उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम बना मजाक

Published at :12 Sep 2016 9:00 AM (IST)
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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम बना मजाक

आरा : जिले में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम मजाक बन कर रह गया है. दुकानदारों द्वारा उपभोक्ताओं के लिए प्रदत्त अधिकारों का हनन करने से उपभोक्ताओं को काफी परेशानी हो रही है. दुकानदारों द्वारा उपभोक्ताओं को उनके द्वारा खरीदे गये सामान के बदले रसीद नहीं देने से उपभोक्ता ठगा-सा महसूस कर रहे हैं. जबकि इस अधिनियम […]

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आरा : जिले में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम मजाक बन कर रह गया है. दुकानदारों द्वारा उपभोक्ताओं के लिए प्रदत्त अधिकारों का हनन करने से उपभोक्ताओं को काफी परेशानी हो रही है. दुकानदारों द्वारा उपभोक्ताओं को उनके द्वारा खरीदे गये सामान के बदले रसीद नहीं देने से उपभोक्ता ठगा-सा महसूस कर रहे हैं.
जबकि इस अधिनियम का प्रति वर्ष प्रचार-प्रसार किया जाता है. टेलीविजन तथा अखबारों में भी विज्ञापन देकर उपभोक्ताओं को इसके प्रति जागरूक किया जाता है. फिर भी उपभोक्ताओं को उनका उचित अधिकार नहीं मिल पा रहा है. वहीं प्रशासन द्वारा इस पर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की जा रही है.
क्या है उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम : दुकानदारों, कंपनियों, उद्योगपतियों एवं अन्य व्यवसायियों द्वारा लगातार उपभोक्ताओं का शोषण किये जाने को लेकर इनके संरक्षण हेतु सरकार ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 संसद से पास करा कर लागू किया. इस अधिनियम के तहत उपभोक्ताओं को अधिकार दिया गया कि उनके द्वारा खरीदे गये सामान की रसीद देना किसी भी तरह के व्यवसायियों के लिए जरूरी होगा. वहीं यदि कोई व्यवसायी निर्धारित मूल्य से अधिक दाम लेता है, तो उसके विरुद्ध उपभोक्ता कानूनी कार्रवाई कर सकता है. वहीं सेवा में त्रुटि होने पर भी उपभोक्ता को इस अधिनियम के द्वारा अधिकार दिया गया है कि वह इसके विरुद्ध भी कानूनी कार्रवाई कर सकता है. यदि दुकानदार द्वारा नकली सामान दिया जाता है, तो वह भी उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के दायरे में आयेगा.
उपभोक्ता फोरम में दायर होता है मामला : जिले में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत जिला उपभोक्ता संरक्षण का गठन किया गया है, जो उपभोक्ताओं के प्रति हुए अन्याय की शिकायतों की सुनवाई करता है. जिला उपभोक्ता फोरम में 20 लाख तक का मामला दायर होता है. वहीं राज्य स्तर पर राज्य उपभोक्ता आयोग का गठन किया गया है. जहां 20 लाख से एक करोड़ तक की राशि का मामले की सुनवाई की जाती है. राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का गठन किया गया है. जहां एक करोड़ से अधिक का मामला दायर किया जाता है.
सरकारी व स्वैच्छिक संगठनों द्वारा चलाया जाता है जागरूकता अभियान : उपभोक्ताओं को जागरूक करने के लिए सरकारी स्तर पर विज्ञापन एवं गोष्ठियों द्वारा इस अधिनियम के बारे में प्रचार – प्रसार किया जाता है.
वहीं जिला उपभोक्ता फोरम में प्रति वर्ष इस विषय पर गोष्ठी का आयोजन कर इसका प्रचार किया जाता है. स्वैच्छिक संगठनों द्वारा भी गोष्ठी आदि के माध्यम से उपभोक्ताओं को जागरूक करने का अभियान चलाया जाता है.
अभी तक नहीं मिला वांछित परिणाम : सरकारी एवं स्वैच्छिक संगठनों द्वारा लगातार उपभोक्ताओं को जागरूक करने के लिए चलाये जा रहे अभियान के बावजूद अभी तक इस अधिनियम का वांछित परिणाम नहीं मिल रहा है. उपभोक्ताओं में अभी भी जागरूकता की कमी देखी जा रही है. व्यवसायियों द्वारा उपभोक्ताओं का अभी भी शोषण बदस्तूर जारी है. उन्हें गुमराह करने का खेल लगातार चल रहा है.
प्रशासन द्वारा निरीक्षण की कमी : इस अधिनियम के बाद भी उपभोक्ताओं को हो रही परेशानी के विरुद्ध प्रशासन द्वारा कार्रवाई करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखायी जा रही है. प्रशासन की निष्क्रियता से अभी भी लगातार उपभोक्ता ठगे जा रहे हैं.
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