मट्टिी के दीये का घट रहा महत्व

Published at :05 Nov 2015 7:01 PM (IST)
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मट्टिी के दीये का घट रहा महत्व

मिट्टी के दीये का घट रहा महत्वदीपावली में लोग अब कैंडील व इलेक्ट्रिक लाइटों का कर रहे इस्तेमाल रफीगंज(औरंगाबाद) दीपावली का समय जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है वैसे-वैसे बाजारों में रौनक बढ़ती जा रही है. दीपावली में लोग अपने घरों व दुकानों को झालर व आकर्षक लाइटों से सजाने लगे हैं. लेकिन, दीपावली में […]

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मिट्टी के दीये का घट रहा महत्वदीपावली में लोग अब कैंडील व इलेक्ट्रिक लाइटों का कर रहे इस्तेमाल रफीगंज(औरंगाबाद) दीपावली का समय जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है वैसे-वैसे बाजारों में रौनक बढ़ती जा रही है. दीपावली में लोग अपने घरों व दुकानों को झालर व आकर्षक लाइटों से सजाने लगे हैं. लेकिन, दीपावली में मिट्टी के दीये का अलग ही महत्व है. पूजा में मिट्टी के दिये का उपयोग अब भी लाेग करते हैं. मंदिरों में भी घी के दीये जलाये जाते हैं. भीम पंडित ने बताया कि पहले दीपावली में घरों व दुकानों में मिट्टी के दीये ही जलाये जाते थे. लेकिन, धीरे-धीरे मिट्टी के दीये का महत्व कम रहा है. इसका जगह मोमबत्ती, झालर एवं इलेक्ट्रिक लाइटों ने ले ली है. रफीगंज के रौनक प्रसाद , राधेश्याम प्रसाद, रामचंद्र प्रसाद ने बताया कि महंगाई प्रतिदिन बढ़ रही है. मिट्टी के बरतनों को पकाने में लकड़ी व उपला का प्रयोग किया जाता है. पहले धान के पुआल एवं उपला से मिट्टी के बरतन पकाये जाते थे. गांवों में यह सामग्री आसानी से उपलब्ध हो जाते थे. अब खरीद कर लाना पड़ता है. मिट्टी के दीये बनाने में अब अधिक लागत आता है. बाजारों में 60 से 70 रुपये सैकड़ा दीये बेचे जाने का उम्मीद है. पिछले साल 30 से 40 रुपये सैकड़ा दीये की बिक्री की गयी थी.

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