शोर से दूर कृष्ण भक्ति का अनोखा अंदाज, पिंडारुछ के बिहारी भाई मंदिर में बिना माइक होती है पूजा

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पिंडारुछ के ऐतिहासिक बिहारी भाई मंदिर

पिंडारुछ गांव का बिहारी भाई मंदिर 50 वर्षों से अधिक समय से जन्माष्टमी को एक अनूठे अंदाज में मना रहा है. यहां लाउडस्पीकर के शोर के बजाय केवल घंटे, घड़ियाल और शंख की मंगल ध्वनि गूंजती है. यह मंदिर सच्ची भक्ति के भाव पर जोर देता है.

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Bihari Bhai Mandir: जब हर तरफ जन्माष्टमी पर डीजे और लाउडस्पीकर के शोर के बीच कान्हा का जन्मोत्सव मनाया जा रहा है, वहीं पिंडारुछ गांव का ऐतिहासिक बिहारी भाई राधा-कृष्ण मंदिर शांति और सात्विक भक्ति की अनूठी मिसाल पेश कर रहा है. करीब 50 वर्षों से भी अधिक समय से इस मंदिर में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव बड़ी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है. इसकी सबसे खास पहचान यह है कि शुरुआत से ही यहां बिना लाउडस्पीकर के पूजा और आरती होती है.

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जन्माष्टमी हो या कोई अन्य उत्सव, कीर्तन हो या भजन, मंदिर में माइक का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. सुबह-शाम की आरती में केवल मंदिर के घंटे, घड़ियाल और शंख की मंगल ध्वनि गूंजती है. इसी ध्वनि से पूरे गांव को पता चल जाता है कि मंदिर में आरती शुरू हो गई है.

तेज आवाज से पूजा-पाठ में होता है व्यवधान

मंदिर के पुजारी और ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने जानबूझकर लाउडस्पीकर नहीं लगाया. उनका मानना है कि तेज आवाज से पूजा-पाठ में व्यवधान होता है. भगवान को शोर नहीं, शांति प्रिय है. स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि मंदिर की स्थापना के समय से ही यह नियम बनाया गया था कि मंदिर परिसर में किसी भी प्रकार के ध्वनि विस्तारक यंत्र का उपयोग नहीं होगा.

ग्रामीणों के अनुसार, मान्यता रही है कि भक्ति दिखावे में नहीं, भाव में है. कान्हा को रिझाने के लिए आवाज ऊंची करने की जरूरत नहीं, मन सच्चा होना चाहिए. एक वयोवृद्ध ग्रामीण ने बताया कि जब शांत मन से घंटी बजती है और शंखनाद होता है, तो ऐसा लगता है जैसे स्वयं बिहारी जी आकर खड़े हो गए हों. उनके अनुसार, उस समय मन को मिलने वाले सुकून को शब्दों में बयां करना मुश्किल है.

घंटे और शंख की गूंज के बीच राधे-राधे

इस परंपरा का असर आरती के दौरान मंदिर परिसर में साफ दिखाई देता है. आरती के समय यहां अद्भुत शांति रहती है. श्रद्धालु आंखें बंद कर शंख की ध्वनि के साथ खुद को कृष्ण से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं. चिल्लाहट और शोर के बजाय घंटे की टुन-टुन, शंख की गूंज और राधे-राधे का स्वर सुनाई देता है.

शोर भरी दुनिया के बीच पिंडारुछ का यह छोटा सा मंदिर संदेश दे रहा है कि ईश्वर तक पहुंचने के लिए ऊंची आवाज की नहीं, सच्चे भाव और आत्मा की पुकार की जरूरत होती है. पांच दशक से अधिक समय से चली आ रही यह परंपरा आज भी मंदिर की पहचान बनी हुई है.

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