मंदार का वो चमत्कारी शिव मंदिर जहाँ शीश नवाते थे देश के विप्लवी, जानें ब्रिटिश काल से लेकर आज तक की पूरी गाथा

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फोटो - पिपरा नाथ मंदिर | Prabhat Khabar Network

मंदार की ऐतिहासिक धरती पर स्थित पिपरानाथ मंदिर सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि 1857 के विद्रोह की गवाह भी है. 1895 के सरकारी सर्वे और साहित्यिक संदर्भों से उजागर हुए इसके रहस्य को जानें.

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Banka News: बांका, बौंसी. मंदार की ऐतिहासिक धरती पर स्थित पिपरा नाथ मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ इतिहास, पुरातत्व और 1857 के विद्रोह की स्मृतियों को भी अपने भीतर समेटे हुए है. स्थानीय मान्यता के अनुसार 1857 के विद्रोह के दौरान इस मंदिर में विद्रोही सैनिकों ने महादेव का अभिषेक किया था. मंदिर से जुड़ी इस परंपरा को 1895 के सरकारी पुरातात्विक सर्वे और साहित्यिक संदर्भों से भी एक अलग ऐतिहासिक आधार मिलता है. यही वजह है कि पिपरा नाथ को मंदार क्षेत्र के महत्वपूर्ण प्राचीन स्थलों में गिना जाता है.

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1895 के सरकारी सर्वे में दर्ज मिला पिपरा नाथ मंदिर

इतिहासकार उदयेश रवि के अनुसार बंगाल सरकार के पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट ने वर्ष 1895 में प्राचीन पुरातात्विक धरोहरों का विस्तृत सर्वे कराया था. इस सर्वे में पिपरा ग्राम और पिपरा नाथ मंदिर का स्पष्ट उल्लेख मिलता है. ‘लिस्ट ऑफ एंसियंट मोनुमेंट्स ऑफ बंगाल’ नामक पुस्तक के भागलपुर प्रभाग के नक्शे में भी पिपरा नाथ को चिह्नित किया गया था. इससे यह प्रमाण मिलता है कि उन्नीसवीं सदी के अंतिम दौर में भी यह मंदिर एक प्राचीन और महत्वपूर्ण स्थल के रूप में जाना जाता था.

हालांकि इससे पहले वर्ष 1810 में फ्रांसिस बुकानन द्वारा किए गए सर्वे में पिपरा नाथ का नाम नहीं मिलता है. इस अंतर के बावजूद 1895 का सरकारी सर्वे मंदिर के ऐतिहासिक अस्तित्व को महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है.

‘ढाकेर अरण्यो’ में रहस्यमयी पिपरा नाथ का वर्णन

पिपरा नाथ मंदिर का एक रोचक साहित्यिक संदर्भ भास्कर चट्टोपाध्याय की रचना ‘ढाकेर अरण्यो’ में मिलता है. मंदार के दक्षिणी जंगल से जुड़े प्रसंग में एक रहस्यमयी घटना का वर्णन किया गया है. कथा के अनुसार आखेट से थके एक व्यक्ति ने विशाल पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम किया. अचानक उसकी नींद खुली तो उसने जटाजूटधारी एक विशालकाय और हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति को देखा, जो त्रिशूल के संधान से एक काले चीते को डरा रहा था. चीता कुछ देर तक उस व्यक्ति की आंखों में देखता रहा और फिर डरकर वहां से भाग गया.

रायफल लेकर मौजूद व्यक्ति को उस रहस्यमयी पुरुष ने हाथ के इशारे से गोली चलाने से रोक दिया. इसके बाद वह पास के तालाब पर हाथ-मुंह धोने गया. लौटकर देखा तो वह दिव्य पुरुष वहां से गायब था.

मंदिर में जल रहा था दीपक, शिवलिंग पर रखे थे ताजे फूल

कथा के अनुसार जिस स्थान पर वह रहस्यमयी पुरुष बैठा था, उसके पास ही एक मंदिर था. मंदिर के भीतर दीपक जल रहा था और शिवलिंग पर ताजे फूल रखे थे. पास में मिट्टी का कलश भी रखा हुआ था. इस घटना को देखकर आखेटक आश्चर्य और कृतज्ञता से भर गया. बाद में जब वह आगे बढ़ा तो एक दौड़ाहा, यानी डाक सेवा से जुड़ा धावक, उसे मिला. उसने बताया कि पास में ही चमत्कारों वाला मंदिर पिपरा नाथ है और वहां विप्लवी भी जाते हैं.

‘वह चमत्कारों वाला मंदिर पिपरा नाथ है’

साहित्यिक वर्णन में पिपरा नाथ को ‘चमत्कारों वाला मंदिर’ बताए जाने का प्रसंग मंदिर की रहस्यमयी पहचान को और गहरा करता है. दौड़ाहे द्वारा वहां जाने की सलाह और ‘विप्लवियों’ के मंदिर पहुंचने का उल्लेख इसे 1857 के विद्रोह से जोड़ने वाला महत्वपूर्ण साहित्यिक संदर्भ माना जाता है. यह कथा केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं रहती, बल्कि मंदार क्षेत्र के जंगल, स्थानीय मंदिर और उस दौर की राजनीतिक हलचल को भी एक साथ सामने लाती है.

1857 के विद्रोह की कड़ी मेरठ से मंदार तक

पिपरा नाथ से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण मान्यताओं में इसका 1857 के विद्रोह से संबंध है. कहा जाता है कि मेरठ छावनी में स्थित बाबा औघड़नाथ मंदिर में मंगल पांडेय ने विद्रोह से पहले जल अर्पित किया था. इसी तरह बौंसी में उस समय 32वीं देसी पैदल सैनिक की छावनी और मुख्यालय था.

मान्यता के अनुसार देवघर के रोहिणी में विद्रोह करने वाले सैनिक पिपरा नाथ में पूजा-अर्चना कर आगे बढ़े थे. इसके बाद उन्होंने गिद्धौर के राजा को झुकने के लिए मजबूर किया और आगे शाहाबाद की ओर बढ़ते हुए कुंवर सिंह का साथ दिया.

इस तरह पिपरा नाथ की स्थानीय परंपरा 1857 के विद्रोह की व्यापक गतिविधियों को मंदार क्षेत्र से जोड़ती है.

1895 में भी मंदिर की हालत अच्छी नहीं थी

बंगाल सरकार के 1895 के सर्वे में पिपरा नाथ मंदिर को पुरातात्विक अवशेष के रूप में दर्ज किया गया था. सर्वे में उल्लेख है कि मंदिर का संरक्षण स्थानीय जमींदार द्वारा किया जाता था, जबकि इसकी सेवा ब्राह्मणों द्वारा की जाती थी. सर्वे में मंदिर की स्थिति अच्छी नहीं होने की बात भी दर्ज की गई थी. इससे यह स्पष्ट होता है कि उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में भी मंदिर काफी पुराना था और उसके संरक्षण को लेकर स्थिति बेहतर नहीं थी.

आज सावन में उमड़ते हैं श्रद्धालु, बदली मंदिर की तस्वीर

समय के साथ पिपरा नाथ मंदिर की स्थिति में बदलाव आया है. वर्तमान में मंदिर की अवस्था अच्छी बताई जाती है. खासकर सावन के महीने में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं. मंदार क्षेत्र के इस प्राचीन मंदिर की खासियत यही है कि यहां धार्मिक आस्था के साथ पुरातात्विक दस्तावेज, सरकारी सर्वे, साहित्यिक वर्णन, स्थानीय परंपरा और 1857 के विद्रोह से जुड़ी स्मृतियां एक साथ दिखाई देती हैं.

इतिहास, आस्था और लोकविश्वास का अनोखा संगम है पिपरा नाथ

Banka News: पिपरा नाथ मंदिर की कहानी सिर्फ एक प्राचीन शिव मंदिर की कहानी नहीं है. यह उस दौर की याद भी दिलाती है जब धार्मिक स्थल सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण केंद्र हुआ करते थे. मंदार की धरती पर मौजूद यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, वहीं इतिहास और पुरातत्व में रुचि रखने वालों के लिए भी यह स्थल खास महत्व रखता है. सरकारी सर्वे से लेकर साहित्यिक कथाओं और स्थानीय लोकविश्वास तक इसके अलग-अलग संदर्भ पिपरा नाथ को एक बहुआयामी ऐतिहासिक विरासत के रूप में स्थापित करते हैं.


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