एक घंटे का सफर ढाई घंटे में
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के कारण िजला मुख्यालय से बारसोई के बीच 55 िकमी की दूरी लोग ढाई घंटे में पूरी करने को िववश हैं. कटिहार : जिला मुख्यालय से बारसोई अनुमंडल क्षेत्र के बड़ी आबादी को जोड़ने वाली सड़क की स्थिति बेहद खराब है. सड़क संकरी होने के साथ-साथ जर्जर हालत में हैं. इसके कारण […]
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जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के कारण िजला मुख्यालय से बारसोई के बीच 55 िकमी की दूरी लोग ढाई घंटे में पूरी करने को िववश हैं.
कटिहार : जिला मुख्यालय से बारसोई अनुमंडल क्षेत्र के बड़ी आबादी को जोड़ने वाली सड़क की स्थिति बेहद खराब है. सड़क संकरी होने के साथ-साथ जर्जर हालत में हैं. इसके कारण आवागमन की समस्या से एक बड़ी आबादी वर्षों से जूझ रही है. इस ओर न जिला प्रशासन का कोई ध्यान है न ही जनप्रतिनिधियों का ही. गौरतलब हो कि बारसोई अनुमंडल क्षेत्र में को जिला मुख्यालय से जोड़ने वाली सड़क 10 फीट चौड़ी है. यही नहीं सड़क को आबादी के बीच से गुजरने की वजह से काफी मोड़ भी है. इसके कारण वाहन चालकों को आवागमन में काफी परेशानी उठानी पड़ रही है.
कटिहार से बारसोई अनुमंडल की दूरी लगभग 50 से 55 किलोमीटर है. इतनी दूरी तय करने के लिए चार चक्का या दो चक्का वाहन को एक घंटा का समय काफी होना चाहिए. लेकिन सड़क संकरी होने एवं जर्जर हालत होने की वजह से वाहन चालकों को यही दूरी तय करने में दो से ढाई घंटे का वक्त लग जाता है. बेहतर सड़क नहीं होने की वजह से ही जिला मुख्यालय से बारसोई या बलरामपुरतक जाने के लिए सड़क मार्ग से न ही कोई बस का परिचालन होता है न ही अन्य वाहनों का.
50-55 किलोमीटर है दूरी : जिला मुख्यालय से बारसोई अनुमंडल की दूरी 50 से 55 किलोमीटर के आसपास है लेकिन इतनी ही दूरी तय करने में वाहन चालकों को ढाई घंटे से अधिक का वक्त लगता है. जबकि इतनी दूरी तय करने में मुश्किल से एक घंटा का समय लगना चाहिए. लेकिन सड़क संकरी होने के कारण तथा आबादी के बीच से सड़क गुजरने के कारण वाहन चालकों को दूरी मापने में अधिक वक्त लग रहा है.
गौरतलब हो कि कटिहार से डंडखोरा की दूरी 10 किलोमीटर है. यदि बेहतर सड़क हो तो 10 मिनट का समय इतनी दूरी तय करने में लगेगा. लेकिन दस किलोमीटर की सफर तय करने में पौने घंटा से एक घंटा का समय लग जाता है. जबकि कटिहार से कदवा के सोनैली की दूरी 20 किलोमीटर के करीब है. सड़क बेहतर नहीं होने के कारण दो पहिया या चार चक्का वाहनों को इतनी ही दूरी तय करने में ढेड़ घंटे का वक्त लग जाता है. आजमनगर के सालमारी, बारसोई इसके बाद बलरामपुर तक पहुंचने में और भी ज्यादा समय लोगों को लगता है.
ऐसी सड़क होने की वजह से जयरी काम पड़ने पर लोगों को काफी परेशानी होती है. यदि किसी की तबीयत खराब हो जाये या दुर्घटना हो जाय और उसे तुरंत बारसोई या बलरामपुर से सदर अस्पताल या मेडिकल कॉलेज अस्पताल लाना हो तो मरीज समय पर अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में दम तोड़ देते हैं. इसे आज के समय में विउंबना ही कहा जायेगा कि इतनी बड़ी आबादी को जोड़ने वाली सड़क को बेहतर बनाने की दिशा में कोई पहल नहीं हो रही है.
जनप्रतिनिधियों का नहीं है कोई ध्यान : सड़क को बेहतर करने की दिशा में जिला प्रशासन तो उदासीन बना ही हुआ है. उन्हें तो बारसोई अनुमंडल क्षेत्र के लोगों की सुविधा से मानो कोई लेना-देना ही नहीं है. लेकिन जिन लोगों को जिता कर स्थानीय लोगों ने सांसद बनाकर दिल्ली भेजा, विधायक बनाकर पटना भेजा. उन्हें भी सड़क को बेहतर कराने की दिशा में कभी कोई प्रयास नहीं किया है. गौरतलब हो कि बारसोई अनुमंडल में दो-दो विधायक है.
एक बलरामपुर विधानसभा से महबूब आलम तो दूसरे कदवा विधानसभा क्षेत्र के डॉ शकील अहमद खान है. दोनों ही विधायक अब तक इस मामले में कोई खास काम नहीं कर सकें. वही सांसद तारिक अनवर से क्षेत्र के लोगों को काफी भरोसा है लेकिन उनके द्वारा भी कोई पहल नहीं हो रही है. जिससे लोगों में जनप्रतिनिधियों के प्रति आक्रोश व्याप्त है.
लोग पलायन को मजबूर
जिले में नया उद्योग स्थापित कराने में जनप्रतिनिधियों और जिला प्रशासन तथा उद्योग लगाने वाले व्यवसायी के इंटरेस्ट नहीं लेने के कारण उद्योग के क्षेत्र में जिला पिछड़ता जा रहा है. पुराने जो भी उद्योग थे वह भी धीरे-धीरे खत्म होते चले जाने से लोगों का पलायन अन्य बड़े शहरों की तरफ हो रहा है. लगभग 30 लाख की आबादी वाले इस जिले में उद्योग के नाम पर कुछ नहीं है. पुराने उद्योग के खत्म होने से कई लोग बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे हैं. जिला उद्योग केंद्र के द्वारा कई कल्याणकारी योजना चलायी जा रही है, फिर भी उद्यमी आगे नहीं आ रहे हैं. जिले में उद्योग स्थापित नहीं होने के कारण कई युवा शिक्षित होकर भी बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं.
कई उद्योग हो गये बंद : कटिहार शहर में भारत का पहला दिया-माचिस फैक्टरी खोला गया था. इसमें हजारों लोगों को काम मिला था. देखरेख के अभाव में यह फैक्टरी भी बंद हो गयी. इसके बाद इस में कार्य करने वाले कई कामगार बेरोजगार हो गये. शहर में दो फ्लावर मिल स्थापित जिसमें हजारों मजदूर काम करते थे. कई दशकों तक मजदूरों को रोजगार मुहैया कराने वाला दो फ्लावर मिल भी बंद हो गया और कई मजदूर बेरोजगार हो गये.
शिलान्यास तो हुआ, उद्योग नहीं लगा : जिले में जो उद्योग स्थापित था वह मृतप्राय हो चुका है और जो उद्योग लगना था वह भी शिलान्यास होकर रह गया. एफसीआई का भंडारागार निर्माण के लिए तीन गछिया में जमीन भी अधिग्रहण की गयी और वर्ष 1997 में भारत सरकार के खाद और उपभोक्ता मामले के तत्कालीन मंत्री देवेंद्र प्रसाद यादव ने शिलान्यास भी किया.
लेकिन अब तक उक्त जगह पर एफसीआइ का भंडारागार का निर्माण नहीं हो सका. तत्कालीन रेल मंत्री दिवंगत माधवराव सिंधिया ने वर्ष 1994 में स्लीपर कोच फैक्टरी बैठाने के लिए घोषणा की थी. वर्ष 1994 से घोषणा के बाद भी आज तक रेल का स्लीपर फैक्टरी नहीं बन पायी, जबकि रेल के पास इस फैक्टरी को स्थापित करने के लिए पर्याप्त भूमि मौजूद है. यूपीए-2 में खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री सह वर्तमान सांसद तारिक अनवर ने भसना स्थित भूमि पर फूड प्रोसेसिंग प्लांट लगाने के लिए शिलान्यास किया था.
लेकिन यूपीए की सरकार जाते ही यह शिलान्यास ठंडे बस्ते में चला गया.
कहते हैं मजदूर नेता : इंटक के जिला अध्यक्ष विकास सिंह ने बताया कि एक के बाद एक उद्योग बंद होने से मजदूर सड़कों पर आ गये हैं. बेरोजगारी बढ़ी है. स्थानीय जनप्रतिनिधियों से लेकर जिला प्रशासन भी इसमें रुचि नहीं दिखा रही है. आंदोलनकारी नेता समरेंद्र कुणाल ने बताया की घोषणा की आड़ में नेता अपनी राजनीति रोटी सेंक रहे हैं. फूड प्रोसेसिंग, एफसीआइ भंडारागार और कंक्रीट स्लीपर फैक्टरी की घोषणा व शिलान्यास इसी ओर इशारा कर रही है.
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