उदवंतननगर में शिष्यों ने गुरु को किया नमन, लिया आर्शीवाद

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शिष्यों को आशीर्वाद देते | Prabhat Khabar Network

शिष्यों को आशीर्वाद देते गुरु.

Guru Purnima per Shishyon Ne Guru charanon mein kiya Naman Paye Ashish

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गुरु पूर्णिमा की परंपरा सनातन धर्म संस्कृति का अभिन्न अंग है.सनातन संस्कृति में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहते हैं. बुधवार को गुरु पूर्णिमा आस्था व विश्वास के साथ मनाई गई.क्ति पूर्ण माहौल में शिष्यों ने अपने गुरु से आशीष प्राप्त किया.कहीं-कहीं भण्डारा का भी आयोजन किया गया.पं दिनेश पांडेय,पं विवेकानंद पांडेय जैसे आध्यात्मिक गुरूओं ने बताया कि हिन्दू धर्म ग्रंथों में गुरु में गु का अर्थ अन्धकार या अज्ञान और रू का अर्थ प्रकाश है अर्थात अज्ञान को हटा कर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को गुरु कहा जाता हैं.

गुरुओं के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करने की परंपरा

गुरु पूर्णिमा का दिन गुरुओं के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करने का अवसर है.गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है.आज ही के दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था जिन्होंने चारों वेद और महाभारत की रचना की थी.मान्यता है कि गुरु पूर्णिमा गुरुओं के गुरु भगवान दत्तात्रेय की याद में मनाया जाता है जिन्हें त्रिदेव (ब्रह्मा विष्णु और महेश) का संयुक्त रूप माना जाता है. उन्होंने पृथ्वी, जल, वायु ,आकाश,सूरज, चंद्रमा, मछली ,पक्षी सहित कुल 24 विभिन्न प्राकृतिक तत्वों, जानवरों और घटनाओं से सीख ली थी. उन्होंने बताया कि भोजपुर जिले में कई आध्यात्मिक संत हुए जिनमें परमपूजनीय खपड़िया बाबा,त्रिडंडी स्वामी जी महाराज,माचा स्वामी,सरयू दास जी महाराज, रामेश्वर बाबा, बलदेव बाबा, औधड़ भगवान राम , क्रियायोगी रंगनाथ मिश्रा,वर्तमान में जीयर स्वामी जी महाराज सहित अनेक संत एवं गृहस्थ साधक गुरु शिष्य परंपरा के ध्वजवाहक रहे हैं जिनके सानिध्य व कृपा से शिष्यों का कल्याण हुआ.मठ, मंदिर आदि आज भी गुरू शिष्य संस्कार को जीवित रखे हुए है.

सभी धर्मों में गुरुओं को नमन करने की परंपरा

अधिकांश आध्यात्मिक गुरु इस दिन महत्ती परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं. गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु पूजन का विधान है.शिष्य अपने गुरु की प्रत्यक्ष या उनके चरण पादुका की चंदन, धूप, दीप नैवेद्य द्वारा पूजा करते हैं.इस दिन अपने गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र की जाप की जाती है.माना जाता है कि गुरु कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार होता है.गुरु पूर्णिमा उन समस्त आध्यात्मिक और अकादमिक गुरुओं के प्रति समर्पित परम्परा है, जिन्होंने कर्म योग आधारित व्यक्तित्व विकास को प्रबुद्ध करने में अपनी अहम् भूमिका निभाई है.गुरु शिष्य को सही मार्ग दिखाता है और आगे बढ़ाने के लिए मार्ग प्रशस्त करता है.

गुरुओं ने दिखाया है भविष्य का मार्ग

यह पर्व हिंदू बौद्ध और जैन समुदाय के लोग अपने आध्यात्मिक शिक्षकों के सम्मान में मनाते हैं तथा उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं. यह परंपरा भारत, नेपाल और भूटान में मनाई जाती है .माता-पिता और शिक्षक को भी गुरु माना जाता है.लेकिन अंतिम गुरु के रूप में परमात्मा को प्रतिपादित किया गया है.उदवंतनगर सहित अन्य जगहों पर शिष्यों ने गुरू चरणों में शीश नवाया तथा आशिर्वाद प्राप्त किए.


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Vijay Kumar Ojha

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By Vijay Kumar Ojha

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