Bihar MLC Election में BJP ने खेला सवर्ण कार्ड, अति पिछड़ों को भी जगह, BJP ने कैसे साधा चुनावी गणित?
BJP ने खेला सवर्ण कार्ड
Bihar News: Bihar MLC Election 2026- विधान परिषद चुनाव में BJP ने सवर्ण चेहरों पर भरोसा जताया है. इसके साथ ही अति पिछड़ा वर्ग को लाकर दूरगामी रणनीति भाजपा ने साधा है.
Bihar News: बिहार विधान परिषद की खाली हो रही सीटों के चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उम्मीदवारों की घोषणा के साथ ही स्पष्ट राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है. पार्टी ने चार उम्मीदवारों के चयन में सवर्ण और अति पिछड़ा वर्ग के बीच संतुलन साधते हुए सामाजिक समीकरणों को साधने का प्रयास किया है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा का यह कदम व्यापक सामाजिक और चुनावी रणनीति का हिस्सा है.
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सवर्ण और अति पिछड़ों पर BJP का दांव

भाजपा द्वारा घोषित चार उम्मीदवारों में दो सवर्ण और दो अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं. पार्टी ने भोजपुरी अभिनेता एवं गायक पवन सिंह को राजपूत समाज का प्रतिनिधित्व देते हुए उम्मीदवार बनाया है. वहीं वरिष्ठ नेता संजय मयूख कायस्थ समाज से आते हैं. इसके अलावा अनिल कुमार ठाकुर और शीला प्रजापति को अति पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने सामाजिक संतुलन साधने का प्रयास किया है.
मंगल पांडेय की सीट पर पहले ही साधा भूमिहार समीकरण

भाजपा इससे पहले पूर्व स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय के कार्यकाल समाप्त होने वाली सीट पर अरविंद शर्मा के नाम की घोषणा कर चुकी है. अरविंद शर्मा भूमिहार समाज से आते हैं. ऐसे में भाजपा ने विभिन्न प्रभावशाली सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व देकर व्यापक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है.
कौन हैं संजय मयूख?

संजय मयूख भाजपा के उन नेताओं में शामिल हैं. जिन्होंने संगठन और मीडिया दोनों स्तरों पर लंबा अनुभव हासिल किया है. उन्होंने वर्ष 1990 में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की थी. इसके बाद संगठन में लगातार सक्रिय भूमिका निभाते हुए वर्ष 1995 में बिहार भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष बने. बाद में उन्हें प्रदेश मीडिया प्रभारी की जिम्मेदारी भी सौंपी गई.
वहीं वर्ष 2016 में वे पहली बार बिहार विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए. वर्ष 2022 में दूसरी बार MLC बने और अब पार्टी नेतृत्व ने उन पर तीसरी बार भरोसा जताते हुए पुनः उम्मीदवार बनाया है. भाजपा संगठन और केंद्रीय नेतृत्व में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है.
पवन सिंह की राजनीतिक पारी को मिला नया मंच

भोजपुरी सिनेमा और संगीत जगत के चर्चित चेहरों में शामिल पवन सिंह को भाजपा ने पहली बार विधान परिषद चुनाव का उम्मीदवार बनाया है. वर्ष 1997 में अपने गायन करियर की शुरुआत करने वाले पवन सिंह को वर्ष 2008 में रिलीज हुए गीत “लॉलीपॉप लागेलु” से अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली थी.
भोजपुर जिले के आरा में 5 जनवरी 1986 को जन्मे पवन सिंह ने संगीत की शुरुआती शिक्षा अपने चाचा अजीत सिंह से प्राप्त की थी. राजनीतिक रूप से वे तब चर्चा में आए जब भाजपा ने उन्हें पश्चिम बंगाल की आसनसोल लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया था. हालांकि बाद में विवाद के कारण उनकी उम्मीदवारी वापस ले ली गई थी.
काराकाट चुनाव से चर्चा में आए थे पवन सिंह
आसनसोल प्रकरण के बाद नाराजगी के बीच पवन सिंह ने 2024 के लोकसभा चुनाव में काराकाट सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था. उनके चुनाव मैदान में उतरने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया था और राजनीतिक समीकरणों पर इसका असर पड़ा था. बाद में भाजपा नेतृत्व और पवन सिंह के बीच संवाद स्थापित हुआ तथा मतभेद दूर हुए. इसके बाद उन्होंने भाजपा के पक्ष में सक्रिय प्रचार भी किया. राजनीतिक जानकार इसे ही उनके प्रति पार्टी नेतृत्व के भरोसे के रूप में देख रहे हैं.
संगठन के अनुभवी नेता हैं अनिल कुमार ठाकुर

भाजपा ने पूर्णिया क्षेत्र से जुड़े वरिष्ठ नेता अनिल कुमार ठाकुर को भी उम्मीदवार बनाया है. संगठन में उनकी सक्रिय भूमिका रही है. वे बिहार भाजपा के प्रदेश मंत्री और प्रदेश उपाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पदों की जिम्मेदारी निभा चुके हैं. संगठनात्मक अनुभव और अति पिछड़ा वर्ग में उनकी पकड़ को देखते हुए पार्टी ने उन्हें विधान परिषद चुनाव में मौका दिया है.
संगठन और समाजसेवा से बनाई पहचान – शीला प्रजापति

शीला प्रजापति भाजपा की सक्रिय महिला नेताओं में गिनी जाती हैं. वर्तमान में वह बिहार भाजपा की प्रदेश मंत्री हैं. इससे पूर्व उन्होंने भाजपा जिला ग्रामीण इकाई में उपाध्यक्ष के रूप में भी कार्य किया है. सामाजिक और संगठनात्मक गतिविधियों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है. पार्टी ने उन्हें अति पिछड़ा वर्ग की महिला प्रतिनिधि के रूप में विधान परिषद चुनाव में उतारा है..
विधान परिषद से विधानसभा तक, BJP ने साधी दूरगामी रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने विधान परिषद चुनाव के माध्यम से आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति की झलक पेश की है. सवर्ण, अति पिछड़ा और महिला प्रतिनिधित्व के संतुलन के जरिए पार्टी ने अपने पारंपरिक और विस्तारशील दोनों सामाजिक आधारों को साधने का प्रयास किया है. ऐसे में यह उम्मीदवार चयन केवल विधान परिषद चुनाव तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे 2026 की व्यापक राजनीतिक तैयारी के रूप में भी देखा जा रहा है.
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