चार आने का टिकट और करोड़ों की खुशी! ओटीटी के दौर में कहीं खो गया सिनेमा हॉल जाने का वो 'सामूहिक जुनून'
फोटो- ढाकामोड स्थित मां तारा चित्र मंदिर कभी गुलजार हुआ करती थी अब खंडहर मे तब्दील | Prabhat Khabar Network
एक समय था जब सिनेमा देखना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि पूरे गांव का उत्सव था. पोस्टर लगने से लेकर टिकट की कतार तक, हर पल एक रोमांच था. आज सुविधाओं के इस दौर में, सिनेमा हॉल की वे सामूहिक और यादगार शामें अब भी लोगों की स्मृतियों में 'हाउसफुल' हैं.
बाराहाट (बांका). आज ओटीटी और मोबाइल स्क्रीन ने फिल्मों को घर तक पहुंचा दिया है, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब सिनेमा देखना सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि पूरे गांव-कस्बे का उत्सव हुआ करता था. नई फिल्म लगने की खबर से लेकर टिकट की खिड़की की लंबी कतार, पर्दे पर हीरो की एंट्री पर तालियां और इंटरवल में समोसे-मूंगफली की खुशबू तक, हर पल में एक अलग रोमांच था. फिल्म खत्म होने के बाद भी कहानी, संवाद और गानों की चर्चा कई दिनों तक चलती रहती थी. आज सुविधाएं बढ़ गई हैं, लेकिन सिनेमा हॉल की वे सामूहिक और यादगार शामें लोगों की स्मृतियों में अब भी हाउसफुल हैं.
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पोस्टर लगते ही शुरू हो जाती थी फिल्म की चर्चा
कभी गांव-कस्बों के सिनेमा हॉल में नई फिल्म लगने की खबर किसी बड़े आयोजन से कम नहीं होती थी. हॉल के बाहर फिल्म का पोस्टर चिपकते ही लोगों की निगाहें उस पर टिक जाती थीं. हीरो कौन है, विलेन कौन है और फिल्म कितनी जबरदस्त होगी, इस पर चाय की दुकानों से लेकर चौक-चौराहों तक चर्चा शुरू हो जाती थी.
नई फिल्म देखने के लिए दोस्तों की टोली बनती और शो का समय तय किया जाता. उस दौर में साइकिल ही सबसे बड़ी सवारी हुआ करती थी. कई लोग एक ही साइकिल पर दो-दो या तीन-तीन साथी बैठकर निकल पड़ते थे. कुछ लोग तो कई किलोमीटर पैदल चलकर भी सिनेमा देखने पहुंचते थे.
टिकट की खिड़की पर लाइन नहीं, जंग का मैदान
सिनेमा हॉल की टिकट खिड़की के बाहर का नजारा भी किसी फिल्मी दृश्य से कम नहीं होता था. लंबी कतार में आगे निकलने की कोशिश होती थी. टिकट हाथ में आते ही चेहरे पर ऐसी खुशी दिखती थी, जैसे कोई बड़ी जीत हासिल कर ली हो.
टिकट मिल गया तो शाम सफल और टिकट नहीं मिला तो अगली फिल्म का इंतजार. उस दौर में ऑनलाइन बुकिंग या मोबाइल पर टिकट का विकल्प नहीं था. टिकट की छोटी-सी पर्ची ही फिल्म देखने की सबसे बड़ी खुशी हुआ करती थी.
पर्दे पर हीरो की एंट्री और गूंज उठता था हॉल
फिल्म शुरू होते ही सिनेमा हॉल की दुनिया बदल जाती थी. पर्दे पर हीरो की एंट्री होते ही तालियों और सीटियों से पूरा हॉल गूंज उठता था. विलेन की पिटाई पर दर्शकों का उत्साह देखते ही बनता था.
रोमांटिक गाने पर हॉल में खामोशी छा जाती, कॉमेडी सीन पर ठहाके गूंजते और भावुक दृश्य के दौरान पूरा हॉल शांत हो जाता. दर्शक फिल्म को सिर्फ देखते नहीं थे, बल्कि उसे महसूस करते और जीते थे.
इंटरवल में समोसे और मूंगफली की खुशबू
जैसे ही पर्दे पर मध्यांतर लिखा आता, सिनेमा हॉल के बाहर समोसा, पकौड़ी, मूंगफली और ठंडे पेय की दुकानों पर भीड़ टूट पड़ती थी. जेब में पैसे कम हों तो मूंगफली ही सही, लेकिन इंटरवल खाली पेट गुजारना उस दौर में मुश्किल ही समझा जाता था.
इंटरवल भी फिल्म का ही हिस्सा लगता था. दोस्त एक-दूसरे से फिल्म के अब तक के हिस्से पर चर्चा करते और आगे कहानी में क्या होगा, इसका अनुमान लगाते थे.
सिनेमा हॉल बन गया था मिलन का ठिकाना
सिनेमा हॉल केवल फिल्म देखने की जगह नहीं था. यहां रिश्तेदार मिलते थे, दोस्त मिलते थे और कई बार ऐसे परिचित भी मिल जाते थे, जिनसे महीनों से मुलाकात नहीं हुई होती थी.
एक ही फिल्म देखने के बाद लोग उसके गाने, संवाद और किरदारों पर कई दिनों तक चर्चा करते रहते थे. फिल्म खत्म होने के बाद घर लौटने का सफर भी अपने आप में मनोरंजक होता था. कोई हीरो की एक्टिंग की नकल करता तो कोई फिल्म का संवाद बोलता.
अगले दिन चाय की दुकान पर फिर शुरू होती थी कहानी
फिल्म देखने के अगले दिन चाय की दुकान पर फिर वही सवाल होता था, फिल्म कैसी लगी. इसके बाद कहानी दोबारा शुरू हो जाती थी. कौन सा सीन अच्छा था, किस कलाकार ने बेहतर अभिनय किया और फिल्म का अंत कैसा रहा, इन सब पर लंबी बहस चलती थी.
फिल्म के गाने और संवाद भी लोगों की रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन जाते थे. कई दिनों तक बच्चे और युवा फिल्मी किरदारों की नकल करते नजर आते थे.
ओटीटी के दौर में पीछे छूट गया सामूहिक जुनून
आज मल्टीप्लेक्स की आरामदायक सीटें हैं, ऑनलाइन टिकट है, एयरकंडीशन हॉल हैं और घर बैठे ओटीटी का संसार है. सुविधाएं निश्चित रूप से बढ़ी हैं, लेकिन सिनेमा देखने का वह सामूहिक जुनून कहीं पीछे छूट गया है.
अब टिकट मोबाइल पर आती है और फिल्म कई बार अकेले मोबाइल, टीवी या लैपटॉप की स्क्रीन पर देखी जाती है. पहले टिकट हाथ में आते ही दोस्त गले मिलते थे और फिल्म खत्म होने तक पूरा हॉल एक परिवार जैसा महसूस होता था.
यादों के पर्दे पर आज भी हाउसफुल हैं वो शामें
वक्त बदला, सिनेमा बदला और फिल्म देखने का तरीका भी बदल गया. लेकिन पुराने सिनेमा हॉल की वे शामें आज भी लोगों की यादों में हाउसफुल चल रही हैं. टिकट भले चार आने की रही हो, लेकिन उस दौर में उससे मिलने वाली खुशी की कीमत करोड़ों में थी.
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