना पर केंद्रित रहा. गुरु के साथ कुंभ, गंगोत्री और केदारनाथ की यात्रा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि साधक के लिए तीर्थ का बाहरी आकर्षण नहीं, बल्कि गुरु का निर्देश और साधना अधिक महत्वपूर्ण है.
उन्होंने बताया कि वर्ष 2009 में स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने उन्हें योग के प्रचार-प्रसार, योग कार्यक्रमों के विस्तार, योग अनुसंधान और योग विद्या के संरक्षण का निर्देश दिया. इस आदेश को उन्होंने अपने जीवन की साधना का आधार बनाया.
पंचाग्नि साधना से भीतर के विकारों पर विजय का संदेश

स्वामी निरंजनानंद ने वर्ष 2013 में शुरू की गई पंचाग्नि साधना को 2024 तक जारी रखने की जानकारी दी. उन्होंने कहा कि इस साधना का उद्देश्य केवल शरीर को तपाना नहीं, बल्कि भीतर की मानसिक अग्नियों पर विजय पाना है.
उन्होंने काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को मनुष्य के भीतर की पांच अग्नियां बताते हुए कहा कि साधना के जरिए इन विकारों को शांत कर साधक शांति, समत्व और आनंद की अनुभूति कर सकता है.
हर व्यक्ति में ईश्वर तत्व देखने की सीख
उन्होंने श्रद्धालुओं से कपट से दूर रहने, भावनाओं पर नियंत्रण रखने और प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर तत्व देखने का प्रयास करने की अपील की. गुरु के आदेश का पालन, शास्त्रों का अध्ययन और नियमित साधना को उन्होंने आंतरिक परिवर्तन का मार्ग बताया.
स्वामी निरंजनानंद ने कहा कि भक्ति भगवान के प्रति परम प्रेम है, जिसमें किसी भौतिक लाभ की अपेक्षा नहीं होती. सेवा, दान, प्रेम और आत्मशुद्धि सच्ची भक्ति के महत्वपूर्ण अंग हैं.
यज्ञस्थल पर भगवान जगन्नाथ की विधिवत स्थापना
यज्ञ के दूसरे दिन मुंगेर पादुका दर्शन से भगवान जगन्नाथ का प्रसाद भी यज्ञस्थल पहुंचा. भगवान जगन्नाथ की विधिवत स्थापना के बाद मंत्रोच्चार के बीच हवन किया गया. श्रद्धालुओं ने सामूहिक संकीर्तन में भाग लिया.
पूरे दिन परिसर में भजन, मंत्र जाप और जयघोष का दौर चलता रहा. आयोजन में गुरु-परंपरा, सेवा, समर्पण और आंतरिक शुद्धता का संदेश प्रमुख रहा.
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