23 साल बाद मिला न्याय: निर्दोष साबित होने में कट गई पूरी जवानी, बुढ़ापे में रिहा होने पर छलका दर्द

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रिहाई हुए अभियुक्त की फोटो | Prabhat Khabar Network

रामनगर के खजूरिया गांव से जुड़े 2003 के मामले में करीब 23 साल बाद चार अभियुक्त रिहा हुए. अदालत के फैसले के बाद अभियुक्तों और उनके परिजनों में भावुकता के साथ राहत का माहौल दिखा.

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बगहा के रामनगर थाना क्षेत्र के एक मामले में नामजद होने के बाद करीब 23 वर्षों तक अदालत में खुद को निर्दोष साबित करने की लड़ाई लड़ रहे चार अभियुक्तों को आखिरकार राहत मिल गयी. जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश चतुर्थ मानवेन्द्र मिश्र की अदालत ने धूरई चौधरी, रामाशीष चौधरी, रामप्रीत चौधरी और बुधराम चौधरी को संदेह का लाभ देते हुए रिहा करने का आदेश दिया. फैसला सुनते ही चारों की आंखें छलक उठीं.

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2003 में दर्ज हुआ था मामला

मामला रामनगर थाना क्षेत्र के खजूरिया गांव से जुड़ा है. कांड संख्या 143/03 में अदालत में सुनवाई चल रही थी. अपर लोक अभियोजक जितेंद्र भारती ने बताया कि घटना 8 अगस्त 2003 की है.

भगवान चौधरी ने रामनगर थाना में प्राथमिकी दर्ज करायी थी. इसमें गाली-गलौज और मारपीट कर घायल करने का आरोप लगाया गया था. पुलिस ने मामले में कुल छह लोगों को नामजद अभियुक्त बनाया था.

सुनवाई के दौरान दो अभियुक्तों की मौत

मामले की सुनवाई शुरू होने के बाद सभी नामजद अभियुक्तों को लंबे समय तक न्यायालय की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा. करीब 23 वर्षों तक चले मुकदमे के दौरान छह नामजद अभियुक्तों में से दो अजय और गोबिंद की मौत हो गयी.

दोनों अभियुक्तों की मृत्यु मुकदमे की सुनवाई पूरी होने से पहले ही हो गयी. वहीं, शेष चार अभियुक्तों के मामले में अदालत में उपलब्ध साक्ष्यों और सुनवाई के आधार पर फैसला सुनाया गया.

संदेह का लाभ मिलने पर रिहाई

अदालत ने धूरई चौधरी, रामाशीष चौधरी, रामप्रीत चौधरी और बुधराम चौधरी को संदेह का लाभ देते हुए रिहा करने का आदेश दिया. फैसला सुनाये जाने के बाद न्यायालय परिसर में अभियुक्तों और उनके परिजनों के बीच भावुक माहौल रहा.

लंबे समय तक मुकदमे का बोझ उठाने वाले चारों अभियुक्तों के चेहरों पर फैसले के बाद राहत साफ दिखाई दे रही थी.

परिजनों ने कहा, मुकदमे की चिंता में गुजरा समय

अभियुक्तों के परिजनों ने कहा कि जिस उम्र में परिवार और समाज के बीच सुकून से जीवन बिताना चाहिए था, उस उम्र का बड़ा हिस्सा अदालत और मुकदमे की चिंता में गुजर गया. दो नामजद अभियुक्त फैसला सुनने के लिए जीवित नहीं रहे.

23 साल बाद आये फैसले ने चारों अभियुक्तों को राहत दी, लेकिन मुकदमे के दौरान गुजरे वर्षों की पीड़ा भी उनके लिए भावुक कर देने वाली रही. अदालत के आदेश के साथ करीब ढाई दशक से चल रहे इस मामले का पटाक्षेप हो गया.

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