लाह उद्योग को बढ़ावा की दरकार

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लाह उद्योग को बढ़ावा की दरकार फोटो- फॉरवार्डेड परिचय- लाह की चूड़ी बनाते दयानंद लहेड़ी का परिवार.बेनीपुर. सरकारी उपेक्षा के कारण मिथिलांचल का लाह उद्योग लुप्त होता जा रहा है. पूर्व में मिथिलांचल में बनने वाली रंग बिरंगी लाह की चूड़ियां देश-विदेश में खासी चर्चित थी. पर आज इस धंधे से जुड़े लहेड़ी परिवार के […]

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लाह उद्योग को बढ़ावा की दरकार फोटो- फॉरवार्डेड परिचय- लाह की चूड़ी बनाते दयानंद लहेड़ी का परिवार.बेनीपुर. सरकारी उपेक्षा के कारण मिथिलांचल का लाह उद्योग लुप्त होता जा रहा है. पूर्व में मिथिलांचल में बनने वाली रंग बिरंगी लाह की चूड़ियां देश-विदेश में खासी चर्चित थी. पर आज इस धंधे से जुड़े लहेड़ी परिवार के लोगों के सामने भुखमरी की स्थिति उत्पन्न हो गयी है. आर्थिक तंगी के कारण अधिकांश निर्माता अपने पुश्तैनी पेशा से मुंह मोड़ परदेश का रुख करने लगे हैं. मनीगाछी बाजितपुर निवासी दयानंद साह ने कहा कि इस फैशन के युग मेें इस धंधे में लागत एवं मेहनत के हिसाब से मुनाफा नहीं मिल रहा. पूर्व में आसानी से कच्चा लाह उपलब्ध हो जाता था. उस समय तीसी फूल लाह का खूब प्रचलन था. गांव घर की सभी महिलाएं लाह की चूड़ी ही उपयोग करती थी. लेकिन अब वो समय नहीं रहा. वहीं उनकी पत्नी गीता देवी लाह की चूड़ी बनाते हुए कहती है कि यह मेरा पुश्तैनी पेशा है. इसे नहीं करुंगी तो क्या करुंगी. पूरे परिवार के सदस्य दिन रात लगे रहते हैं तो किसी तरह दाल रोटी का प्रावधान हो जाता है. दिन रात एक कर रंग बिरंगी चूड़ी बनाने के बाद जब बाजार में बेचने जाते हैं तो वहां के व्यापारी अपने मन मुताबिक कीमत लगाते हैं. इस कारण मुनाफा कम हो रहा है. बीच में इनकी बात को काटते हुए दयानंद लहेड़ी कहते हैं कि 1990 में मैट्रिक पास कर पुश्तैनी पेशा काे बढ़ावा देने का निर्णय लिया और पूंजी के लिए प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत ऋण के लिए आवेदन दिया जो स्वीकृत भी हुआ, लेकिन बैंक से ऋण नहीं दिया गया. महाजन से कर्ज लेकर आज भी उक्त उद्योग को जिंदा रखा हूं. यदि सरकार द्वारा इसे गृह उद्योग का दर्जा देकर बैंक सहायता दिया जाये तो आज भी मिथिलांचल का लाह उद्योग देश विदेश में अपना नाम रौशन करेगा.

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