चकिया में बिना मंदिर के होती है गणेशी माता की पूजा, जानें दो मिट्टी की पिंडियों का रहस्य

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गांव में एक छोटा सा मंदिर (प्रतीकात्मक, AI जेनरेटेड)

चकिया के हाताहरपुर में गणेशी माता का अनोखा मेला लगता है, जहां स्थायी मंदिर नहीं है. मिट्टी की दो पिंडियों की पूजा की जाती है. स्थानीय मान्यता है कि माता ने स्वप्न में मंदिर निर्माण से मना किया था.

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चकिया गणेशी माता: पूर्वी चंपारण के चकिया थाना क्षेत्र स्थित हाताहरपुर गांव में भाद्र मास की पूर्णिमा पर लगने वाला गणेशी माता मेला श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है. वार्ड नंबर 14 में हर साल आयोजित होने वाले इस एक दिवसीय मेले में आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. खास बात यह है कि यहां गणेशी माता का कोई स्थायी मंदिर नहीं है. मिट्टी से बनी दो पिंडियों की पूजा की जाती है, जिन्हें स्थानीय लोग गहरी श्रद्धा के साथ इच्छापूर्णी मां के रूप में भी मानते हैं.

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भाद्र पूर्णिमा पर जुटते हैं बड़ी संख्या में श्रद्धालु

गणेशी माता मेला हर वर्ष भाद्र मास की पूर्णिमा के दिन आयोजित किया जाता है. इस पारंपरिक मेले का आयोजन स्थानीय ग्रामीणों के सामूहिक सहयोग से किया जाता है. पूर्णिमा के दिन सुबह से ही महिलाओं और अन्य श्रद्धालुओं का पूजा के लिए पहुंचना शुरू हो जाता है.

श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने की कामना लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं. ग्रामीणों के अनुसार, हर साल पूजा-अर्चना करने वालों की संख्या बढ़ रही है, जिससे इस मेले की पहचान क्षेत्र में लगातार मजबूत होती जा रही है.

मिट्टी की दो पिंडियों की होती है पूजा

गणेशी माता स्थल की सबसे खास बात यहां किसी भव्य या स्थायी मंदिर का नहीं होना है. यहां अस्थायी रूप से मिट्टी से निर्मित दो पिंडियों की पूजा की जाती है. स्थानीय लोगों की मान्यता है कि यही पिंडियां गणेशी माता का स्वरूप हैं.

गांव वालों के अनुसार, कई वर्ष पहले यहां स्थायी मंदिर निर्माण की पहल की गई थी. हालांकि स्थानीय मान्यता के मुताबिक, उसी दौरान माता ने एक ग्रामीण के स्वप्न में आकर किसी भी प्रकार का स्थायी निर्माण नहीं कराने की बात कही थी. इसके बाद मंदिर निर्माण का विचार छोड़ दिया गया और तब से आज तक इसी परंपरा के अनुसार मिट्टी की पिंडियों का पूजन किया जा रहा है.

मन्नत पूरी होने पर बलि की पुरानी परंपरा

पूर्णिमा के दिन विशेष पूजा-अर्चना के बाद श्रद्धालु माता के प्रति अपनी आस्था प्रकट करते हैं. यहां मन्नत पूरी होने पर बलि चढ़ाने की भी पुरानी परंपरा चली आ रही है. ग्रामीणों का कहना है कि लोग अपनी मनोकामना पूरी होने पर माता के दरबार में पहुंचकर परंपरा के अनुसार पूजा करते हैं.

गांव के बुजुर्ग भिखारी गिरि बताते हैं कि गणेशी माता का इतिहास काफी पुराना है. इलाके के लोग माता को इच्छापूर्णी मां के नाम से भी जानते हैं और उनकी गहरी आस्था इस स्थान से जुड़ी हुई है.

ग्रामीणों के सहयोग से सजता है आस्था का मेला

एक दिवसीय गणेशी माता मेले के आयोजन में गांव के लोग मिलकर सहयोग करते हैं. मेले के दौरान पूरे इलाके में धार्मिक और उत्सवी माहौल बना रहता है. स्थानीय ग्रामीणों का मानना है कि यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गांव की एकता और सामूहिक परंपरा का भी प्रतीक है.

मौके पर नागेंद्र गिरि, प्रमोद गिरि, सतेंद्र गिरि, राजकुमार गिरि, गोपाल गिरि, संजय गिरि सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे.

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