हमनी के त छोड़ीं, चिंता बा माल-जाल के

Updated at : 30 Aug 2017 4:47 AM (IST)
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हमनी के त छोड़ीं, चिंता बा माल-जाल के

मोतिहारी : स्थान: तुरकौलिया प्रखंड का मजुराहां गांव. समय: 11:20 बजे थे. धूप की तपिश पूरे परवान पर थी. खेतों में कुछ महिलाएं घास काटती मिली. आगे बढ़ने पर एक-एक कर यही नजारा अन्य खेतों में भी दिखा. संख्या लगभग 100 के ऊपर ही होगी. इस समय घास काटने का क्या मतलब और इतनी संख्या […]

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मोतिहारी : स्थान: तुरकौलिया प्रखंड का मजुराहां गांव. समय: 11:20 बजे थे. धूप की तपिश पूरे परवान पर थी. खेतों में कुछ महिलाएं घास काटती मिली. आगे बढ़ने पर एक-एक कर यही नजारा अन्य खेतों में भी दिखा. संख्या लगभग 100 के ऊपर ही होगी. इस समय घास काटने का क्या मतलब और इतनी संख्या में? यह अपने आप में सवाल भी था और हैरानी भी.

उत्सुकता बस पूछ बैठा कि आपलोग इस प्रचंड धूप में क्या कर रही हैं. ‘देखत न ईं का’. नंदपुर गांव निवासी तेतरी देवी यह वाक्य पुन: दोहराकर घास काटने में मशगूल हो जाती है. शायद वह पीड़ा जो उनके मन में थी, वह बताना नहीं चाहती हों. जवाब तो चाहिए था, यही सोच कुछ देर वहीं खड़ा रहा. इस बीच तेतरी देवी के समीप माल-जाल के लिए चारा काटने के लिए तेजी से हाथ मारती विपती देवी बोल पड़ती हैं कि ‘बबुआ हो बाढ़ त हमर अरमान पर पानी फेर देलक, बचवा सब कैसे पढ़ी यहे चिंतावा खाए जाता, बहुत दूर से अैनी हं घास काटे, गांव में अभियो बाढ़ वाला पानी बाटे’. हमनी के त एको दिन भूखे रहम त चली,
चिंता त बा त माल-जाल के पेट के. तब किसी शायर का यह शेर इस संदर्भ में जरूर सटीक बैठता है कि ‘कितने टूटे कितनों का मन हार गया, रोटी के आगे हर दर्शन हार गया’. कुछ सोच ही रहा था कि ग्रामीण आ पहुंचते हैं. बताया कि गांव बथनाहा, मलकौनिया, हरकैना, सेमरा, बंजरिया प्रखंड आदि क्षेत्रों के सैकड़ों की संख्या में गरीब किसान लंबा यानी 10 से 15 किलोमीटर का सफर तय कर पिछले एक सप्ताह से लगातार घास काटने पहुंचते हैं.
बातचीत के क्रम में तपती धूप में एक बुजुर्ग मोतिहारी प्रखंड के गुलरिया निवासी मंशी राय उम्र लगभग 60 वर्ष की होगी, नंगे पांव साइकिल पर लादे घास का बोझा लिए नजर पड़ते हैं. तुतलाहट भरे अंदाज में यह पूछने कि आप क्यों आए हैं, बच्चे नहीं हैं क्या. खुद देर चुप रहने के बाद भोजपुरी अंदाज में बोलते हैं कि बाढ़ जात-पात और न ही अपना पराया देखता है. उसी बाढ़‍ का दंश है, जो 60 वर्ष के उम्र में भी रोजी-रोटी की तलाश के लिए भटका रहा है.
बउआ हो गईल, जल्दी छोड़ो हमरा के, घर पहुंचम जल्दी त माल-जाल के कुट्टी देल जाई,. दूध देई त, लोगों के घर पहुंचेल जाई. तब रोजी-रोटी के जुगाड़ हो यही. यही दास्तान भैरव यादव, विजय मुखिया, फूल कुमारी, उमड़ावती देवी का है, जो धूप के तपिश के बीच रोजाना माल-जाल व घर की चिंता उन्हें मजुराहां गांव ले आती है.
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