बांकाः चंद रुपये कमाने के लिए एक मजदूर दिन भर किस प्रकार मेहनत करता है. इस बात को समझने के लिए प्रभात खबर ने देसड़ा गांव के मजदूर रमेश प्रसाद से बात की. उक्त मजदूर अपने बूढ़े मां-बाप का एक मात्र सहारा है.
मां-बाप की बीमारी से लेकर सभी मौखिक जरूरतों को पूरा करना उसकी जवाबदेही है. मां-पिता के साथ-साथ रमेश को अपना पारिवारिक जीवन भी है. पत्नी के साथ-साथ उसे बेटी और एक बेटे के पिता का फर्ज भी पूरा करना पड़ता है. उसका सपना है कि वह बेटे को शिक्षित करे व उसकी बेटी अच्छे घर में ब्याही जाये. वह सूखी रोटी के साथ हरी मिर्च और प्याज के एक टुकड़े को खाकर सुबह ही अपने घरों से काम की तलाश में निकल जाता है. शिवाजी चौक पर हर आने-जाने वालों को देखता है. मानों उसी के पास आज की मेहनताना हो. मजदूरों को नहीं मिलता योजना का लाभ : सरकार ने मजदूरों के लिए कई योजनाएं चलायी है. मनरेगा, इंदिरा आवास, अंत्योदय, खाद्य सुरक्षा, जननी सुरक्षा, वृद्धा पेंशन सहित कई योजनाएं चला रखी है. इन योजनाओं का लाभ मजदूरों तक नहीं पहुंच पा रहा है.
क्या कहते हैं अधिकारी
इस मामले में लेबर इंस्पेक्टर जावेद रहमत ने बताया कि सरकार द्वारा मजदूरों के लिए 176 रुपये आठ घंटे काम की न्यूनतम मजदूरी तय की गयी है. अगर इससे कम मजदूरी इन्हें मिल रही है तो शिकायत आने पर इसकी जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जायेगी.
वहीं स्कूली बच्चों से उनके परिजनों के द्वारा काम कराये जाने की बात पर बताया कि माता पिता को कहा गया है कि वे बच्चों से काम नहीं करायें, उन्हें शिक्षा के लिए विद्यालय भेजें.