मुख्य सड़क से नहीं जुड़ पाया हर गांव

By Prabhat Khabar Digital Desk
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गया: बिहार में जिस हिसाब से जनसंख्या बढ़ी है, उस हिसाब से सड़कें नहीं बनी हैं. बिहार कृषि प्रधान राज्य है. ऐसे में जरूरत है हर गांवों तक मुख्य सड़क से रोड की कनेक्टिविटी (संपर्क) हो.

हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए कि एग्रो-इंडस्ट्री बेस्ड सड़कें बनायी जाये. इससे हमारी अर्थव्यवस्था भी सुदृढ़ होगी व निर्माण का खर्च भी निकल जायेगा. साथ ही, लोगों की पहुंच भी हर जगह तक हो जायेगी. पथ निर्माण विभाग की ओर से राज्य में रोड कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री के कार्यकलापों पर आधारित क्षेत्रीय कार्यशाला में मुद्दे सामने आये.

होटल विष्णु विहार में आयोजित कार्यशाला में इंजीनियर रूपेश ने कहा कि बिहार में पिछले 20 वर्षो से सड़क निर्माण को लेकर कोई मास्टर प्लान ही नहीं बना है. सड़कों के विकास व विस्तार के लिए कोई प्रोजेक्ट नहीं बना. पिछले छह-सालों में जब से नीतीश की सरकार आयी, तो इस दिशा में कामकाज शुरू हुआ. गुड गवर्नेस की चीजें दिखाई देने लगीं. सड़क, पुल व बाइपास निर्माण की कई योजनाएं ली गयीं. पर, कई प्रशासनिक, तकनीकी व सुरक्षा के साथ-साथ सामाजिक व असामाजिक अड़चनों के कारण कई सालों से अधूरी पड़ी हैं. इसका कारण जानना जरूरी है, ताकि इसका हल ढूंढ़ा जा सके. यह कार्यशाला इसी उद्देश्य को लेकर किया गया है. राष्ट्रीय राजपथ को राजकीय राजपथ व ग्रामीण सड़कों से जोड़ने की योजना को मूर्त रूप देने में कई कठिनाइयां उत्पन्न हो रही हैं. ऐसा हो जाने के बाद किसी वक्त कहीं भी जाना आसान हो जायेगा. कार्यशाला में सड़क का मास्टर प्लान बनाने की आवश्यकता अहम होना पर जोर दिया गया. बताया गया कि इस कार्य में लगी एजेंसियों को कई तरह की कठिनाई आ रही है.

वन विभाग सड़क के किनारे की जमीन को अपना बता कर उसके नाम पर पैसा लेती है. लगे पेड़ को काटने के लिए पैसा भुगतान करना पड़ता है. विभाग के अधिकारियों ने कहा कि जब जमीन हमारी होती है, मसलन बिहार सरकार की तब केवल स्वीकृति लेने की जरूरत है, परंतु पैसा वह भी बड़ी रकम इस मद में भुगतान करना पड़ता है. वन विभाग हर जगह बेवजह अड़चन डाल देता है और सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का हवाला दे देता है. इस पर वर्ल्ड बैंक प्रोजेक्ट के सलाहकार फारमर चीफ इंजीनियर चेयरमैन जेके दत्ता ने कहा कि उनकी ज्यादती व अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण के खिलाफ भी सुप्रीम कोर्ट में जाने की जरूरत है.

तभी यह मामला साफ होगा. उन्होंने कहा कि सड़क के बीच बिजली विभाग का खंभा लगा होना भी खतरे की घंटी है. इसके विरुद्ध तो अब तक कोई पीआइएल भी दायर न होना आश्चर्य की बात है. इस कारण कई बार बड़ी दुर्घटनाएं हुई है. हाइवे इंजीनियर शंकर लोहानी ने कहा कि स्टिमेट से कम व अधिक अभिकर्ता द्वारा टेंडर डालना, टेंडर हो जाने से पहले भूमि का अधिग्रहण नहीं कराया जाना, निर्माण कार्य में प्रशासनिक व तकनीकी कमी के कारण उसमें उपयोग होने वाले सामान का दाम बढ़ जाने के कारण रि-स्टिमेट बनवाने में देर और उस वजह से काम में विलंब, मगध क्षेत्र में सड़क निर्माण कार्य में नक्सल समस्या व उसे लेकर सुरक्षा की कमी भी एक कारण है योजनाओं में देर होने का. इन्हीं सभी कारणों से कई योजनाएं लंबे समय से अधूरी हैं.

वक्ताओं ने कहा कि राजस्व प्राप्ति के लिए जो नक्शा बना है वह भी काफी पुराना है. फेज वन व फेज टू के बीच जरूरत पड़ने पर बाइपास निकालने का बीच में प्राक्कलन बनने से यदि अभिकर्ता फेज टू पहले बना दिया तो बाइपास के लिए प्रशासनिक व तकनीकी स्वीकृति लेते समय लग जाता है, तब तक सामान के दाम बढ़ गये और ऐसी परिस्थिति में एजेंसी से सवाल जवाब कि क्यों काम समय पर नहीं हुआ. फेज टू पहले कैसे बन गया. नक्शा बनाने वाली एजेंसी की कमी के कारण ऐसा होता है. इसका भुक्तभोगी उसे होना चाहिए, जबकि भुक्तभोगी काम करा रही एजेंसी होती है, जो गलत है. इन बिंदुओं पर गहन विचार कर आगे काम कराने की जरूरत है. एजेंसी द्वारा कार्यबल कम लगाना व पुरानी र्ढे व मशीन से काम लिया जाना भी योजना में कमी का कारण है. इस मौके पर टीम लीडर मिस्टर खत्री, एइकाम के कंस्लटेंट राकेश जी सहित अन्य ने कार्यशाला में अपने विचार रखे.

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