शिव के अर्द्धनारीश्वर रूप और भृंगी का रहस्य
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :22 Jul 2019 6:08 AM (IST)
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डॉ धनंजय कुमार मिश्र ‘ शीश गंग अर्द्धंग पार्वती सदा विराजत कैलासी नंदी-भृंगी नृत्य करत हैं धरत ध्यान सुर सुख रासी ….’ बाबा भोले नाथ की इस आरती से हम सभी परिचित हैं. आरती में प्रयुक्त ‘नंदी’ को तो हम सभी जानते हैं. यह बाबा के वाहन ‘बसहा’ का नाम है, पर ‘भृंगी’ कौन है? […]
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डॉ धनंजय कुमार मिश्र
‘ शीश गंग अर्द्धंग पार्वती
सदा विराजत कैलासी
नंदी-भृंगी नृत्य करत हैं
धरत ध्यान सुर सुख रासी ….’
बाबा भोले नाथ की इस आरती से हम सभी परिचित हैं. आरती में प्रयुक्त ‘नंदी’ को तो हम सभी जानते हैं. यह बाबा के वाहन ‘बसहा’ का नाम है, पर ‘भृंगी’ कौन है?
इन्हें सामान्यत: हम नहीं जान पाते. शिव स्तुति में प्रयुक्त ‘भृंगी’ एक पौराणिक ऋषि थे. वे भगवान शिव के परम भक्त थे, किंतु कुछ ज्यादा ही रूढ़ थे. इतना कि वह भगवान शिव की तो आराधना करते, पर माता पार्वती को नहीं भजते थे. उनकी भक्ति अद्भुत और अनोखी थी. भृंगी ऋषि पार्वती जी को हमेशा ही शिव से अलग समझते थे. यह शिव और केवल शिव के प्रति उनकी आसक्ति और आस्था थी.
एक बार तो ऐसा हुआ कि वह कैलाश पर्वत पर भगवान शिव की परिक्रमा करने गये, लेकिन वह माता पार्वती की परिक्रमा नहीं करना चाहते थे. पार्वती को दुखी हो गयीं. सोचा कि यह कैसा भक्त है, जो शिव और शिवा को भिन्न समझता है? सृष्टि के कण-कण में शिव-शिवा सदैव साथ-साथ हैं. उन्होंने भृंगी को समझाय – हे ऋषि! संपूर्ण ब्रह्मांड में, प्रत्येक काल में हम दोनों एक हैं, तभी पूर्ण हैं.
तुम हमें अलग करने की भूल मत करो, पर भृंगी की रूढ़ता और अज्ञानता तो देखिए, उन्होंने माता पार्वती की बातों को अनसुना कर दिया और शिव की परिक्रमा करने आगे बढ़े. तब मैया पार्वती शिव जी से सट कर बैठ गयीं. अब प्रसंग और रोचक हो गया. भृंगी ने सर्प का रूप धरा कर लिया और और दोनों के मध्य से होते हुए शिव की परिक्रमा देनी चाही.
तब शिव ने पार्वती का साथ दिया और संसार में अर्द्धनारीश्वर रूप धरा. अब भृंगी क्या करते? उन्हें क्रोध आ गया. उन्होंने चूहे का रूप धारण किया और शिव और पार्वती के बीच से स्थान बनाने के लिए उन्हें कुतरने लगे. अब माता पार्वती (शक्ति) को क्रोध आया और उन्होंने भृंगी को शाप दिया कि जो शरीर तुम्हें अपनी मां से मिला है, वह तुरंत तुम्हारा साथ छोड़ देगा.
तंत्र साधना के अनुसार, मनुष्य को अपनी देह में हड्डियां और मांसपेशियां पिता की देन होती हैं, जबकि खून और मांस माता की देन होती है. श्राप के तुरंत प्रभाव से भृंगी ऋषि के शरीर से खून और मांस गिर गया. भृंगी निढाल होकर जमीन पर गिर पड़े और हालत यह हो गयी कि वह खड़े भी होने की स्थिति में नहीं थे, तब उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने मां पार्वती से अपनी भूल की क्षमा मांगी.
मैया पार्वती ने अपना शाप वापस लेना चाहा, पर अपराध बोध से भृंगी ने मना कर दिया, पर उन्हें खड़ा रहने के लिए सहारा स्वरूप एक अन्य (तीसरा) पैर प्रदान किया गया, जिसके सहारे वह चल और खड़े हो सके. इस प्रकार भक्त भृंगी के कारण ही भगवान का अर्द्धनारीश्वर स्वरूप अस्तित्व में आया. इस भक्त ने भगवान के सुंदर और सौम्य स्वरूप ‘अर्द्धनारीश्वर’ से संसार को परिचित करा कर जगत का उपकार किया.
लेखक: एसपी कॉलेज, दुमका के संस्कृत विभागाध्यक्ष.
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