Bihar News: JLNMCH भागलपुर में लापता था ड्रेसर, अपने बच्चों का खुद प्लास्टर काटने लगीं मां

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भागलपुर के मायागंज स्थित JLNMCH में ड्रेसर का कोई अता-पता नहीं रहा तो अपने बच्चों का प्लास्टर काटने की जिम्मेदारी बच्चों के मां ने ही उठा ली. मायागंज अस्पताल में हर बुधवार व शुक्रवार जन्मजात टेढ़े अंगों का इलाज होता है.

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भागलपुर के मायागंज अस्पताल के फिजिकल मेडिसिन एंड रिहेबिलिटेशन (पीएमआर) ओपीडी में बुधवार को अपने बच्चों के जन्मजात टेढ़े पैर (फुट क्लब) का इलाज कराने आये कई परिजनों को खुद से बच्चों के पैर में लगे प्लास्टर को काटना पड़ गया. ऐसा ड्रेसिंग रूम में प्लास्टर काटने के लिए जिम्मेदार ड्रेसर नहीं रहने के कारण हुआ. बुधवार को ऐसा ही अजीबोगरीब दृश्य ओपीडी परिसर में देखने को मिला.

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जमीन पर बैठकर महिलाएं बच्चों का काट रहीं प्लास्टर

मायागंज अस्पताल में जमीन पर बैठकर महिलाएं अपने बच्चों के पैर पर लगे प्लास्टर को नोंच रहे थे. पैर में सट चुके प्लास्टर को जबरन निकालने के दौरान बच्चे दर्द से तड़प रहे थे. प्लास्टर काट रहे मुंगेर जिला के असरगंज के रहने वाले अजय दास ने बताया कि आज उनके बच्चे का प्लास्टर कटना था. प्लास्टर हटने के बाद ही डॉक्टर पैर की स्थिति की सही सही पड़ताल कर पायेंगे. वहीं जांच के बाद दवाइयों व इलाज की अगली प्रक्रिया शुरू हो पायेगी. काफी देर ड्रेसर का इंतजार किया, नहीं मिलने पर खुद प्लास्टर काट रहे हैं. इसके बाद डॉक्टर को दिखाया जायेगा.

ड्रेसर के काफी इंतजार के बाद खुद किया काम

दूसरे बच्चे का प्लास्टर काटते शाहकुंड गोरियाती निवासी आरती देवी ने बताया कि बेटे साहिल को पैर में प्लास्टर एक सप्ताह पहले लगा था. डॉक्टर ने एक सप्ताह बाद जांच के लिए बुलाया था. प्लास्टर हटाने के बाद ही डॉक्टर पैर की स्थिति जान पाते. ऐसे में ड्रेसर के काफी इंतजार के बाद हमने खुद प्रयास कर प्लास्टर हटा दिया.

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ड्रेसर पर कार्रवाई की जायेगी : अस्पताल अधीक्षक

मायागंज अस्पताल के अधीक्षक डॉ असीम कुमार दास ने कहा कि पीएमआर ओपीडी के एचओडी से मामले की जानकारी ली जायेगी. अगर ड्रेसर के गायब होने की पुष्टि हुई तो कार्रवाई की जायेगी. उन्होंने बताया कि मायागंज अस्पताल में हर बुधवार व शुक्रवार को फिजिकल मेडिसिन एंड रिहेबिलिटेशन (पीएमआर) ओपीडी चलता है. दोनों दिन बच्चों के जन्मजात टेढ़े पैर (फुट क्लब) बीमारी का का इलाज किया जाता है. बुधवार को पीएमआर ओपीडी में करीब 63 बच्चों का इलाज हुआ.

Published By: Thakur Shaktilochan

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