माता जानकी का जन्म होते ही जनकपुरी में हुई जम कर बारिश
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :30 Sep 2016 2:47 AM (IST)
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आस्था. सीताजन्म, विश्वामित्र आगमन व ताड़कावध का हुआ मंचन बक्सर : शहर के किला मैदान में आयोजित 22 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के तहत रामलीला व कृष्णलीला का मंचन किया जा रहा है. श्री रामलीला समिति के तत्वावधान में वृंदावन से पधारे सुप्रसिद्ध रामलीला मंडल के ब्रजधाम नंद नंदल संस्थान के स्वामी श्री करतार प्रपन्नाचार्य जी […]
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आस्था. सीताजन्म, विश्वामित्र आगमन व ताड़कावध का हुआ मंचन
बक्सर : शहर के किला मैदान में आयोजित 22 दिवसीय विजयादशमी महोत्सव के तहत रामलीला व कृष्णलीला का मंचन किया जा रहा है. श्री रामलीला समिति के तत्वावधान में वृंदावन से पधारे सुप्रसिद्ध रामलीला मंडल के ब्रजधाम नंद नंदल संस्थान के स्वामी श्री करतार प्रपन्नाचार्य जी महाराज के निर्देशन व प्रख्यात व्यास आचार्य गणेश चंद्र दीक्षित जी महाराज के प्रसंग गायन के दौरान बुधवार की देर रात रामलिला के दौरान सीता जन्म, विश्वामित्र आगमन व ताड़का वध का मंचन हुआ. इसमें दिखाया गया कि रावण के द्वारा ऋषियों के खून से भरे घड़े को जनकपुरी में गाड़ने की वजह से राज्य में अकाल पड़ जाता है.
इस पर गुरु शतानन ने राजा जनक व महारानी सुनैना को सोने का हल खेतों में चलाने का सुझाव दिया. गुरु के कथनानुसार राजा व महारानी ने सोने का हल चलाते हैं. हल चलाने के क्रम में हल एक ठोस वस्तु से टकराता है, जहां से एक घड़ा निकलता है. इस घड़े से जानकी प्रकट होती हैं. तभी राज्य में जम कर बारिश होती है. पूरा वातावरण मंगलमय हो जाता है. व
हीं, दूसरी ओर महर्षि विश्वामित्र यज्ञ करने को तत्पर होते हैं, लेकिन राक्षसों के द्वारा यज्ञ में व्यवधान उत्पन्न किया जाता है. इस पर सभी ऋषि यज्ञ में सुरक्षा को लेकर अवधपुरी जाते हैं. गुरु वशिष्ट के कहने पर राजा दशरथ अपने दोनों बड़े पुत्रों को महर्षि विश्वामित्र के साथ भेजते हैं. राम और लक्ष्मण महर्षि विश्वामित्र के साथ बक्सर को प्रस्थान करते हैं. रास्ते में उनका सामना ताड़का राक्षसी से होता है. महर्षि का संकेत मिलते ही श्रीराम ने ताड़का का वध कर दिया.
मीरा को मारने का प्रयास करते हैं विक्रम सिंह :
वहीं, गुरुवार को श्री कृष्णलीला के दौरान मीराबाई चरित्र का मंचन हुआ. इस दौरान दिखाया गया कि मीराबाई के नगर राजस्थान के मेवाड़ गांव में एक बार संत रैदास जी आते हैं. मीरा अपनी मां के साथ संत का सत्संग में जाती है. वहां, संत के पास गिरिधर गोपाल की मूर्ति देख मीरा बाबा से मूर्ति मांगती है. इस पर बाबा उसे मूर्ति देने से मना कर देते हैं. इधर, घर में आने के बाद मीरा प्रण करती हैं कि जब तक गोपाल उसके पास नहीं आ जाते, तब तक वह अन्न-जल ग्रहण नहीं करेगी. उ
धर, संत के सपने में गोपाल आकर कहते हैं कि मुझे मीरा को दे दो. बाबा सुबह होते ही मीरा के घर जाकर गोपाल की मूर्ति मीरा को दे देते हैं. कालांतर में मीरा का विवाह मेवाड़ के महाराज भोजराज के साथ होता है. मीरा दिन रात गिरिधर की आराधना में लगी रहती हैं. यह देख राजा के छोटे भाई विक्रम सिंह मीरा को मारने का प्रयास करते हैं, लेकिन गोपाल हर जगह मीरा की रक्षा करते हैं. अंत में थक हार कर विकग्रम सिंह मीरा से क्षमा याचना करते हैं. बाद में मीरा वृदांवन चली जाती हैं, जहां उन्हें गिरिधर के दर्शन होते हैं.
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