दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET 2026 पेपर लीक विवाद को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में चल रहा विरोध प्रदर्शन, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद समाप्त हो गया है. यह मोदी सरकार के 12 साल के कार्यकाल में पहला अवसर है, जब किसी केंद्रीय मंत्री को विरोध प्रदर्शन के बीच अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.सरकार और आंदोलनकारियों के बीच जिन मुद्दों पर सहमति बनी, उनमें NEET और 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन से जुड़े विषय प्रमुख थे.हालांकि बेरोजगारी, सरकारी नौकरियों में भर्ती की धीमी प्रक्रिया और परीक्षाओं में अनियमितताओं जैसे मुद्दों पर कोई घोषणा या स्पष्ट समाधान अब तक सामने नहीं आया है. जबकि यह आंदोलन केवल NEET 2026 पेपर लीक तक सीमित नहीं था. पेपर लीक विवाद के अलावा इसमें बड़ी संख्या में ऐसे युवा भी शामिल थे, जो बेरोजगारी, सरकारी भर्तियों में देरी और भर्ती परीक्षाओं में लगातार सामने आ रही अनियमितताओं के खिलाफ अपनी आवाज उठा रहे थे.ऐसे में सवाल यह है कि क्या NEET आंदोलन की सफलता के बाद सरकार के सामने अगली बड़ी चुनौती बढ़ती बेरोजगारी, सरकारी भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं और इन मुद्दों पर छात्रों-युवाओं के बढ़ते असंतोष को संभालना होगा? लेकिन उससे पहले जानते हैं, बढ़ती बेरोजगारी, सरकारी भर्ती परीक्षाओं में देरी को लेकर क्या हैं मौजूदा हालात?पेपर लीक से बड़ा है रोजगार का संकटहर साल भारत में लाखों युवा NEET, UPSC, SSC, रेलवे, बैंकिंग जैसी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं. इनके लिए ये एग्जाम सिर्फ एक सरकारी नौकरी पाने का रास्ता नहीं होता, बल्कि एक बेहतर लाइफ, फाइनेंशियल सिक्योरिटी और फैमिली के सपनों से जुड़े होते हैं.अब सोचिए... आप सालों तक पढ़ाई करें, कोचिंग लें, लाखों रुपये खर्च करें, और फिर पता चले कि पेपर लीक हो गया या भर्ती ही अटक गई तो आप सवाल एक एग्जाम पर नहीं, पूरे सिस्टम पर उठाएंगे. इसलिए असली कहानी सिर्फ NEET पेपर लीक तक सीमित नहीं है. विशेषज्ञों का मानना है कि पेपर लीक तो बस वो ट्रिगर था, जिसने युवाओं के अंदर पहले से जमा गुस्से को बाहर ला दिया. असली दिक्कत इससे कहीं बड़ी है.देश में तेजी से बढ़ रही है बेरोजगारीसांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत में 5.5% बेरोजगारी दर है और शहरों में हालात ज्यादा चुनौतीपूर्ण हैMoSPI के अनुसार देश में बेरोजगारी दर जून 2026 में 5.5% दर्ज की गई है. ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर में अंतर है.शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 6.6% है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों की बेरोजगारी दर 5.0% है.रिपोर्ट के अनुसार 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) जून 2026 में 54.4% रही. इसका मतलब है कि देश की आधी से कुछ अधिक आबादी ही रोजगार में है या सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश कर रही है.PLFS 2025 की वार्षिक रिपोर्ट बताती है कि देश की सामान्य बेरोजगारी दर 3.1% रही, लेकिन 15 से 29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर 9.9% दर्ज की गई. यानी युवाओं के बीच रोजगार का संकट राष्ट्रीय औसत की तुलना में कहीं अधिक गंभीर बना हुआ है. आंकड़ों को समझने के लिए देखिए देखिए इंफ्रोगाफिकसवाल सिर्फ नौकरी या बेरोजगारी तक नहीं है, बल्कि रिपोर्ट यह भी कह रही है कि भारी संख्या में नौकरी की तलाश करने वालों की भी कमी हो रही है.नौकरी खोजने वाले भी हो रहे कमदेश में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी में केवल 54.4% लोग ही रोजगार कर रहे हैं या सक्रिय रूप से नौकरी की तलाश में हैं. सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की जून 2026 की पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे (PLFS) के अनुसार, देश की श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) 54.4% दर्ज की गई है.रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में श्रम बल भागीदारी दर 56.6% रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह घटकर 50.1% दर्ज की गई. यानी शहरों में आधी से भी कम आबादी रोजगार कर रही है या नौकरी की तलाश में है.वहीं, महिलाओं की श्रम बाजार में भागीदारी अब भी चिंता का विषय बनी हुई है. जून 2026 में महिला LFPR केवल 32.7% रही, जबकि पुरुषों की भागीदारी 75% से अधिक दर्ज की गई. इसका मतलब है कि कामकाजी उम्र की हर तीन में से केवल एक महिला ही श्रम बाजार का हिस्सा है.PLFS 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, देश के करीब 25% युवा NEET (Not in Employment, Education or Training) श्रेणी में आते हैं. यानी हर चार में से एक युवा न तो नौकरी कर रहा है, न पढ़ाई कर रहा है और न ही किसी कौशल प्रशिक्षण से जुड़ा है.इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि भारत में रोजगार का मुद्दा केवल बेरोजगारी दर तक सीमित नहीं है, बल्कि युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार के अवसर पैदा करना और अधिक लोगों को श्रम बाजार से जोड़ना भी बड़ी चुनौती है. वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी, उच्च शिक्षा की ओर बढ़ता रुझान और महिलाओं की घरेलू व सामाजिक जिम्मेदारियां श्रम बल भागीदारी दर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारण हैं. उनका कहना है कि यदि रोजगार के अवसर, कौशल विकास और महिलाओं के लिए अनुकूल कार्य परिस्थितियों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो भारत अपनी युवा आबादी का पूरा आर्थिक लाभ उठाने का अवसर गंवा सकता है.देखिए इंफ्रोगाफिकडेमोग्राफिक डिविडेंड होना भारत के लिए कैसे है खतरे का संकेत ?भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है. आज देश की औसत उम्र करीब 29 साल है और 2050 तक इसके 38 साल होने का अनुमान है. यही युवा आबादी भारत की सबसे बड़ी आर्थिक ताकत मानी जाती है, जिसे Demographic Dividend कहा जाता है. लेकिन सिर्फ बड़ी युवा आबादी होना ही काफी नहीं है. अगर युवाओं के लिए रोजगार, स्किल डेवलपमेंट, निवेश और नई नौकरियों के अवसर नहीं बनते, तो यही Demographic Dividend धीरे-धीरे Demographic Disaster में बदल जाएगा. आसान भाषा में कहें तोयुवा आबादी तभी एसेट है, जब उसके पास काम हो. वरना यही आबादी बेरोजगारी, आर्थिक दबाव और सामाजिक असंतोष की सबसे बड़ी वजह भी बन सकती है.यही वजह है कि विशेषज्ञ लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि भारत के पास अपनी युवा आबादी का पूरा फायदा उठाने के लिए समय है. अगर आने वाले वर्षों में पर्याप्त रोजगार और उद्योग नहीं बढ़े, तो आज का Demographic Dividend, कल देश की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बन सकता है. जिस पर सरकार को काम करना चाहिए.नीट विवाद, मौजूदा शिक्षा व्यवस्था और बढ़ती बेरोजगारी को लेकर प्रभात खबर ने साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डॉ धनंजय त्रिपाठी से बातचीत की. पढ़िए, प्रभात खबर से हुई इस बातचीत के मुख्य अंश.नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हुआ, अधिकारियों को हटाया गया, क्या इससे मामला शांत हो गया?सरकार को यह समझना होगा कि गुस्सा सिर्फ नीट को लेकर नहीं था. नीट जरूर एक वजह थी, लेकिन युवाओं की नाराज़गी उससे कहीं बड़ी है. रोजगार, शिक्षा व्यवस्था और भविष्य को लेकर भी युवाओं में गुस्सा है. अगर आप दिल्ली का आंदोलन देखें तो वहां सिर्फ नीट के छात्र नहीं थे. वहीं दूसरे सरकारी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र, बेरोजगार युवा और अलग-अलग समस्याओं से जूझ रहे लोग भी थे. यानी यह एक तरह का व्यापक फ्रस्ट्रेशन था, जिसे सिर्फ नीट तक सीमित नहीं देखा जा सकता.आपको सबसे बड़ी दिक्कत शिक्षा व्यवस्था में क्या दिखती है?सबसे बड़ी दिक्कत है क्वालिटी एजुकेशन. सरकारी स्कूलों और कॉलेजों की हालत अच्छी नहीं है. दूसरी तरफ प्राइवेट संस्थानों में पढ़ाई इतनी महंगी है कि आम और मध्यम वर्ग के लिए उसे अफोर्ड करना मुश्किल है. यानी अच्छी और सस्ती शिक्षा आम लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही है.शिक्षा व्यवस्था में किस बदलाव की जरूरत है.आज मार्केट AI, नई टेक्नोलॉजी और नई स्किल्स वाले लोगों को ढूंढ रही है. लेकिन क्या हमारे स्कूल और कॉलेज उसी हिसाब से छात्रों को तैयार कर रहे हैं? मुझे नहीं लगता कि हम उतनी तेजी से बदलाव कर पाए हैं. हमें अपने पाठ्यक्रम और पढ़ाई के तरीके में बड़े बदलाव करने होंगे. दरअसल, यह समस्या कॉलेज से नहीं, स्कूल से शुरू होती है. आज स्कूलों में जिस तरह की पढ़ाई हो रही है, वह मार्केट और जॉब की जरूरतों के हिसाब से नहीं है. अगर शुरुआत से ही बच्चों को तकनीकी और स्किल्स नहीं सिखाई जाएंगी, तो आगे चलकर रोजगार की समस्या बढ़ना तय है.इसका समाधान क्या है?सिर्फ इस्तीफे या अधिकारियों को हटाने से व्यवस्था नहीं सुधरेगी. सरकार को एक हाई-एम्पावर्ड एक्सपर्ट टीम बनानी चाहिए, जिसमें शिक्षा, तकनीक और उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ हों. वही सरकार को बताए कि AI, नई तकनीक और स्किल-बेस्ड एजुकेशन को हमारी शिक्षा व्यवस्था में कैसे शामिल किया जाए. इसके लिए हमें चीन और कई पश्चिमी देशों से सीखना होगा कि उन्होंने अपनी शिक्षा व्यवस्था को समय के साथ कैसे बदला. उन्होंने तकनीकी शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट पर जोर दिया. भारत को भी शिक्षा व्यवस्था को तकनीकी रूप से मजबूत बनाना होगा, ताकि छात्र पढ़ाई पूरी करने के बाद सीधे रोजगार के लिए तैयार हों.आपके हिसाब से सरकार को क्या करना चाहिए?सरकार को सिर्फ इस बात से खुश नहीं होना चाहिए कि नीट आंदोलन खत्म हो गया. उसे यह समझना होगा कि युवाओं में इतना गुस्सा क्यों है. अगर शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक, सस्ती, गुणवत्तापूर्ण और रोजगार से जोड़कर नहीं बनाया गया, तो आने वाले समय में रोजगार और बेरोजगारी दोनों की समस्या और गंभीर हो सकती है. इसलिए अब समय पूरे शिक्षा तंत्र में व्यापक सुधार का है. जो इस दिशा में काम करेगा युवा उनके साथ रहेगी.कुल मिलाकर, NEET आंदोलन फिलहाल खत्म हो गया है, लेकिन जिन कारणों ने लाखों युवाओं को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर किया, वे अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं. इसलिए अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार परीक्षा सुधारों के साथ-साथ रोजगार, सरकारी भर्तियों और युवाओं से जुड़े व्यापक मुद्दों पर क्या कदम उठाती है.ये भी पढ़ें : धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक कैसे पहुंचा NEET आंदोलन? जानिए पिछले 48 घंटे में कैसे बदला सरकार का मूड