बेगूसराय : ओवरलोड ट्रक गुजरते ही थरथराता है 61 साल पुराना सिउरी पुल, सड़क पर गड्ढे; स्ट्रक्चरल ऑडिट तक नहीं
पुराना श्रीकृष्ण सेतु | Prabhat Khabar Network
बेगूसराय के श्रीकृष्णा सिंह सेतु की हालत बेहद चिंताजनक है. 61 साल पुराना यह पुल कभी भी बड़े हादसे का कारण बन सकता है, जिससे लाखों लोगों की जान जोखिम में है. जानिए इस ऐतिहासिक धरोहर की बदहाल स्थिति के बारे में.
Begusarai News : मंझौल को बेगूसराय से जोड़ने वाली बूढ़ी गंडक नदी पर बना पहला और ऐतिहासिक श्रीकृष्ण सिंह सेतु सिउरी आज जर्जरता की अंतिम सीमा पर पहुंच चुका है. बेगूसराय से मंझौल के बीच एसएच-55 स्टेट हाईवे पर स्थित इस पुल पर जब कोई भारी और वजनी वाहन गुजरता है तो पूरा ढांचा थर-थर कांपने लगता है.
पुल पर बनी सड़क जगह-जगह गड्ढों में तब्दील हो चुकी है, कहीं सरिया निकल आया है तो कहीं रेलिंग टूट चुकी है. 61 साल पुराना यह पुल कभी भी बड़े हादसे की वजह बन सकता है, लेकिन विभाग अब तक कुंभकर्णी नींद में हैं.
यह पुल सिर्फ एक पुल नहीं, बल्कि बेगूसराय के लाखों लोगों के लिए जीवनरेखा है. इसी पुल के जरिए मंझौल, चेरिया बरियारपुर, खोदावंदपुर, छौड़ाही, बखरी, गढ़पुरा, नावकोठी प्रखंड जिला मुख्यालय से जुड़ते हैं. यही नहीं, समस्तीपुर, हसनपुर और दरभंगा जिले के लिए भी यही सबसे सुगम रास्ता है. स्टेट हाईवे होने के कारण इस पर 24 घंटे भारी ट्रैफिक का दबाव रहता है.
रोजाना हजारों बाइक, सैकड़ों कार, बस और बालू-गिट्टी लदे ओवरलोडेड ट्रक इसी जर्जर पुल से गुजरते हैं. आज जो लोग फर्राटे से पुल पार करते हैं, उन्हें शायद पता न हो कि 1960 से पहले यहां लोगों को नाव से नदी पार करनी पड़ती थी.
बरसात में तो नदी विकराल हो जाती थी और संपर्क टूट जाता था .स्थानीय लोगों की वर्षों पुरानी मांग पर बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने यहां पुल बनाने का वादा किया. उनके वादे के बाद इस पुल का शिलान्यास तत्कालीन मुख्यमंत्री कृष्णवल्लभ सहाय ने किया और 1965 में तत्कालीन परिवहन मंत्री राम लखन सिंह यादव ने इसका उद्घाटन किया. उन्हीं के नाम पर इसे श्रीकृष्ण सिंह सेतु सिउरी नाम दिया गया.
उद्घाटन के समय यह पूरे इलाके के लिए किसी सपने के पूरा होने जैसा था. 61 साल बीत जाने के बाद अब इस सपने की चमक फीकी पड़ चुकी है. पुल के ऊपर की सड़क की हालत बेहद बदतर है. सड़क जगह-जगह से उखड़ चुकी है. 10 से 15 बड़े गड्ढे बन गए हैं, जिनमें बरसात का पानी भर जाता है। कई जगह गिट्टी निकल गई है.
दोपहिया चालकों के लिए यह सबसे खतरनाक है. जरा सी चूक हुई तो बाइक का पहिया गड्ढे में फंसता हैं . रात के समय तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है, स्थानीय लोगों का कहना हैं कि कई बार सड़क निर्माण विभाग को शिकायत दी गई, लेकिन विभाग सिर्फ खानापूर्ति करता है. गड्ढे में दो टोकरी गिट्टी डालकर चला जाता है, जो दो दिन में ट्रकों के दबाव से फिर निकल जाती है. स्थायी मरम्मत आज तक नहीं हुई.
स्थानीय लोगों के लिए सबसे डरावना अनुभव तब होता है जब कोई भारी मालवाहक ट्रक या बस पुल से गुजरती है. तो इस सेतू पुल हिलने लगती हैं . ग्रामीणों का आरोप है कि 61-62 साल में इस पुल का कभी भी स्ट्रक्चरल ऑडिट, लोड टेस्टिंग या विशेष मरम्मत नहीं हुई. बिना किसी मेंटेनेंस के यह पुल लगातार ओवरलोड वाहनों का बोझ झेल रहा है.
इस गंभीर समस्या को लेकर स्थानीय समाजसेवियों और राजनीतिक दलों ने भी आवाज उठाई है. जदयू नेता संजय सिंह सहित कई लोगों ने क्षेत्रीय विधायक, बेगूसराय के सांसद सह केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह से मांग की है कि इस ऐतिहासिक धरोहर की तत्काल मरम्मत कराई जाए और भविष्य को देखते हुए इसके समानांतर एक नए फोरलेन पुल का निर्माण कराया जाए. लोगों का कहना है कि अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है और उत्तर बेगूसराय का जिला मुख्यालय से संपर्क पूरी तरह कट जाएगा.
1965 में हुआ था इस ऐतिहासिक पुल का उद्घाटन
आज जो लोग फर्राटे से पुल पार करते हैं, उन्हें शायद पता न हो कि 1960 से पहले यहां लोगों को नाव से नदी पार करनी पड़ती थी. बरसात में तो नदी विकराल हो जाती थी और संपर्क टूट जाता था. स्थानीय लोगों की वर्षों पुरानी मांग पर बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने यहां पुल बनाने का वादा किया. उनके वादे के बाद इस पुल का शिलान्यास तत्कालीन मुख्यमंत्री कृष्णवल्लभ सहाय ने किया और 1965 में तत्कालीन परिवहन मंत्री राम लखन सिंह यादव ने इसका उद्घाटन किया.
पुल पर बने बड़े-बड़े गड्ढे और टूटी सड़कें
पुल के ऊपर की सड़क की हालत बेहद बदतर है. सड़क जगह-जगह से उखड़ चुकी है. 10 से 15 बड़े गड्ढे बन गए हैं, जिनमें बरसात का पानी भर जाता है। कई जगह गिट्टी निकल गई है. दोपहिया चालकों के लिए यह सबसे खतरनाक है. जरा सी चूक हुई तो बाइक का पहिया गड्ढे में फंसता हैं. रात के समय तो स्थिति और भी भयावह हो जाती है.
कभी नहीं हुआ स्ट्रक्चरल ऑडिट और लोड टेस्टिंग
ग्रामीणों का आरोप है कि 61-62 साल में इस पुल का कभी भी स्ट्रक्चरल ऑडिट, लोड टेस्टिंग या विशेष मरम्मत नहीं हुई. बिना किसी मेंटेनेंस के यह पुल लगातार ओवरलोड वाहनों का बोझ झेल रहा है. स्थानीय लोगों के लिए सबसे डरावना अनुभव तब होता है जब कोई भारी मालवाहक ट्रक या बस पुल से गुजरती है, तो यह सेतु हिलने लगती है.
नए फोरलेन पुल निर्माण की मांग
इस गंभीर समस्या को लेकर स्थानीय समाजसेवियों और राजनीतिक दलों ने भी आवाज उठाई है. जदयू नेता संजय सिंह सहित कई लोगों ने क्षेत्रीय विधायक और बेगूसराय के सांसद सह केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह से मांग की है कि इस ऐतिहासिक धरोहर की तत्काल मरम्मत कराई जाए और भविष्य को देखते हुए इसके समानांतर एक नए फोरलेन पुल का निर्माण कराया जाए.
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