बंधुआ मजदूरों जैसा जीवन जी रहे घरेलू कामगार
Author Prabhat khabar digital desk
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जहानाबाद : आज दुनिया भर में लेबर डे यानी श्रमिक दिवस मनाया जा रहा है. आज ही के दिन दुनिया के श्रमिकों के अनिश्चित काम के घंटों को निश्चित घंटे में तब्दील किया गया था. अंतर्राष्ट्रीय तौर पर मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत एक मई 1886 को हुई थी. भारत में मजदूर दिवस सबसे पहले […]
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जहानाबाद : आज दुनिया भर में लेबर डे यानी श्रमिक दिवस मनाया जा रहा है. आज ही के दिन दुनिया के श्रमिकों के अनिश्चित काम के घंटों को निश्चित घंटे में तब्दील किया गया था. अंतर्राष्ट्रीय तौर पर मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत एक मई 1886 को हुई थी. भारत में मजदूर दिवस सबसे पहले चेन्नई में एक मई 1923 को मनाना शुरू किया गया था. इस दिन मजदूर उत्पीड़न, न्यूनतम मजदूरी कानून सहित मजदूरों के अधिकारों की आवाज बुलंद की जाती है.
सरकारी और संगठित क्षेत्र में श्रम कानूनों का लगभग पालन होता है, पर असंगठित क्षेत्र के कामगारों को कई तरह के शोषण का सामना करना पड़ता है. जहानाबाद में पेट्रोल पंप, फर्नीचर उद्योग, सिलाई उद्योग, निजी अस्पताल, नर्सिंग होम, चावल-आटा- दाल-तेल मिल, प्रिंटिंग प्रेस, दुकानें और मॉल्स, भवन निर्माण, बेकरीज, ईंट भट्ठा, सिक्योरिटीज़ एजेंसी, रेस्टोरेंट, कूरियर सेवा, निजी विद्यालय आदि में श्रम कानूनों का पालन नहीं हो रहा है.
एक किराना दुकान में काम करने वाले सुधीर कुमार बताते हैं कि महीने के सिर्फ पांच हजार रुपये मिलते हैं. मंगलवार को साप्ताहिक छुट्टी मिलती है, लेकिन बीमार होने पर कोई छुट्टी नहीं मिलती. अगर किसी दिन बीमार पड़ जाये या आवश्यक कार्य से छुट्टी लेते हैं तो उस दिन का वेतन काट लिया जाता है. रोज 10-12 घंटे काम करना पड़ता है. वहीं एक रेस्टोरेंट में काम कर रहे बुधन कुमार का कहना है कि महीने के 6000 मिलते हैं पर एक भी दिन की छुट्टी नहीं मिलती और रोजाना 10 घंटे काम करना पड़ता है.
अन्य क्षेत्रों में काम कर रहे लोग इसी तरह के खराब हालात का सामना कर रहे हैं. एक सिक्योरिटीज एजेंसी में काम करने वाले गार्ड ने नाम न छापने का आग्रह कर बताया कि एजेंसी द्वारा हर महीने 16 हजार का पेमेंट खाते में डाला जाता है, लेकिन 7500 रुपये नकद एजेंसी वापस ले लेती है. ऐसा नहीं करने पर नौकरी से निकाल दिया जायेगा. एक निजी स्कूल की शिक्षिका आयशा परवीन बताती हैं कि सिर्फ 3000 रुपये महीने का मिलता है. पगार बढ़ाने की मांग करने पर स्कूल छोड़ने को कहा जाता है.
90 प्रतिशत घरों में काम करतीं हैं गरीब महिलाएं
शहर में उच्च वर्ग और मध्यम वर्ग के घरों में बर्तन धोने, कपड़ा धोने, पोछा लगाने, बच्चों की देखभाल करने और अन्य दूसरे घरेलू काम के लिए कामगारों को रखा जाता है. 90 प्रतिशत घरों में यह काम गरीब महिलाएं करती हैं. जहां इनकी गरीबी का भरपूर शोषण किया जाता है, बहुत कम वेतन दिया जाता है. शहर के घरों में झाड़ू -पोंछा का काम करने वाली कामगार विनीता, सुगिया, लालमणि ने बताया कि जी-तोड़ मेहनत के बाद भी हजार रुपये भी पगार के रूप में नहीं मिलते.
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