1857 के गदर से अगस्त क्रांति तक, जब सीमांचल के सपूतों ने छुड़ाए थे अंग्रेजों के छक्के

Updated:
विज्ञापन

Ai Image

अररिया के स्वतंत्रता सेनानियों ने 1857 से 1942 की क्रांति तक देश की आजादी के लिए अपना बलिदान दिया। जानिए अररिया के वीरों के संघर्ष की गौरवमयी कहानी।

विज्ञापन

भारत-नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे अररिया जिले की मिट्टी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष और अमिट बलिदानों की गवाह रही है. वर्ष 1857 की पहली जंग-ए-आजादी से लेकर 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' (अगस्त क्रांति) तक, यहां के वीर सपूतों ने अंग्रेजी हुकूमत की ईंट से ईंट बजा दी. स्वतंत्रता दिवस के इस राष्ट्रीय पर्व पर, आइए जानते हैं अररिया के उन गुमनाम नायकों की अमर गाथा, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया.

1857 की बगावत: नाथपुर से नेपाल होते हुए अवध पहुंचे थे बागी

इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि 1857 के विद्रोह के दौरान जलपाइगुड़ी और ढाका में तैनात भारतीय सैनिकों का एक बागी जत्था अररिया के नाथपुर पहुंचा था. यहां अंग्रेजी फौज से कड़ी टक्कर के बाद ये सैनिक नेपाल के चतरागद्दी की ओर बढ़ गए. कोसी की उफनती धारा और खतरनाक जंगलों को पार करते हुए ये वीर अवध की बेगम हजरत महल की मदद के लिए जा पहुंचे. इस दौरान कई सैनिकों ने अपने घोड़े और साजो-सामान गंवाए, लेकिन उनके कदम नहीं रुके.

1942 की 'अगस्त क्रांति': फारबिसगंज में सीने पर खाई गोलियां

वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के आह्वान पर शुरू हुई अगस्त क्रांति की आग अररिया में भी भड़क उठी. अंग्रेजी पुलिस ने दमन चक्र चलाया, लेकिन सेनानियों के हौसले पस्त नहीं हुए:

  • द्विजदेनी जी की शहादत: इन्हें गिरफ्तार कर भागलपुर सेंट्रल जेल भेजा गया, जहां पुलिस की बर्बर पिटाई और यातनाओं के चलते उन्होंने देश के लिए शहादत दे दी.
  • फारबिसगंज गोलीकांड: 20 सितंबर 1942 को फारबिसगंज में अंग्रेजी शासन के खिलाफ विशाल जुलूस निकाला गया. बौखलाई पुलिस ने निहत्थे लोगों पर गोलियां चला दीं, जिसमें वीर सपूत सुंदरलाल ततमा शहीद हो गए.

रानीगंज थाने पर फहराया तिरंगा, प्राणों की दे दी आहुति

अगस्त क्रांति के दौरान ही जब देशभक्तों ने रानीगंज थाने पर तिरंगा फहराने की कोशिश की, तो अंग्रेजी पुलिस ने उन पर कायराना हमला कर दिया. भारत माता की जय-जयकार करते हुए और तिरंगे की शान बचाते हुए काली दास और जगतू हाजरा ने अपने प्राणों की आहुति दे दी, लेकिन अंग्रेजों के सामने घुटने नहीं टेके.

3 साल से ज्यादा जेल में रहे कलानंद सिंह, यातनाएं भी नहीं डिगा सकीं हौसला

अररिया की धरती ने पंडित रामाधार द्विवेदी, फणीश्वर नाथ रेणु, कमलानंद विश्वास, कन्हैया लाल वर्मा, धनुषधारी चौधरी और बुद्धिनाथ ठाकुर जैसे अनगिनत सेनानी दिए. रानीगंज प्रखंड के दीवान टोला (बरबन्ना) निवासी सेनानी कलानंद सिंह (जिनका हाल ही में निधन हुआ) ने अंग्रेजों के खिलाफ पूर्णिया और भागलपुर जेल में तीन साल से अधिक का समय बिताया. जेल की भयंकर यातनाएं भी उनका रास्ता नहीं रोक सकीं.

सीमांचल के इन नायकों से आज भी मिलती है प्रेरणा

अररिया-जोगबनी सीमा पर रणनीतियां बनाने वाले भृगुनाथ शर्मा हों या फारबिसगंज के रामानंद सिंह— इन सबने अंग्रेजी हुकूमत के जुल्म सहे, लेकिन आजादी का सपना टूटने नहीं दिया. आज जब देश खुली हवा में सांस ले रहा है, तो अररिया के इन वीर सपूतों की गाथाएं सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मजबूत प्रेरणा हैं. इन्हें याद रखना ही इनके बलिदानों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है.


विज्ञापन
Pankaj Jha

लेखक के बारे में

By Pankaj Jha

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन