जमुई: चिराग पासवान के गोद लिए 'आदर्श पंचायत' में विकास की खुली पोल! दहियारी के खांजर गांव में न सड़क, न स्कूल और न स्वास्थ्य केंद्र

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ख़ांजर गांव जाने वाली एक कच्ची सड़क

चिराग पासवान द्वारा गोद लिए गए जमुई के खांजर गांव में विकास की पोल खुली है. दशकों बाद भी गांव में पक्की सड़क, पुलिया, स्कूल और स्वास्थ्य उपकेंद्र जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. बरसात में गांव टापू बन जाता है.

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जमुई जिले के सोनो प्रखंड अंतर्गत बटिया थाना क्षेत्र की दहियारी पंचायत को कभी 'आदर्श ग्राम योजना' के तहत तत्कालीन सांसद चिराग पासवान द्वारा गोद लेकर चमकाने का दावा किया गया था. कागजों पर 'आदर्श पंचायत' घोषित दहियारी के आदिवासी बाहुल्य खांजर गांव की जमीनी हकीकत आज भी दावों की हवा निकाल रही है. करीब 250 की आबादी वाला यह आदिवासी टोला आजादी के दशकों बाद भी पक्की सड़क, पुलिया, स्कूल, स्वास्थ्य उपकेंद्र और सामुदायिक भवन जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है. बरसात का मौसम आते ही नदी-नालों में उफान के चलते गांव का प्रखंड मुख्यालय से संपर्क कट जाता है और गांव टापू में तब्दील हो जाता है.

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महज 500 मीटर पक्की सड़क और एक पुलिया का अटका काम

सरकारी योजनाओं के तहत सड़कों का जाल बिछाने का दावा खांजर गांव की सीमा पर आकर दम तोड़ देता है:

  • कच्चा और दुर्गम रास्ता: गांव के मुख्य हिस्से तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है. गांव से कुछ दूरी तक सड़क बनी है, लेकिन बीच में पड़ने वाले बरसाती नाले/नदी पर पुलिया और महज आधा किलोमीटर (500 मीटर) सड़क न बनने से पूरा गांव अलग-थलग पड़ गया है.
  • बरसात में कट जाता है संपर्क: बरसात के दिनों में जलभराव और तेज बहाव के कारण ग्रामीणों, महिलाओं और बच्चों का गांव से बाहर निकलना जानलेवा जोखिम बन जाता है.

4 किमी दूर पढ़ने जाते हैं मासूम, खाट पर ढोए जाते हैं मरीज

गांव में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति बदहाल है:

  • शिक्षा से वंचित बच्चे: गांव में कोई प्राथमिक या बुनियादी विद्यालय नहीं है. नन्हे-मुन्ने बच्चों को 4 किलोमीटर दूर खैरालेवार स्थित स्कूल में पढ़ने जाना पड़ता है, जिससे बरसात के दिनों में बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह ठप हो जाती है.
  • स्वास्थ्य उपकेंद्र नदारद: गांव में कोई उपकेंद्र या एएनएम सेंटर नहीं है. प्रसव पीड़ा से जूझती महिलाओं और गंभीर मरीजों को ग्रामीण खाट या कंधे पर लादकर मुख्य सड़क तक पहुंचाते हैं.
  • पत्ते और मजदूरी ही सहारा: रोजगार का कोई साधन न होने से गांव के महिला और पुरुष जंगलों से सखुआ के पत्ते चुनकर पत्तल बनाने और मजदूरी करने को विवश हैं.

क्या कहते हैं खांजर गांव के ग्रामीण?

स्थानीय आदिवासी ग्रामीणों ने अपनी व्यथा बयां करते हुए जनप्रतिनिधियों और सिस्टम पर गंभीर सवाल उठाए:

  • लखन मरांडी: "हमारे गांव तक पक्की सड़क नहीं पहुंची है. बरसात में मरीज को खाट पर उठाकर अस्पताल ले जाना हमारी मजबूरी बन जाती है."
  • मंझली सोरेन: "गांव में न डॉक्टर है न अस्पताल. हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़-लिखकर आगे बढ़ें, लेकिन गांव में स्कूल तक नहीं है."
  • सुनील किस्कू: "सरकार के विकास के दावे यहां पूरी तरह खोखले हैं. न कोई सरकारी भवन बना और न ही युवाओं के लिए रोजगार है, सब पलायन करने को मजबूर हैं."
  • मंजू हेंब्रम: "नदी पर पुलिया न होने से बरसात में हमारा गांव पूरी तरह कट जाता है. सबसे ज्यादा आफत बुजुर्गों, महिलाओं और बीमारों पर आती है."
  • नुनका किस्कू: "जब सांसद चिराग पासवान जी ने पंचायत को गोद लिया था, तब लगा था कि हमारा जीवन बदलेगा. लेकिन चुनाव बीतने के बाद नेता मुड़कर नहीं देखते, हालात आज भी जस के तस हैं."

ग्रामीणों ने उठाई स्थायी समाधान की मांग

खांजर गांव के ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से अविलंब संज्ञान लेते हुए गांव को मुख्य मार्ग से जोड़ने के लिए 500 मीटर सड़क, नदी पर उच्चस्तरीय पुलिया, एक प्राथमिक विद्यालय और स्वास्थ्य उपकेंद्र स्थापित करने की पुरजोर मांग की है.


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