ढोलक कारीगर का रोजगार मंदा

Published at :08 Mar 2017 5:42 AM (IST)
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ढोलक कारीगर का रोजगार मंदा

कटोरिया : फागुन में गांव की चौपालों से लेकर बाजार के चौराहों पर होने वाले होली गायन से लोगों में रंगों का त्योहार होली की उमंग महीना भर छायी रहती थी. लेकिन अब शौकिन मिजाज एवं परंपरा को संजो कर रखने वाले लोगों पर फैशन का दौर भारी पड़ रहा है. इस स्थिति में ढोलक […]

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कटोरिया : फागुन में गांव की चौपालों से लेकर बाजार के चौराहों पर होने वाले होली गायन से लोगों में रंगों का त्योहार होली की उमंग महीना भर छायी रहती थी. लेकिन अब शौकिन मिजाज एवं परंपरा को संजो कर रखने वाले लोगों पर फैशन का दौर भारी पड़ रहा है.

इस स्थिति में ढोलक छौनी करने के पुस्तैनी रोजगार में पिछले चालीस सालों से जुड़े प्रसिद्ध कारीगर श्रीधर दास का रोजगार मंदा हो गया है. इस धंधा से नाखुश श्रीधर ने कहा कि यदि खेती-गृहस्थी नहीं रहती, तो उसका परिवार आज भूखों मर रहा होता.

होली से दूर हुआ ढोलक
होली गायन के महफिल में ‘ठीक से ढोलक बजाओ रे ढोलकिया, तेरा खिलौना ला दूंगा’ सामूहिक स्वर में गाये जाने वाले होली गीत में ढोलक की ताल के साथ-साथ झाल की झनकार साथ देती थी. लेकिन अब डीजे, मोबाइल व अन्य साउंड सिस्टमपर फूहड़ गीत ‘चल गे गंगिया डुबकी लगावे…’ काफी तेज आवाज में इस तरह से बजाये जाते हैं, जैसे फागुन के नाम पर इन्हें अश्लील गानों को बजाने का लाइसेंस ही मिल गया हो. इस विषम परिस्थिति व आधुनिकता की चकाचौंध में ढोलक व झाल की जोड़ी होली से दूर होता जा रहा है. हर घर की शोभा बढ़ाने वाला खुशी का प्रतीक ढोलक अब शादी के फंशन में भी सिर्फ नियम पूरा करने के लिए ही पड़ोसी से मांग कर बजाये जाते हैं.
कछुआ हड्डी पर चमड़े की सफाई
प्रखंड के जमदाहा गांव निवासी श्रीधर दास अपने पिता मत्तल दास की पुस्तैनी रोजगार को आगे बढ़ाते हुए ढोलक, मृदंग, नाल आदि का छौनी करने का काम कर रहे हैं. श्रीधर ने बताया कि बकरी-पाठा के सूखे चमड़े को पानी में फूलाने एवं गोल आकार करने के बाद कछुआ हड्डी पर उसकी सफाई की जाती है. ढोलक में छौनी चढ़ाने के बाद उस पर अंडी, धूमना व सिंदूर के मिश्रण से तैयार लेप का गद्या लगाया जाता है. जो ढोलक के थाप पर अलग-अलग आवाज देता है. एक ढोलक की छौनी में मिलने वाले तीन सौ की मजदूरी में दो सौ रूपये से भी अधिक श्रीधर का खर्च ही गिर जाता है. होली त्योहार को लेकर कारीगर श्रीधर पहले कटोरिया के कठौन गांव में दो माह तक कैंप लगाता था. लेकिन अब पंद्रह दिन भी काम नहीं मिल पाता है. इस रोजगार से असंतुष्ट श्रीधर ने कहा कि सह अपने बच्चों को इस पुश्तैनी धंधे से दूर ही रखेंगे.
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