Explainer : बिहार में हर साल हजारों करोड़ पानी में बह रहा, फिर क्यों बाढ़ नहीं रोक पा रही सरकार?

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बिहार में गंगा, कोसी, सोन समेत कई नदियों के उफान से हर साल बाढ़ की स्थिति बनती है। सवाल है कि बाढ़ नियंत्रण पर हजारों करोड़ खर्च होने के बावजूद बिहार को इस संकट से स्थायी राहत क्यों नहीं मिल पा रही?

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सबसे पहले बिहार के बाढ़ से जुड़ी अलग-अलग अखबारों की पांच हेडलाइन पढ़िए-

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ये सुर्खियां बीते दिनों बिहार में आई बाढ़ के मौजूदा हालात की तस्वीर बयां करती हैं. इन सुर्खियों से काफी हद तक मालूम हो जाता है कि बिहार में बाढ़ क्यों आती है, इसके पीछे क्या कारण हैं और इसका निदान क्या हो सकता है.

दरअसल, बिहार में बाढ़ एक ऐसी समस्या है जिसका पैटर्न दशकों से लगभग एक समान ही है, और तो और इसे रोकने के लिए हर साल हजारों करोड़ रुपये खर्च किया जाता है. लेकिन नतीजा नहीं बदलता तो सवाल ये है कि हजारों करोड़ रुपये का खर्च आखिर किस काम आ रहा है? इस एक्सप्लेनर में हम समझेंगे जनता का पैसा, जनता को बाढ़ जैसी आपदा से राहत क्यों नहीं दिला रही हैं.

शुरूआत करते हैं असली समस्या से कि बिहार में हर साल बाढ़ क्यों आती है?

  • भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक यानी CAG की रिपोर्ट के मुताबिक बिहार का करीब 73 फीसदी भौगोलिक क्षेत्र बाढ़ के खतरे में है. राज्य की भौगोलिक स्थिति इसकी बड़ी वजह है.

नीचे के ग्राफिक्स में देखिए बिहार में बाढ़ की असल वजह क्या है

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  • हिमालय से निकलने वाली अधिकांश नदियां बिहार के मैदानी इलाके से गुजरती है. यहां समस्या ये नहीं है कि नदियां इस इलाके से गुजरती है, दिक्कत ये है कि नदियां सिर्फ पानी नहीं लाती, अपने साथ मिट्टी और गाद भी लाती है.
  • इसके अलावा अपने साथ लाई मिट्टी और गाद के कारण उसकी धारा और तल की स्थिति बदलती रहती है. ऐसे में जब नदी को तटबंधों के भीतर सीमित कर दिया जाता है, तो बाढ़ के पानी के फैलने और प्राकृतिक तरीके से निकलने की क्षमता प्रभावित होती है.

यहां एक सवाल ये भी है कि बिहार की नदियों में इतना पानी आता कहां से है?

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तटबंध बने, फिर भी बाढ़ क्यों नहीं रुकी?

  • बिहार में बाढ़ को रोकने के लिए तटबंध और दूसरी संरचनाएं बाढ़ नियंत्रण की प्रमुख रणनीति रही हैं. हालांकि तटबंध बाढ़ की समस्या खत्म नहीं करता, वह पानी को संरक्षित रखने की कोशिश करता है.
  • ऐसे में जब नदी का जलस्तर बढ़ जाती है तो तटबंध के ऊपर से पानी निकलने लगता है, जिससे आसपास के इलाके को नुकसान पहुंचता है, कई बार तो तटबंध टूटने की स्थिति में आ जाती है.
  • CAG की रिपोर्ट में बिहार सहित कई बाढ़ नियंत्रण परियोजनाओं में तटबंधों की स्थिति, निर्माण और निगरानी से जुड़ी कमियां दर्ज की गई हैं.

यानी सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बाढ़ रोकने के लिए कितने तटबंध बने, कितने किलोमीटर तटबंध बनाया गया, असली सवाल यह है कि वे कितने सुरक्षित हैं, उनकी निगरानी कितनी नियमित है और बाढ़ के समय उनकी वास्तविक क्षमता कितनी रहती है?

अब सवाल ये है कि सरकार बाढ़ के समाधान के लिए कितना पैसा खर्च कर रही है?

2026-27 में बिहार सरकार के सिंचाई एवं बाढ़ नियंत्रण क्षेत्र के लिए ₹11,284 करोड़ खर्च करने जा वाली है. 2024-25 में यह खर्च ₹6,594 करोड़ रहा था.

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केंद्र ने भी बिहार को बाढ़ से राहत के लिए वित्तीय सहायता करती है. 2025 के केंद्रीय बजट में कोसी-मेची लिंक सहित करीब ₹11,500 करोड़ की अनुमानित लागत वाली परियोजनाओं के लिए वित्तीय समर्थन का ऐलान किया गया था.

तो क्या बिहार में बाढ़ को रोकने का कोई तरीका नहीं है?

बिहार की बाढ़ पर 'बोया पेड़ बबूल का' किताब लिखने वाले प्रोफेसर दिनेश कुमार मिश्रा कहते हैं कि बिहार में आने वाले बाढ़ को 3 तरह से रोका जा सकता है.

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फिर कहां हो रही चूक

जानकारों का कहना है कि सबसे बड़ी चुनौती फ्लड कंट्रोल और फ्लड मैनेजमेंट के अंतर की है. CAG की रिपोर्ट में बिहार के लिए सिर्फ तटबंध जैसे ढांचागत उपाय काफी नहीं है, इसके साथ-साथ बाढ़ मैदान का नियमन, बाढ़ पूर्वानुमान, चेतावनी व्यवस्था, आपदा तैयारी और प्राकृतिक जलधारण क्षेत्रों जैसे उपायों पर भी जरूरी बताया गया है.

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मतलब साफ है कि नदी को हर जगह रोकना संभव नहीं, लेकिन पानी आने से पहले चेतावनी देना, प्रभावित लोगों को समय पर निकालना, जलनिकासी के रास्ते बचाना, कमजोर तटबंधों की निगरानी करना और बाढ़ वाले इलाके में निर्माण को नियंत्रित करके इस समस्या से निजात पाया जा सकता है.

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