जीवन की सांझ में ''सहारे की लाठी'' ही दे रहा ''जख्म''

Published at :21 Jun 2018 4:36 AM (IST)
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जीवन की सांझ में ''सहारे की लाठी'' ही दे रहा ''जख्म''

दवाइयों का खर्च व सेवा के चलते अपनी औलाद समझते हैं बोझ अाजीज होकर प्रशासन के पास पहुंच रहे मां-बाप गोपालगंज : औलाद के लिए माता-पिता क्या कुछ नहीं करते. ममता-प्यार से परवरिश, पढ़ाने-लिखाने और आसमान की बुलंदियों पर पहुंचाने के लिए जी-जान लगा देते हैं. यही औलाद आगे चलकर सहारे की लाठी बनने के […]

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दवाइयों का खर्च व सेवा के चलते अपनी औलाद समझते हैं बोझ

अाजीज होकर प्रशासन के पास पहुंच रहे मां-बाप
गोपालगंज : औलाद के लिए माता-पिता क्या कुछ नहीं करते. ममता-प्यार से परवरिश, पढ़ाने-लिखाने और आसमान की बुलंदियों पर पहुंचाने के लिए जी-जान लगा देते हैं. यही औलाद आगे चलकर सहारे की लाठी बनने के बजाय बुजुर्गों पर सितम ढा रहे हैं. नगर थाने के थानेदार से अपने अतातायी बेटे की शिकायत करते हुए वृद्ध मां फफक पड़ी. हरखुआ रेलवे स्टेशन के समीप की रहने वाली इस मां पर बेटा रोज जुल्म ढा रहा है. थानाध्यक्ष रवि कुमार ने भरोसा दिलाया कि उसे समझाया जायेगा, नहीं मानेगा तो कार्रवाई की जायेगी. यह मां अकेले नहीं, बल्कि शहर में ऐसे 30 फीसदी से ज्यादा बुजुर्ग हैं, जो अपने ही बच्चों से प्रताड़ित हो रहे हैं. बुजुर्गों को प्रताड़ित करने वालों में 47 फीसदी बेटे और शेष बहुएं हैं.
सबसे बड़ा कारण मां-बाप को बोझ समझना
हाल ही में सहज सेवा संस्थान ने सर्वे कराया था, जिसके मुताबिक प्रताड़ना का सबसे बड़ा कारण बच्चों द्वारा माता-पिता को बोझ समझना है. बच्चे बुजुर्ग मां-बाप की बढ़ती उम्र के चलते उनका रहन-सहन, उनकी बीमारी के चलते दवाइयों का खर्च, सेवा के चलते बोझ समझ रहे हैं. इसीलिए उनसे अलग होना चाहते हैं. इसके अलावा प्रोपर्टी विवाद के मामले भी अधिक हैं. शहर की 65 वर्षीया सविता (बदला नाम) का कहना है कि बेटा बोझ समझता है. वह कहता है कि घर में नौकरों की तरह काम करो. इसी तरह 62 वर्षीया विनीता (बदला नाम) बताती हैं कि जब घर पर कोई नहीं होता है तो बहू उन्हें पीटती है.
बदनामी के डर से नहीं करते शिकायत
बुजुर्गों के मुताबिक प्रताड़ना झेलने के बावजूद इसकी शिकायत भी नहीं करते. शहर के 67 फीसदी वृद्ध ऐसे हैं जो परिवार की बदनामी के डर से सब कुछ सहते हैं. वह इसे पारिवारिक मामला मानते हैं और प्रताड़ित होते रहते हैं. 25 फीसदी वृद्धों को यह जानकारी ही नहीं है कि उन्हें कानूनी मदद कैसे मिल सकती है. महज नौ फीसदी वृद्ध ही पुलिस या अन्य कानूनी सहायता ले पाते हैं.
एसडीओ के यहां करें शिकायत
बुजुर्ग मां-बाप को अगर बेटा या बहू तंग करते हैं तो वे सादे कागज पर अपनी शिकायत एसडीएम के समक्ष दे सकते हैं. अनुमंडल स्तरीय पोषण न्यायाधिकरण का गठन किया गया है, जो भरण-पोषण के लिए अधिकतम राशि 10 हजार रुपये प्रतिमाह तक देने का आदेश दे सकता है.
प्रताड़ना के प्रमुख कारण
25 फीसदी औलाद बुजुर्गों से अलग रहना चाहते हैं.
23 फीसदी बुजुर्गों को परिवार पर बोझ समझा जा रहा है
22 फीसदी वृद्ध प्रोपर्टी के कारण बच्चों से प्रताड़ित हो रहे हैं
22 फीसदी वृद्धों को रहन-सहन के कारण फटकार सुननी पड़ती है.
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