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जयंती पर विशेष : सुमित्रानंदन पंत यानी कविता को समर्पित जीवन

By दिल्ली ब्यूरो
Updated Date
सुमित्रानंदन पंत
सुमित्रानंदन पंत
Photo : Twitter

अक्सर पंत की तुलना निराला और प्रसाद से की जाती है, लेकिन वास्तव में यह तुलना बेमानी है. पंत हिंदी के अनूठे और विलक्षण कवि हैं और अपनी जमीन पर अकेले हैं. छायावादी कविता पंत के बिना अधूरी है. आज उनकी जयंती पर उनकी रचना और जीवन पर प्रीति सिंह परिहार की यह प्रस्तुति...

छायावादी कवियों में सुमित्रानंदन पंत्र का अपना विशिष्ट स्थान है. छायावाद के चार स्तंभों में उनका रचनाकाल सर्वाधिक विस्तृत था. 20 मई 1900 को जन्मे पंत पंद्रह सोलह साल की उम्र से अपनी मृत्यु तक (28 दिसंबर, 1977) तक रचनाकर्म में लीन रहे. अपनी लंबी रचना-यात्रा में उन्होंने छायावाद से लेकर मार्क्सवाद से लेकर अरविंद दर्शन तक के अनेक पड़ावों को पार किया. छायावादी कवियों में पंत की अपनी खास विशेषता उनका समर्पित कवि होना भी है. जबकि छायावाद के उनके सहयोगी कवि प्रसाद, निराला और महादेवी ने काफी मात्रा में गद्य का भी लेखन किया है, लेकिन पंत का मन मुख्यत: कविता में ही रमा है. वे स्वभाव से ही कवि थे. प्रसाद ने नाटकों, उपन्यासों और कहानियों का सृजन किया. निराला ने भी उपन्यासों का सृजन किया, लेकिन पंत ने कविता को ही अपनी कर्मभूमि माना. दरअसल कविता और पंत एक—दूसरे में एकाकार हो गये.

प्रकृति के कवि : प्रकृति का सुकुमार कवि कहे जानेवाले सुमित्रानंदन पंत का जन्म कुमाऊं के कौसानी गांव में हुआ, जो आज भी अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए विख्यात है. पश्चिम में रोमांटिसिज्म के प्रवर्तनकर्ता रूसो ने प्रकृति की ओर लौटने का नारा दिया था. लेकिन हिंदी के स्वच्छंदतावादी काव्यधारा छायावाद की शुरुआत करनेवाले पंत के लिए प्रकृति लौटने की जगह नहीं थी. यह उनके मानसिक बुनावट, उनके अवचेतन में शामिल थी. कौसानी में पंत ने प्रकृति को अपने इतने समीप पाया कि वह उनके अवचेतन में प्रवेश कर गयी. पंत के काव्य में प्रकृति ने आरंभ में प्रमुख भूमिका निभायी. दरअसल प्रकृति चित्रण उनकी कविता का सबसे सशक्त पक्ष है. यही कारण है कि कई बार उनकी तुलना वर्ड्सवर्थ से की जाती है. उनकी प्रकृति संबंधी कविता का आधार हिमालय का अनुपम सौंदर्य है. ऐसे मे आश्चर्य नहीं कि जब इनकी चुनी हुई प्रकृति कविताओं का अनुवाद गिमलाइस्कया तेत्राज के नाम से मॉस्को से प्रकाशित हुआ, तब उसके हर पृष्ठ को हिमालय के चित्रों से सजाया गया था. पंत की प्रकृति संबंधी कविताओं पर संभवत: कहीं न कहीं अमेरिकी चित्रकार बूस्टर के प्रकृति चित्रों का भी प्रभाव पड़ा. बूस्टर अल्मोड़ा में बस गये थे और उन्होंने वहां रहते हुए हिमालय की सुंदरता को अपने चित्रों में उकेरा था. ये चित्र पंत को काफी प्रिय थे. वास्तव में अगर प्रकृति-चित्रण को अगर छायावादी कविता का मुख्य लक्षण माना जाता है, तो इसका आधार पंत की प्रकृतिपरक कविताएं ही हैं. लेकिन वे सिर्फ प्रकृति के कवि ही नहीं विद्रोह के कवि भी हैं. पल्लव की कविताएं और उसकी ऐतिहासिक भूमिका पंत के विद्रोही चेतना की गवाही देती हैं. यह अकारण नहीं है कि पल्लव की भूमिका को छायावाद का घोषणा पत्र कहा जाता है.

पारिवारिक जीवन का प्रभाव : पंत के कवि- व्यक्तित्व के निर्माण में उनके पारिवारिक जीवन का भी काफी योगदान रहा. पंत ने अपने जन्म के छह-सात घंटों के भीतर ही अपनी मां को खो दिया था. इसने स्त्री के प्रति उनकी दृष्टि को गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. इसने जहां उन्हें अंतर्मुखी बनाया, वहीं नारी के प्रति एक पूजाभाव भी पैदा किया. पंत पर परिवार के धार्मिक संस्कारों का भी प्रभाव पड़ा. उनके पिता के पास साधु-संत जुटा करते थे. पंत ने घर में गीता, रामायण, भागवत आदि के पाठ की चर्चा की है. कहा जाता है कि पंत के पिता ने उनकी मां की मृत्यु के बाद उन्हें एक गोस्वामीजी को सौंप दिया था, जिसके कारण लोग उन्हें गोंसाई या गुसाईं भी कहा करते थे. कौसानी की पाठशाला में उनका नाम गुसाईंदत्त था, जिसे उन्होंने खुद बदलकर सुमित्रानंदन कर लिया था. पंत के आरंभिक धार्मिक संस्कार ही शायद आगे चलकर उन्हें अरविंद दर्शन की ओर लेकर गये.

संस्कृत, अंग्रेजी और बांग्ला साहित्य का प्रभाव : पंत के साहित्यिक संस्कारों के बनने में आरंभिक संस्कृत शिक्षा का भी योगदान रहा. 1919 में पंत इलाहाबाद के म्योर कॉलेज में दाखिला लिया. यहां के साहित्यिक वातावरण ने उनकी रचना को नयी प्रेरणा दी. प्रयाग में रहते हुए पंत अंग्रेजी कविता खासकर, रोमांटिसिज्म से प्रभावित हुए. उन्होंने खुद स्वीकारा है, उन्नीसवीं सदी के कवियों में कीट्स, शेली, वड्र्सवर्थ तथा टेनीसन ने मुझे गंभीर रूप से आकृष्ट किया....इन कवियों की विशेषताओं को हिंदी में उतारने के लिए मेरा कलाकार भीतर ही भीतर प्रयत्न करता रहा.' यह प्रभाव इतना व्यापक था कि पंत ने कॉलरिज और शेली की तरह लंबे बाल भी रखे थे, जो उन्हें रोमांटिक कवि की छवि देता था. पंत पर टैगोर का भी प्रभाव था. यह प्रभाव इतना गहरा था कि निराला ने पल्लव की कविताओं को टैगोर की नकल कहा था.

गांधीवाद, मार्क्सवाद और अरविंद दर्शन तक : वर्ष 1934 में पंत ने गांधीजी से भेंट की और वे गांधीवाद से प्रभावित हुए. इसी समय वे मार्क्सवाद के संपर्क में भी आये. इस सिलसिले में वे कॉमरेड पीसी जोशी का भी नाम लेते हैं. युगवाणी में 'मार्क्स के प्रति कविता से पता चलता है कि वे मार्क्सवाद के मसीहा का व्यक्तित्व सराहते हैं. उन्होंने यह तक कहा है कि वे त्रिनेत्र के ज्ञान चक्षु से प्रकट हुए प्रलयंकर हैं. हालांकि आगे पंत ने रक्त क्रांति और वर्गयुद्ध को मार्क्सवाद की सीमा बताया था. पंत ने अपने चिंतन मे गांधीवाद को मार्क्सवाद के साथ मिलाने की कोशिश की, जिसका प्रमाण उनकी बाद की कविताएं हैं. अपनी काव्ययात्रा के अंतिम सोपान पर वे अरविंद दर्शन से प्रभावित हुए. उत्तरा की प्रस्तावना में उन्होंने अरविंद दर्शन की खूब प्रशंसा की है, 'श्री अरविंद को मैं इस युग की अत्यंत महान तथा अतुलनीय विभूति मानता हूं. विश्व कल्याण के लिए मैं श्री अरविंद की देन को इतिहास की सबसे बड़ी देन मानता हूं.' 1944 में अपनी लंबी बीमारी के बाद पंत अरविंद दर्शन की ओर अधिक से अधिक मुड़ते गये.

खुद को संशोधित करने का साहस : पंत में अपनी लकीर बड़ी करते जाने और खुद को संशोधित करने का साहस था. उन्होंने अपनी कविता को किसी एक वाद से बांधे नहीं रखा. उन्होंने सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों के साथ कदमताल मिलाने की कोशिश लगातार की. यही कारण है कि छायावाद का घोषणापत्र लिखनेवाले कवि ने ही छायावाद के युगांत की घोषणा की. ग्राम्या की कविताएं पंत की सजग दृष्टि का प्रमाण हैं. अक्सर पंत की तुलना निराला और प्रसाद से की जाती है, लेकिन वास्तव में यह तुलना बेमानी है. पंत हिंदी के अनूठे और विलक्षण कवि हैं और अपनी जमीन पर अकेले हैं.

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